Advertisement

बस्तर दशहरा 2026: रथ शिल्पकारों के सम्मान में सेवानिवृत्त शिक्षिका मनकुंवर सोनी ने आयोजित किया ‘सेवा जोहार’ भोज, बांटे कंबल | प्रदेश खबर






बस्तर दशहरा: रथ शिल्पकारों के सम्मान में सेवानिवृत्त शिक्षिका मनकुंवर सोनी ने आयोजित किया ‘सेवा जोहार’ भोज | Pradesh Khabar News Network


बस्तर संस्कृति & विशेष कवरेज

बस्तर दशहरा 2026: आस्था, परंपरा और कृतज्ञता की अनूठी मिसाल; सिरहासार भवन में रथ निर्माण करने वाले शिल्पकारों का हुआ ऐतिहासिक ‘सेवा जोहार’

📍 स्थान: जगदलपुर, बस्तर (छत्तीसगढ़)
🗓️ दिनांक: 10 अक्टूबर 2026
✍️ संपादक: आशीष सिन्हा (प्रदेश खबर न्यूज नेटवर्क)

“जो हाथ विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा की पहचान और उसकी ऐतिहासिक धरोहर को गढ़ते हैं, उनकी निःस्वार्थ सेवा करना ही सच्ची ईश्वर पूजा है।” – श्रीमती मनकुंवर सोनी, सेवानिवृत्त शिक्षिका

जगदलपुर (प्रदेश खबर ब्यूरो)। विश्व प्रसिद्ध और लगभग 75 दिनों तक चलने वाले ऐतिहासिक बस्तर दशहरा पर्व की विशालता और भव्यता सिर्फ इसके बहुमंजिला आकार वाले विशालकाय रथों और रियासतकालीन धार्मिक रस्मों में ही समाहित नहीं है, बल्कि इसकी असली आत्मा उस अगाध जन-भागीदारी में बसती है जो पर्दे के पीछे रहकर इस पर्व को जीवंत बनाती है। बस्तर की इस 600 वर्ष से भी अधिक प्राचीन परंपरा और निष्ठावान शिल्पकारों के समर्पण को नमन करते हुए शनिवार, 10 अक्टूबर 2026 को जगदलपुर स्थित प्रसिद्ध सिरहासार भवन में एक बेहद भावुक, आत्मीय और वंदनीय दृश्य देखने को मिला, जहां आस्था, संस्कृति और कृतज्ञता एक साथ मुस्कुराते नजर आए।

जगदलपुर शहर के गंगानगर वार्ड की निवासी एवं सेवानिवृत्त शिक्षिका श्रीमती मनकुंवर सोनी ने अपने पूरे परिवार के साथ मिलकर बस्तर दशहरा के विशालकाय रथ का निर्माण करने वाले पारंपरिक शिल्पकारों एवं झाड़-उमरगांव व बेड़ा-उमरगांव से आए बढ़ई कारीगरों के लिए एक विशेष ‘सेवा जोहार’ सम्मान कार्यक्रम एवं न्यौता भोज का गरिमामय आयोजन किया । इस आयोजन ने स्थानीय निवासियों के साथ-साथ बस्तर दशहरा में शामिल होने आए श्रद्धालुओं के दिलों को छू लिया।

हुनरमंद हाथों का सम्मान: सिरहासार भवन में आयोजित हुआ गरिमामय न्यौता भोज

बस्तर दशहरा पर्व में रथ निर्माण की प्रक्रिया अत्यंत कठिन, जटिल और पूर्णतः पारंपरिक तकनीकों पर आधारित होती है। झारउमरगांव और बेड़ाउमरगांव के सैकड़ों ग्रामीण शिल्पकार बिना किसी आधुनिक मशीनरी या धातु की कीलों के, केवल पारंपरिक औजारों (जैसे टंगिया, कुल्हाड़ी, बसुला) की सहायता से इस विशालकाय रथ को रूप देते हैं। दिन-रात अपना खून-पसीना बहाकर ऐतिहासिक रथ को दिव्य स्वरूप प्रदान करने वाले इन हुनरमंद कारीगरों के सम्मान में श्रीमती मनकुंवर सोनी ने सिरहासार भवन परिसर में भव्य न्यौता भोज का प्रबंध किया ।

