पूज्य बापू का जीवन सत्य, अहिंसा और सेवा का अमर प्रकाशस्तंभ: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संस्कृत सुभाषितम के जरिए दी भावभीनी श्रद्धांजलि
नई दिल्ली। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पावन जयंती के अवसर पर देश और दुनिया उन्हें नमन कर रही है। इस ऐतिहासिक और विचारोत्तेजक अवसर पर भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) पर एक अत्यंत प्रेणादायक संदेश साझा करते हुए महात्मा गांधी के जीवन मूल्यों और उनके वैश्विक दर्शन को रेखांकित किया। प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में स्पष्ट कहा कि पूज्य बापू का संपूर्ण जीवन केवल एक युग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सत्य, अहिंसा, करुणा और निःस्वार्थ सेवा का ऐसा अमर प्रकाशस्तंभ है जो हर युग में संपूर्ण मानवता का मार्ग प्रशस्त करता रहेगा।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥”
— नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री (सोशल मीडिया ‘X’ पर संदेश)
प्रधानमंत्री मोदी ने महात्मा गांधी के जीवन दर्शन, उनकी कार्यशैली और उनकी आत्मिक चेतना को व्यक्त करने के लिए श्रीमद्भगवद्गीता के 12वें अध्याय (भक्तियोग) के प्रसिद्ध श्लोक का सहारा लिया। यह श्लोक एक ऐसे उत्तम मनुष्य और साधक के लक्षणों को व्यक्त करता है, जिसने अपना सर्वस्व लोक कल्याण और आत्म-साक्षात्कार में समर्पित कर दिया हो।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥”
प्रधानमंत्री द्वारा साझा किया गया यह सुभाषितम न केवल महात्मा गांधी के महान व्यक्तित्व की सटीक व्याख्या करता है, बल्कि समकालीन विश्व व्यवस्था में उपजे तनाव, हिंसा, विषमता और मतभेदों को मिटाने के लिए एक शाश्वत सूत्र भी प्रस्तुत करता है।
संस्कृत सुभाषितम का गूढ़ अर्थ और महात्मा गांधी का जीवन दर्शन
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा उद्धृत यह सुभाषितम भारतीय संस्कृति और दर्शन का वह अमूल्य रत्न है, जिसमें जीवन जीने की कला और मनुष्यता की पराकाष्ठा छिपी हुई है। यदि हम इस श्लोक के प्रत्येक पद का सूक्ष्म विश्लेषण करें, तो हम पाएंगे कि यह महात्मा गांधी के 79 वर्षों के जीवन पथ का शब्दशः प्रतिबिंब है:
1. अद्वेष्टा सर्वभूतानां (किसी भी प्राणी से द्वेष न रखना)
गांधी जी के जीवन का मूल मंत्र था ‘अहिंसा’। अहिंसा का अर्थ केवल किसी पर शारीरिक प्रहार न करना ही नहीं है, बल्कि मन, वचन और कर्म से भी किसी के प्रति बैर या द्वेष भाव न रखना है। ब्रिटिश साम्राज्य के दमनकारी शासन के खिलाफ संघर्ष करते हुए भी गांधी जी ने कभी किसी अंग्रेज व्यक्ति या ब्रिटिश जनता से नफरत नहीं की। उनका संघर्ष अन्याय और व्यवस्था के खिलाफ था, व्यक्ति के खिलाफ नहीं। उन्होंने सिखाया कि द्वेष से केवल द्वेष बढ़ता है, जबकि प्रेम और अद्वेष से कट्टर से कट्टर शत्रु का हृदय परिवर्तन किया जा सकता है।
2. मैत्रः करुण एव च (सभी के प्रति मित्रता और करुणा)
