विजयादशमी पर श्री रघुनाथ पैलेस में बिखरी राजसी परंपरा की छटा: शस्त्र, गज, अश्व, नवग्रह एवं नगाड़ा पूजन संपन्न, कचहरी में उमड़ा आमजनों का जनसैलाब
1. राजपरंपरा का भव्य निर्वहन: दोपहर 12:00 बजे का मुख्य अनुष्ठान
विजयादशमी का दिन सरगुजा अंचल के लिए धार्मिक, सामाजिक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। रियासत काल से ही इस दिन सरगुजा राजपरिवार द्वारा शस्त्रों, ध्वजों, वाहनों और लोक प्रतीकों का पूजन किया जाता रहा है। इसी कड़ी में 20 अक्टूबर को दोपहर ठीक 12:00 बजे श्री रघुनाथ पैलेस प्रांगण में पूजा-अर्चना का विशाल एवं दिव्य कार्यक्रम प्रारंभ हुआ।
वैदिक मंत्रोच्चार और शंखध्वनि के बीच राजपुरोहितों एवं आचार्यों की उपस्थिति में अनुष्ठान का शुभारंभ हुआ। इस दौरान महाराज टी.एस. सिंह देव, राजा अरुणेश्वर शरण सिंह देव तथा युवराज आदित्येश्वर शरण सिंह देव ने पारंपरिक पोशाक धारण कर पूजा मंडप में स्थान ग्रहण किया।
अनुष्ठान में शामिल प्रमुख पारंपरिक पूजन घटक:
- कलश पूजन: मंगल कलश की स्थापना कर जल एवं औषधि-युक्त जल से वरुण देव और समस्त तीर्थों का आह्वान किया गया।
- अश्व पूजन (घोड़ा पूजन): शौर्य और गति के प्रतीक राजसी अश्वों का तिलक लगाकर, पुष्पमाला पहनाकर व मिष्ठान खिलाकर पूजन किया गया।
- गज पूजन (हाथी पूजन): समृद्धि, गरिमा और शक्ति के प्रतीक गजराज का विधिवत अर्चन किया गया।
- ध्वज पूजन: सरगुजा रियासत के ऐतिहासिक कुलध्वज का पूजन कर उसे पैलेस के मुख्य प्रांगण में नमन किया गया।
- नवग्रह पूजन: सृष्टि के संतुलन और क्षेत्र की शांति-समृद्धि हेतु नवग्रहों की विशेष शांति आहुति एवं अर्चना संपन्न की गई।
- नगाड़ा एवं वाद्य पूजन: मांगलिक और विजय सूचक वाद्य यंत्र नगाड़े का पूजन कर उसकी थाप के साथ विजय उत्सव का शंखनाद किया गया।
- शस्त्र पूजन: रियासतकालीन ऐतिहासिक तलवारों, कटारों, ढालों, बंदूकों एवं आधुनिक शस्त्रों को पूजा स्थल पर सजाकर पारंपरिक रूप से रोली-अक्षत से अर्चन किया गया।
राजसी अनुष्ठान एवं जनदर्शन की समय-सारणी समीक्षा
20 अक्टूबर को आयोजित कार्यक्रमों का समयबद्ध ब्योरा निम्नलिखित अनुसार रहा:
| समय | अनुष्ठान / कार्यक्रम | स्थान एवं विवरण |
|---|---|---|
| दोपहर 12:00 बजे | मुख्य धार्मिक एवं पारंपरिक अनुष्ठान | श्री रघुनाथ पैलेस प्रांगण – कलश, अश्व, गज, ध्वज, नवग्रह, नगाड़ा एवं शस्त्र पूजन। |
| पैलेस द्वार उद्घाटन एवं जनदर्शन | श्री रघुनाथ पैलेस के मुख्य द्वार आम नागरिकों एवं श्रद्धालुओं के लिए खोले गए। | |
| पारंपरिक कचहरी बैठक एवं दशहरा मिलन | पैलेस स्थित ऐतिहासिक कचहरी – महाराजा टी.एस. सिंह देव, राजा अरुणेश्वर शरण सिंह देव व युवराज आदित्येश्वर शरण सिंह देव द्वारा जनभेंट। |
2. श्री रघुनाथ पैलेस के द्वार: कचहरी में सजा जनदरबार
दोपहर का पूजन कार्यक्रम निर्विघ्न संपन्न होने के उपरांत अपराह्न 3:30 बजे सरगुजा के ऐतिहासिक श्री रघुनाथ पैलेस के विशाल मुख्य द्वार आम नागरिकों, बुजुर्गों, युवाओं और संभाग के दूर-दराज क्षेत्रों से आए लोगों के लिए खोल दिए गए।
पैलेस स्थित ऐतिहासिक ‘कचहरी’ में पूर्व मुख्यमंत्री एवं सरगुजा महाराजा टी.एस. सिंह देव, राजा अरुणेश्वर शरण सिंह देव एवं युवराज आदित्येश्वर शरण सिंह देव एक साथ आसीन हुए। यह वही कचहरी है जहाँ से सदियों से सरगुजा के जनमानस की समस्याओं, खुशियों और पर्वों को साझा करने की अनूठी परंपरा चली आ रही है।
कचहरी का द्वार खुलते ही हजारों की संख्या में उपस्थित लोगों ने राजपरिवार के सदस्यों को विजयादशमी की बधाई एवं शुभकामनाएं दीं। कई वरिष्ठ नागरिकों ने पारंपरिक रूप से पान, नारियल और भेंट अर्पित कर आशीर्वाद लिया, वहीं टी.एस. सिंह देव ने भी हर एक नागरिक का आत्मीयता से अभिवादन स्वीकार किया और उन्हें दशहरा पर्व की शुभकामनाएं दीं।
3. पूर्व संध्या पर हुई थी कुलदेवी माँ महामाया की विशेष संधि पूजा