Gemini_Generated_Image_fohysbfohysbfohy
WhatsApp-Image-2026-03-12-at-6.48.17-PM-1-298x300 (1)
sjjj

कार्यक्रम के दौरान सबसे मनमोहक और आत्मीय क्षण वह था जब श्रीमती सोनी ने किसी औपचारिकता या दिखावे से परे हटकर, स्वयं अपने हाथों से इन श्रमसाधकों और शिल्पकारों को भोजन परोसा। एक पूर्व शिक्षिका के हाथों में सेवा की यह थाली बस्तर की उस सनातनी और जनजातीय संस्कृति का प्रतीक बन गई, जहाँ श्रम को ईश्वर का रूप माना जाता है।

“यह न्यौता भोज किसी सरकारी या सामाजिक औपचारिकता का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह मेरी अंतरात्मा से उपजी अगाध श्रद्धा, आत्मीयता और कृतज्ञता का प्रतीक है। जो हाथ बस्तर की सदियों पुरानी सांस्कृतिक पहचान को अपनी मेहनत से गढ़ते हैं, उनकी निष्काम सेवा करना ही मेरी दृष्टि में सच्ची भक्ति और ईश्वर पूजा है।”
— श्रीमती मनकुंवर सोनी (सेवानिवृत्त शिक्षिका, गंगानगर वार्ड, जगदलपुर)

शीत ऋतु के आगमन से पूर्व स्नेह की गर्माहट: कारीगरों को भेंट किए गए कंबल

कार्यक्रम का समापन केवल भोजन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका अंतिम चरण अत्यंत भावुक और ममतामयी रहा। भोजन उपरांत श्रीमती मनकुंवर सोनी, उनके परिजनों एवं सहयोगियों ने सिरहासार भवन में उपस्थित सभी बढ़ई कारीगरों, लोहारों और सहयोगियों को पूरे आदर एवं सम्मान के साथ तिलक लगाकर आगामी ठंड के मौसम को ध्यान में रखते हुए उच्च गुणवत्ता वाले कंबल भेंट स्वरूप प्रदान किए।

गुलाबी ठंड की दस्तक से ठीक पहले मिले इस पारिवारिक स्नेह, सम्मान और व्यावहारिक उपहार को पाकर वर्षों से पर्दे के पीछे रहकर काम करने वाले इन अनाम शिल्पकारों के चेहरों पर अद्भुत सुकून, आत्मसंतोष और कृतज्ञता की चमक साफ देखी जा सकती थी। कई वरिष्ठ कारीगरों ने भावुक होकर कहा कि रथ निर्माण के दौरान काम का तनाव और शारीरिक थकान होती है, लेकिन जब समाज से ऐसा अनूठा मान-सम्मान मिलता है, तो सारी थकान छूमंतर हो जाती है और मावली माता की सेवा का फल मिल जाता है।

जन-जन में चर्चा का विषय और समाज के लिए प्रेरणादायी मिसाल

पर्दे के पीछे रहकर बस्तर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को स्वरूप देने वाले इन पारंपरिक शिल्पकारों के प्रति एक सेवानिवृत्त शिक्षिका का यह अनूठा सम्मान पूरे जगदलपुर शहर और बस्तर अंचल में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। स्थानीय जन-प्रतिनिधियों, वरिष्ठ नागरिकों और बस्तर दशहरा समिति के सदस्यों ने श्रीमती मनकुंवर सोनी और उनके परिवार की इस पहल की भूरि-भूरि प्रशंसा की है।

लोगों का कहना है कि यह आयोजन केवल एक व्यक्ति का प्रयास नहीं है, बल्कि यह बस्तर की उस सामूहिक चेतना को जागृत करता है जो समाज के हर उस वर्ग को सम्मान देना सिखाती है, जो हमारी महान संस्कृति की नींव की ईंट बने हुए हैं। एक शिक्षक जीवन भर समाज को दिशा दिखाता है और सेवानिवृत्ति के बाद भी श्रीमती सोनी ने ‘सेवा जोहार’ के माध्यम से समाज को कृतज्ञता का पाठ पढ़ाया है।

