छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जस्टिस एके प्रसाद ने प्रदेश में 12,489 शिक्षकों की भर्ती के आरक्षण रोस्टर पर अहम फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने 2023 में जारी भर्ती विज्ञापन रद्द कर दिया है। इस भर्ती में 29 नवंबर 2012 की आरक्षण अधिसूचना और उसके आधार पर बनाए गए मॉडल रोस्टर को लागू किया गया था।
हाईकोर्ट ने साफ किया कि भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह रद्द नहीं होगी और पहले से नौकरी कर रहे शिक्षकों को भी तुरंत नहीं हटाया जाएगा। इन शिक्षकों की नियुक्ति और आगे होने वाली पदोन्नति पर फैसला सुप्रीम कोर्ट में चल रहे केस के नतीजे के बाद होगा।
राज्य शासन ने 4 मई 2023 को सहायक शिक्षक, शिक्षक और लैक्चरर के पदों पर भर्ती के लिए व्यापमं के जरिए विज्ञापन जारी किया था। इसमें सरगुजा और बस्तर संभाग समेत कई जिलों के लिए आरक्षण रोस्टर बनाया गया था। याचिकाकर्ताओं ने इस रोस्टर को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
डिवीजन बेंच ने 58% आरक्षण को असंवैधानिक माना था
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने 19 सितंबर 2022 को ही 2012 के 58% आरक्षण के नोटिफिकेशन और मॉडल रोस्टर को गलत ठहराते हुए रद्द कर दिया था। इसके बाद भी नया भर्ती विज्ञापन जारी किया गया।
साथ ही, अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग के लिए तय सीमा से ज्यादा यानी 60% से अधिक पद आरक्षित किए गए। याचिकाकर्ताओं ने इसे गलत बताया।
ST वर्ग के लिए 60% से ज्यादा पद आरक्षित
याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, E-कैडर के 1,113 पदों में से 698 पद अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग के लिए आरक्षित किए गए थे। यह कुल पदों का करीब 62.71% था। इसी तरह, T-कैडर के 4,659 पदों में से 3,105 पद एसटी वर्ग के लिए आरक्षित थे। यह करीब 66.64% था।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इससे अनारक्षित और दूसरे आरक्षित वर्गों के लिए पद कम हो गए।
2012 की आरक्षण व्यवस्था को 2022 में किया गया था रद्द
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि राज्य सरकार ने 29 नवंबर 2012 की अधिसूचना के जरिए आरक्षण बढ़ाकर 58% कर दिया था। इसमें अनुसूचित जाति (SC) को 12%, अनुसूचित जनजाति (ST) को 32% और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को 14% आरक्षण दिया गया था।
हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने 19 सितंबर 2022 को इस व्यवस्था को रद्द कर दिया था। इसके बाद राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई। सुप्रीम कोर्ट ने 1 मई 2023 को पहले से चल रही भर्ती और पदोन्नति की प्रक्रिया को अंतिम फैसले के अधीन पूरा करने की अनुमति दी थी।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इस आदेश के आधार पर रद्द की जा चुकी आरक्षण व्यवस्था के तहत नई भर्ती का विज्ञापन जारी नहीं किया जा सकता।

