गांधी जी का दायरा किसी विशेष देश, जाति, धर्म या वर्ग तक सीमित नहीं था। वे ‘वसुधैव कुटुंबकम’ के सर्वकालिक समर्थक थे। समाज के सबसे अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति (दरिद्रनारायण) के प्रति उनके हृदय में असीम करुणा थी। उन्होंने कुष्ठ रोगियों की सेवा स्वयं अपने हाथों से की, छुआछूत जैसी सामाजिक बुराई के खिलाफ जीवनपर्यंत लड़ाई लड़ी और समाज के शोषित वर्ग को ‘हरिजन’ नाम देकर उन्हें सम्मानजनक जीवन दिलाने का प्रयास किया। उनकी मित्रता और करुणा प्रकृति के प्रत्येक जीव के प्रति समान थी।
3. निर्ममो निरहङ्कारः (ममत्व और अहंकार से मुक्ति)
महात्मा गांधी चाहते तो आजादी के बाद स्वतंत्र भारत में सर्वोच्च पद प्राप्त कर सकते थे, परंतु उन्होंने सत्ता, संपत्ति और पद का कभी लालच नहीं किया। वे ‘अपरिग्रह’ (जरूरत से ज्यादा न जोड़ना) के पक्के अनुयायी थे। उनके पास संपत्ति के नाम पर केवल एक चश्मा, एक लाठी, एक चरखा और दो जोड़ी सूती वस्त्र थे। उनका जीवन निरहंकारिता का सबसे बड़ा उदाहरण था। जब पूरी दुनिया उनके विचारों के आगे नतमस्तक थी, तब भी वे स्वयं को केवल एक साधारण ‘सत्य का साधक’ मानते थे।
4. समदुःखसुखः क्षमी (सुख-दुख में समभाव और क्षमाशीलता)
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बापू को अनगिनत बार जेल जाना पड़ा, लाठियां खानी पड़ीं, अपमान सहना पड़ा और अपने प्रिय सहयोगियों को खोना पड़ा। लेकिन उन्होंने सफलता में कभी उतावलापन नहीं दिखाया और असफलता में कभी धैर्य नहीं खोया। वे सुख और दुख, प्रशंसा और आलोचना दोनों स्थितियों में ‘स्थितप्रज्ञ’ बने रहे। क्षमाशीलता उनके व्यक्तित्व का आभूषण थी। उनका मानना था कि “क्षमा करना बलवान का गुण है, कमजोर कभी क्षमा नहीं कर सकता।”
सत्य, अहिंसा, करुणा और सेवा: बापू के चार मजबूत स्तंभ
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संदेश में जिन चार शब्दों—सत्य, अहिंसा, करुणा और सेवा—का उल्लेख किया है, वे गांधीवादी दर्शन के मुख्य आधार स्तंभ हैं। आज के 21वीं सदी के तकनीकी और आधुनिक युग में भी इन चार स्तंभों की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ गई है।
- सत्य (Truth): बापू के लिए ‘सत्य ही ईश्वर’ था। उनका मानना था कि सत्य के बिना किसी भी धर्म या समाज की नींव नहीं रखी जा सकती। उनका प्रसिद्ध ग्रंथ ‘सत्य के प्रयोग’ (My Experiments with Truth) इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने अपने जीवन के हर छोटे-बड़े पहलू को सत्य की कसौटी पर कसा।
- अहिंसा (Non-Violence): गांधी जी ने दुनिया को दिखाया कि स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए बंदूकों और बमों की आवश्यकता नहीं है। ‘सत्याग्रह’ और ‘सविनय अवज्ञा’ के रूप में उन्होंने अहिंसक प्रतिरोध का एक ऐसा हथियार गढ़ा, जिसने दुनिया के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य को झुकने पर मजबूर कर दिया।
- करुणा (Compassion): बापू की करुणा केवल मानवीय पीड़ा तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे पर्यावरण, पशु-पक्षियों और प्रकृति के संरक्षण के प्रति भी उतने ही संवेदनशील थे। उनका कहना था कि किसी राष्ट्र की महानता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वहां जानवरों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है।
