देशभर में दशहरे पर रावण दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का उत्सव मनाया जाता है, लेकिन छत्तीसगढ़ के बिलाईगढ़ में दशहरे की कहानी बिल्कुल अलग है। यहां करीब 150 साल से रावण का पुतला नहीं जलाया जाता। 5 पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा में राजपरिवार का शौर्य प्रदर्शन, तीरंदाजी और पारंपरिक खेल दशहरे की पहचान हैं।
इस आयोजन को देखने के लिए हर साल करीब 10 हजार लोग पहुंचते हैं। बिलाईगढ़ का राजशाही दशहरा अपनी अनूठी परंपरा के कारण प्रदेशभर में चर्चा में रहता है।
स्थानीय मान्यताओं के मुताबिक, यहां शुरू से ही रावण का पुतला जलाने की परंपरा नहीं रही है। हालांकि, कुछ साल पहले एक बार रावण दहन का आयोजन किया गया था। इसके बाद बस्ती में अनिष्ट होने की घटनाएं हुई। इसके बाद से रावण दहन नहीं करने की परंपरा फिर शुरू हो गई।
आज भी राजपरिवार और स्थानीय लोग इस मान्यता का पालन करते हैं। यही वजह है कि यहां दशहरे का उत्सव रावण दहन के बजाय पारंपरिक आयोजनों और राजशाही रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाता है।
जहां कभी युद्ध होते थे, वहां अब तीरंदाजी का रोमांच
बिलाईगढ़ के महल से करीब 2 किलोमीटर दूर रैनी भाटा मैदान है। राजाओं के जमाने में यहां युद्ध हुआ करते थे। युद्ध में जीतने वालों को महाराजा सम्मानित करते थे। समय बदला तो युद्ध की जगह पारंपरिक खेलों ने ले ली, लेकिन विजेताओं को सम्मानित करने की परंपरा आज भी कायम है।
दशहरे के आयोजन की तैयारियां कई दिन पहले से शुरू हो जाती हैं। आसपास के करीब 40 किलोमीटर के दायरे से लोग इसमें हिस्सा लेने पहुंचते हैं।
तीरंदाजी यहां के प्रमुख आकर्षणों में शामिल है। खिलाड़ी निशानेबाजी और अपने कौशल का प्रदर्शन करते हैं। दशहरे के दिन राजपरिवार के सदस्य विशेष पारंपरिक वेशभूषा और श्रृंगार में नजर आते हैं। उनका शौर्य प्रदर्शन इस आयोजन को दूसरी जगहों के दशहरे से अलग बनाता है।
राजपरिवार उठाता है पूरा खर्च, मेहमानों के भोजन की भी व्यवस्था
बिलाईगढ़ के राजशाही दशहरे की एक और खासियत यह है कि आयोजन का पूरा खर्च राजपरिवार उठाता है। दशहरा देखने आने वाले लोगों के भोजन की व्यवस्था भी राजपरिवार की ओर से की जाती है। इसके लिए किसी से आर्थिक सहयोग नहीं लिया जाता। इस आयोजन में प्रदेश के कई बड़े नेता और मंत्री शामिल हो चुके हैं।