दशहरा के इस भव्य कार्यक्रम की पूर्वपीठिका 19 अक्टूबर को महाष्टमी और महानवमी के संधि काल पर रखी गई थी। 19 अक्टूबर को सुबह 7:30 बजे से 8:30 बजे के मध्य सरगुजा की अधिष्ठात्री एवं कुलदेवी माँ महामाया देवी के मंदिर में विशेष श्रृंगार पूजा और ‘संधि पूजा’ अत्यंत श्रद्धा एवं भक्तिभाव से संपन्न की गई थी।
उस अवसर पर भी महाराजा टी.एस. सिंह देव एवं युवराज आदित्येश्वर शरण सिंह देव ने उपवास रखकर शास्त्रीय विधि-विधान के अनुसार संधि पूजा का अनुष्ठान पूरा किया था। संधि पूजा के पश्चात ही विजयादशमी के दिन होने वाले इन पारंपरिक आयोजनों का मार्ग प्रशस्त हुआ।
4. शस्त्र और गज-अश्व पूजन का सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक महत्व
भारतीय संस्कृति और विशेष रूप से भारतीय राजघरानों की परंपरा में विजयादशमी का दिन अधर्म पर धर्म और असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक माना जाता है। सरगुजा रियासत की परंपरा में शस्त्र पूजन केवल अस्त्र-शस्त्रों की पूजा नहीं, बल्कि राष्ट्र रक्षा, लोक-कल्याण और सत्य के मार्ग पर चलने के संकल्प का प्रतीक है।
“विजयादशमी का पर्व हमारी प्राचीन संस्कृति, लोक-मर्यादा और भाईचारे का संदेश देता है। सदियों से रघुनाथ पैलेस में शस्त्र, अश्व, गज और नवग्रह पूजन की परंपरा चली आ रही है, जो हमें अपनी जड़ों से जोड़कर रखती है और समाज में समरसता का संदेश देती है।”
— टी.एस. सिंह देव (पूर्व मुख्यमंत्री एवं सरगुजा महाराजा)
गज और अश्व पूजन का महत्व समझाते हुए राजपुरोहितों ने बताया कि पुराने समय में हाथी और घोड़े राज्य की सुरक्षा और समृद्धि के मुख्य आधार हुआ करते थे। आज के आधुनिक युग में भी इन जीवों का पूजन कर मनुष्य और प्रकृति के बीच के अटूट संबंध का आदर किया जाता है। नवग्रह पूजन का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र में अकाल, महामारी या प्राकृतिक आपदा से सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
5. जनदर्शन में दिखा अपार जनसैलाब और आत्मीयता का माहौल
20 अक्टूबर की शाम श्री रघुनाथ पैलेस का माहौल अत्यंत उत्सवी था। अम्बिकापुर शहर के अलावा सूरजपुर, बलरामपुर, कोरिया, मनेंद्रगढ़ और जशपुर जिलों से भी सैकड़ों ग्रामीण और गणमान्य नागरिक अपने महाराजा और जनप्रिय नेता टी.एस. सिंह देव से मिलने पहुँचे थे।
कचहरी परिसर में सुरक्षा और जनसुविधाओं के पुख्ता इंतजाम किए गए थे। युवाओं में युवराज आदित्येश्वर शरण सिंह देव के साथ फोटो खिंचवाने और विजयादशमी की बधाई देने की होड़ नजर आई। वहीं क्षेत्र के वरिष्ठ जनों ने राजा अरुणेश्वर शरण सिंह देव और टी.एस. सिंह देव से मिलकर सरगुजा की पुरानी यादों और रियासतकालीन परंपराओं को साझा किया।
दशहरा मिलन समारोह की मुख्य विशेषताएं:
- पारंपरिक स्वागत: पैलेस प्रांगण में आने वाले सभी आगंतुकों का पारंपरिक तरीके से स्वागत किया गया और उनके लिए जलपान की व्यवस्था की गई।
- सामाजिक समरसता: समाज के हर वर्ग, धर्म और समुदाय के प्रतिनिधियों ने पैलेस पहुँचकर राजपरिवार को दशहरा पर्व की बधाई दी।
- लोक कलाकारों की प्रस्तुति: पैलेस परिसर में स्थानीय सरगुजिहा लोक संगीत और नगाड़े की गूंज से माहौल पूरी तरह भक्तिमय और उत्सवपूर्ण बना रहा।
परंपरा, लोक-आस्था और आधुनिकता का सुंदर संगम
अम्बिकापुर के श्री रघुनाथ पैलेस में आयोजित यह विजयादशमी समारोह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं था, बल्कि यह सरगुजा की समृद्ध लोक-संस्कृति, ऐतिहासिक धरोहर और जनता के प्रति राजपरिवार के जुड़ाव का सशक्त प्रमाण था। 19 अक्टूबर को माँ महामाया की संधि पूजा से शुरू हुआ यह अनुष्ठान 20 अक्टूबर के शस्त्र पूजन और कचहरी जनदर्शन के साथ अत्यंत भव्यता और सौहार्दपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ।
क्षेत्रवासियों ने इस अवसर पर सुख-शांति और समृद्धि की मंगलकामनाएं व्यक्त कीं और यह संकल्प लिया कि सरगुजा की इस पावन सांस्कृतिक धरोहर को आने वाली पीढ़ियों के लिए इसी तरह जीवंत रखा जाएगा।