- सेवा (Service): बापू का दर्शन ‘जन सेवा ही प्रभु सेवा’ था। उन्होंने सेवा को ही अपने जीवन की साधना माना। साबरमती और वर्धा आश्रमों में उन्होंने खुद सफाई करने से लेकर सूत कातने तक के काम किए, ताकि समाज में श्रम के सम्मान (Dignity of Labour) को स्थापित किया जा सके।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दृष्टिकोण और गांधीवादी विचार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने विभिन्न कार्यकालों के दौरान महात्मा गांधी के सपनों के भारत को साकार करने के लिए कई राष्ट्रव्यापी नीतियां और अभियान शुरू किए हैं। जब हम बापू के विचारों और वर्तमान भारत की विकास यात्रा को देखते हैं, तो दोनों के बीच एक गहरा सीधा संबंध नजर आता है।
1. स्वच्छ भारत मिशन (Clean India Mission)
महात्मा गांधी कहते थे कि “स्वच्छता स्वतंत्रता से अधिक महत्वपूर्ण है।” आजादी के सात दशकों बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में गांधी जयंती के दिन ही ‘स्वच्छ भारत अभियान’ की शुरुआत की। इस जन-आंदोलन ने भारत में स्वच्छता के प्रति दृष्टिकोण को पूरी तरह बदल दिया। करोड़ों शौचालयों का निर्माण, खुले में शौच से मुक्ति (ODF) और कचरा प्रबंधन के माध्यम से भारत ने बापू की स्वच्छता की सोच को श्रद्धांजलि अर्पित की है।
2. आत्मनिर्भर भारत और वोकल फॉर लोकल (Self-reliant India)
गांधी जी का ‘स्वदेशी’ का सिद्धांत केवल विदेशी सामान के बहिष्कार तक सीमित नहीं था, बल्कि वह भारत के ग्रामीण उद्योग, खादी और कुटीर उद्योगों को मजबूत करने का माध्यम था। बापू का चरखा आत्मनिर्भरता का प्रतीक था। आज प्रधानमंत्री मोदी द्वारा चलाया जा रहा ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ का संकल्प गांधी जी के स्वदेशी दर्शन का ही आधुनिक संस्करण है। खादी के पुनरुद्धार से लेकर एमएसएमई (MSME) और स्टार्ट-अप्स को बढ़ावा देने का कार्य बापू के आर्थिक विचारों के अनुरूप ही है।
3. अंत्योदय (अंतिम व्यक्ति का उदय)
गांधी जी ने ‘ताबीज’ (Jantar) का सिद्धांत दिया था। उनका कहना था कि जब भी आप कोई निर्णय लें, तो समाज के सबसे गरीब और कमजोर व्यक्ति का चेहरा याद करें और सोचें कि आपका कदम उसके लिए कितना उपयोगी होगा। केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाएं—जैसे पीएम आवास योजना, उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत, और मुफ्त खाद्यान्न योजना—बापू के इसी अंत्योदय के विचार से प्रेरित हैं, ताकि समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुंचे।
समकालीन वैश्विक संदर्भ में गांधी दर्शन की उपयोगिता
आज का विश्व युद्धों, भू-राजनीतिक तनावों, जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद और सामाजिक असहिष्णुता जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है। रूस-यूक्रेन संघर्ष से लेकर मध्य पूर्व के तनाव तक, पूरी दुनिया शांति और स्थिरता की तलाश में है। ऐसे निराशाजनक और अनिश्चित माहौल में महात्मा गांधी के विचार एक मार्गदर्शक नक्षत्र की तरह चमकते हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महात्मा गांधी की स्वीकार्यता इस बात से सिद्ध होती है कि संयुक्त राष्ट्र (UN) ने 2 अक्टूबर को ‘अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ (International Day of Non-Violence) के रूप में घोषित किया है। दुनिया भर के शीर्ष नेता—चाहे वे मार्टिन लूथर किंग जूनियर हों, नेल्सन मंडेला हों या बराक ओबामा—सबने बापू के अहिंसा और सत्याग्रह के मार्ग को अपनाया और स्वीकार किया।