एक नज़र में: बस्तर दशहरा रथ निर्माण की समृद्ध विरासत

प्रमुख बिंदु विवरण एवं ऐतिहासिक महत्व
परंपरा का इतिहास लगभग 616 वर्षों से निरंतर जारी रियासतकालीन परंपरा (काकतीय राजवंश कालीन)।
पारंपरिक गांव एवं शिल्पी झारउमरगांव एवं बेड़ाउमरगांव के लगभग 150 से अधिक ग्रामीण बढ़ई व शिल्पकार।
काष्ठ का चयन माचकोट और दरभा के जंगलों से लाई गई साल, तिनसा और बीजा प्रजाति की पवित्र लकड़ियां।
निर्माण तकनीक बिना किसी लोहे की कील या आधुनिक मशीनों के, केवल टंगिया, कुल्हाड़ी व पारंपरिक औजारों से निर्माण।
प्रमुख रथ प्रकार 4 चक्कों वाला ‘फूल रथ’ तथा 8 चक्कों वाला विशाल ‘विजय रथ’।
मुख्य निर्माण स्थल ऐतिहासिक सिरहासार भवन परिसर, जगदलपुर (बस्तर)।

बस्तर दशहरा 2026: जन-भागीदारी ही है इस पर्व की असली ताकत

उल्लेखनीय है कि बस्तर दशहरा अन्य भारतीय त्योहारों की भांति केवल रावण दहन या असत्य पर सत्य की विजय तक सीमित नहीं है, बल्कि यह माँ दंतेश्वरी और स्थानीय देवी-देवताओं के प्रति अगाध जन-आस्था का महापर्व है। 75 दिनों तक चलने वाले इस पर्व में पाट जात्रा, डेरी गढ़ाई, काछनगादी, जोगी बिठाई, फूल रथ परिक्रमा, निशा जात्रा, भीतर रैनी, बाहर रैनी और मुरिया दरबार जैसी दर्जनों दुर्लभ रस्में निभाई जाती हैं।

इन सभी रस्मों के सुचारू संचालन में बस्तर के विभिन्न जनजातीय समुदायों जैसे धाकड़, भतरा, मुरिया, माड़िया, हलबा और लोहार समाज के लोगों का निश्चित कार्य विभाजित है। सिरहासार भवन में आयोजित ‘सेवा जोहार’ कार्यक्रम ने यह साबित कर दिया है कि जब तक समाज में ऐसे संवेदनशील और कृतज्ञ नागरिक मौजूद हैं, तब तक बस्तर की यह लोक-संस्कृति और कारीगरी की समृद्ध परंपरा युगों-युगों तक अक्षुण्ण और अमर रहेगी।

कार्यक्रम की प्रमुख बातें (Key Highlights):

  • स्थान: सिरहासार भवन, जगदलपुर, जिला बस्तर (छ.ग.)।
  • आयोजक: श्रीमती मनकुंवर सोनी (सेवानिवृत्त शिक्षिका) एवं समस्त सोनी परिवार, गंगानगर वार्ड।
  • लाभार्थी: बस्तर दशहरा 2026 रथ निर्माण में संलग्न सभी पारंपरिक बढ़ई, शिल्पकार एवं श्रमिक।
  • मुख्य आकर्षण: सम्मानपूर्वक स्वादिष्ट न्यौता भोज, व्यक्तिगत सेवा भाव, तथा शीत ऋतु हेतु कंबल वितरण।
  • सामाजिक संदेश: श्रम का सम्मान, पारंपरिक संस्कृति का संरक्षण एवं सामुदायिक समरसता।

इस अनूठे सम्मान समारोह ने बस्तर दशहरा 2026 के भव्य माहौल में आत्मीयता की एक नई मिसाल कायम कर दी है, जिसकी गूंज आने वाले कई वर्षों तक बस्तर की वादियों में सुनाई देगी।

PK

प्रदेश खबर न्यूज नेटवर्क (Pradesh Khabar News Network)

संपादकीय प्रभाग – निष्पक्ष, सटीक और विश्वसनीय क्षेत्रीय समाचार


file_0000000093d882119d122d54d9d757b5
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.12.06
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.50.38
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.50.39
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.50.39 (1)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.50.40
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.50.40 (1)
WhatsApp-Image-2026-08-15-at-00.21.47