प्रधानमंत्री मोदी ने भी वैश्विक मंचों पर बार-बार यह रेखांकित किया है कि “यह युग युद्ध का नहीं है।” भारत की विदेश नीति और G20 की अध्यक्षता के दौरान दिया गया संदेश ‘One Earth, One Family, One Future’ (एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य) बापू के विश्व-बंधुत्व के विचार का ही विस्तार है।
डिजिटल युग और युवा पीढ़ी के लिए संदेश
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह पोस्ट केवल एक औपचारिक श्रद्धांजलि नहीं है, बल्कि यह देश की युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का एक ठोस प्रयास है। संस्कृत के श्लोकों के माध्यम से जीवन के उच्च आदर्शों को आधुनिक तकनीकी माध्यमों पर साझा करने से युवाओं में अपनी संस्कृति और बापू के विचारों के प्रति एक नई जिज्ञासा पैदा होती है।
आज की युवा पीढ़ी, जो डिजिटल दुनिया की तीव्र गति, मानसिक तनाव और प्रतिस्पर्धा में जी रही है, उसके लिए बापू के विचार और संस्कृत सुभाषितम का संदेश मानसिक शांति, समभाव और जीवन संतुलन का अनूठा मार्ग दिखाता है।
युवाओं के लिए मुख्य सीख:
- धैर्य और समभाव: सफलता और विफलता दोनों में मानसिक संतुलन बनाए रखना।
- अहंकार का त्याग: ज्ञान, पद और धन मिलने पर भी विनम्र बने रहना।
- पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता: ‘प्रकृति के पास हर व्यक्ति की जरूरत के लिए पर्याप्त है, लेकिन किसी के लालच के लिए नहीं’—बापू की इस बात को मानकर सतत जीवनशैली (Sustainable Lifestyle) अपनाना।
- डिजिटल अहिंसा: सोशल मीडिया पर नफरत, ट्रॉलिंग और द्वेष फैलाने के बजाय सद्भाव, सकारात्मकता और मैत्री भाव का प्रसार करना।
अमर प्रकाशस्तंभ और हमारा दायित्व
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा साझा किया गया संस्कृत सुभाषितम और उनका संदेश हमें यह याद दिलाता है कि महात्मा गांधी केवल इतिहास के पन्नों में दर्ज एक नाम नहीं हैं, बल्कि वे एक जीवित चेतना हैं। बापू का जीवन एक ऐसा प्रकाशस्तंभ है जो अंधकार भरे समय में मानवता को सही दिशा दिखाता है।
गांधी जयंती केवल फूल चढ़ाने या भाषण देने का दिन नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर झांकने, अपने विचारों को शुद्ध करने और समाज व राष्ट्र के निर्माण में अपना योगदान देने का संकल्प लेने का दिन है। यदि हम अपने जीवन में ‘अद्वेष्टा सर्वभूतानां’ (द्वेष न रखना) और ‘मैत्रः करुण एव च’ (मित्रता और करुणा) के सिद्धांतों का 1% भी उतार सकें, तो यही राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के प्रति हमारी सबसे सच्ची और अर्थपूर्ण श्रद्धांजलि होगी।
जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, बापू के विचार हर युग में मानवता का मार्ग प्रशस्त करते रहेंगे। आइए, हम सब मिलकर सत्य, अहिंसा, स्वच्छता, आत्मनिर्भरता और निःस्वार्थ सेवा के इस मार्ग पर चलने का संकल्प लें और एक सशक्त, समृद्ध और शांतिपूर्ण भारत का निर्माण करें।
॥ जय हिंद, जय भारत ॥
॥ वंदे मातरम ॥















