शरद पूर्णिमा पर भूपेश बघेल ने दी देशवासियों को बधाई, बोले- ‘सोलह कलाओं से परिपूर्ण चंद्रमा करेगा अमृत वर्षा’
रायपुर / नई दिल्ली: आध्यात्मिक चेतना, वैज्ञानिक महत्व और लोक परंपराओं के पावन पर्व शरद पूर्णिमा के अवसर पर छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता भूपेश बघेल ने देश एवं प्रदेशवासियों को हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं दी हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ (पूर्व में ट्विटर) पर एक भावनात्मक संदेश साझा करते हुए उन्होंने समस्त जनमानस के जीवन में सुख, समृद्धि, प्रेम और खुशहाली की कामना की।
“शरद पूर्णिमा के पावन पर्व की आप सभी को सपरिवार हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।
ऐसा माना जाता है कि आज अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण चंद्रमा पृथ्वी के सबसे निकट होकर धरती पर अमृत की वर्षा करता है।
चंद्रदेव की असीम कृपा से हर परिवार में प्रेम, समृद्धि और खुशहाली आए ऐसी कामना है।”
पूर्व मुख्यमंत्री का यह संदेश न केवल एक औपचारिक शुभकामना है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति की उस सनातन परंपरा को रेखांकित करता है जिसमें प्रकृति, चंद्रमा, और ब्रह्मांडीय ऊर्जा का सीधा संबंध मानव स्वास्थ्य व मानसिक शांति से जोड़ा गया है।
भूपेश बघेल के संदेश का अर्थ और सांस्कृतिक संदर्भ
भूपेश बघेल ने अपने संदेश में विशेष रूप से चंद्रमा की ‘सोलह कलाओं’ और ‘अमृत वर्षा’ का उल्लेख किया है। सनातन परंपरा में यह मान्यता है कि संपूर्ण वर्ष में केवल शरद पूर्णिमा (जिसे कोजागरी पूर्णिमा या रास पूर्णिमा भी कहा जाता है) की रात को ही चंद्रमा अपनी समस्त 16 कलाओं से युक्त होता है।
भूपेश बघेल हमेशा से ही छत्तीसगढ़ की लोक परंपराओं, तीज-त्योहारों और सांस्कृतिक धरोहरों को बढ़ावा देने के लिए जाने जाते हैं। अपने कार्यकाल के दौरान भी उन्होंने पारंपरिक पर्वों (जैसे हरेली, तीजा-पोरा, माता कर्मा जयंती) पर सार्वजनिक अवकाश और भव्य आयोजनों की शुरुआत की थी। शरद पूर्णिमा पर उनका यह संदेश दर्शाता है कि वे भारतीय संस्कृति और प्रकृति-आधारित परंपराओं के प्रति गहराई से जुड़े हुए हैं।
चंद्रमा की 16 कलाएं क्या हैं? (आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विश्लेषण)
हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण को 16 कलाओं का अवतार माना गया है (जबकि श्रीराम 12 कलाओं के अवतार थे)। शरद पूर्णिमा की रात्रि चंद्रमा अपनी इन 16 कलाओं का पूर्ण प्रदर्शन करता है। ये 16 कलाएं मानव जीवन के 16 गुणों और चेतना के 16 स्तरों का प्रतिनिधित्व करती हैं:
चंद्रमा की 16 कलाओं की सूची:
- अमृत (Amrita): अमरता और पोषण देने वाली शक्ति।
- मनदा (Manada): मानसिक शांति और आनंद देने वाली कला।
- पुष्पा (Pushpa): जीवन में सुगंध और प्रफुल्लित करने वाली क्षमता।
- पुष्टि (Pushti): शारीरिक व मानसिक पोषण प्रदान करने वाली।
- तुष्टि (Tushti): संतोष और तृप्ति देने वाली शक्ति।
- धृति (Dhriti): धैर्य और सहनशीलता बढ़ाने वाली कला।
- ऋद्धि (Riddhi): समृद्धि और निरंतर विकास की शक्ति।
- सौम्या (Saumya): सौम्यता, शांति और शीतलता।
- मरीचि (Marichi): प्रकाश और ज्ञान की किरणें।
- अंशुमालिनी (Anshumalini): आभा और तेज प्रदान करने वाली।
- अंगिरा (Angira): ऊर्जा का संचार करने वाली कला।
- छाया (Chhaya): आश्रय और शीतलता प्रदान करने वाली।
- संपूर्णचंद्र (Sampurnachandra): पूर्णता का अहसास कराने वाली।
- तुषित (Tushita): परम आनंद और खुशी की अवस्था।
- अमृतात्मिका (Amritatmika): आत्मा को तृप्त करने वाली शक्ति।
- कामाचारिणी (Kamacharini): इच्छाओं को नियंत्रित व पूर्ण करने की क्षमता।
जब चंद्रमा इन सभी कलाओं से परिपूर्ण होकर पृथ्वी के सबसे करीब आता है, तो उसकी किरणों में विशेष प्रकार की दिव्य ऊर्जा और औषधीय तत्व समाहित होते हैं।
शरद पूर्णिमा और खीर रखने की वैज्ञानिक परंपरा
शरद पूर्णिमा की रात को खुले आसमान के नीचे (चांदनी में) चावल और दूध से बनी **खीर** रखने का विधान है। भूपेश बघेल ने अपने ट्वीट में जिस “अमृत वर्षा” का जिक्र किया है, उसका एक बहुत बड़ा वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक आधार भी है:
वैज्ञानिक एवं आयुर्वेदिक दृष्टि:
- औषधीय गुणों की वृद्धि: आश्विन मास में शरद ऋतु का आगमन होता है। इस समय पित्त दोष का प्रकोप बढ़ता है। चंद्रमा की ठंडी किरणें और दूध-चावल की ठंडी तासीर शरीर के पित्त को शांत करती है।
- चांदी के बर्तन का उपयोग: परंपरा के अनुसार खीर को चांदी के बर्तन में रखकर चांद की रोशनी में रखा जाता है। चांदी में प्राकृतिक एंटी-बैक्टीरियल गुण होते हैं। जब चंद्रमा की पराबैंगनी किरणें और दिव्य प्रकाश इस पर पड़ता है, तो इसमें लैक्टिक एसिड और पोषक तत्वों का संतुलन बेहतर होता है।
- आंखों और त्वचा के लिए लाभकारी: शरद पूर्णिमा की रात 15 से 20 मिनट तक चंद्रमा को एकटक देखना (त्रोटक क्रिया) आंखों की रोशनी के लिए अत्यंत लाभकारी माना गया है।
छत्तीसगढ़ की संस्कृति में शरद पूर्णिमा का स्थान
छत्तीसगढ़ राज्य अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और लोक जीवन के लिए जाना जाता है। भूपेश बघेल के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ की स्थानीय परंपराओं को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। छत्तीसगढ़ में शरद पूर्णिमा को विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है:
- कौशल्या माता मंदिर में विशेष उत्सव: रायपुर के पास स्थित चंदखुरी में माता कौशल्या का विश्व का एकमात्र मंदिर है। शरद पूर्णिमा के दिन यहां विशेष धार्मिक आयोजन और भजन-कीर्तन होते हैं।
- लोक गीतों और रासलीला का मंचन: छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में इस रात पंथी, रऊफ और स्थानीय लोक नृत्यों के साथ-साथ कृष्ण-रासलीला का आयोजन किया जाता है।
- धान की फसल और किसान समृद्धि: छत्तीसगढ़ को ‘धान का कटोरा’ कहा जाता है। शरद पूर्णिमा के समय खेतों में धान की फसल पक कर तैयार होने की स्थिति में होती है। किसान इसे अपनी मेहनत के फल और समृद्धि के रूप में देखते हैं। पूर्व सीएम का यह संदेश किसानों के जीवन में समृद्धि की कामना से भी जुड़ा हुआ है।
राजनीतिक परिदृश्य और पूर्व सीएम भूपेश बघेल की भूमिका
भूपेश बघेल न केवल छत्तीसगढ़ के प्रमुख जननेता हैं, बल्कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक मजबूत स्तंभ भी हैं। सोशल मीडिया पर उनके हर संदेश का एक बड़ा जन-प्रभाव होता है। उनके समर्थकों और आम जनता ने उनके इस संदेश का स्वागत किया और प्रतिक्रिया स्वरूप उन्हें भी बधाई संदेश भेजे।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जननेताओं द्वारा धार्मिक और सांस्कृतिक पर्वों पर दिए जाने वाले संदेश केवल औपचारिकता नहीं होते, बल्कि वे समाज को एक सूत्र में पिरोने और भाईचारे का संदेश देने का काम करते हैं। भूपेश बघेल ने अपने संदेश में “हर परिवार में प्रेम, समृद्धि और खुशहाली” की कामना कर सामाजिक सौहार्द पर बल दिया है।
शरद पूर्णिमा का धार्मिक और पौराणिक महत्व
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शरद पूर्णिमा का संबंध कई बड़ी धार्मिक घटनाओं से है:
मां लक्ष्मी का प्राकट्य (कोजागरी व्रत):
माना जाता है कि शरद पूर्णिमा के दिन समुद्र मंथन के दौरान धन की देवी **माता लक्ष्मी** का प्राकट्य हुआ था। इस रात माता लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करती हैं और देखती हैं कि कौन जाग रहा है (को जागर्ति?)। इसलिए इस रात श्रद्धालु जागरण करते हैं, लक्ष्मी पूजन करते हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण का महारास:
श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात ही भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन में यमुना तट पर गोपियों के साथ **’महारास’** रचाया था। उन्होंने अपनी योगमाया से रात्रि को कई महीनों के बराबर लंबा कर दिया था। यह प्रेम और भक्ति की पराकाष्ठा का प्रतीक है।
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का शरद पूर्णिमा पर दिया गया संदेश भारतीय जीवन मूल्यों, प्रकृति प्रेम और सामाजिक सद्भाव का प्रतीक है। शरद पूर्णिमा का पर्व हमें सिखाता है कि जिस प्रकार चंद्रमा अपनी शीतलता और प्रकाश से बिना किसी भेदभाव के पूरी पृथ्वी को नहला देता है, उसी प्रकार मानव जीवन में भी सौम्यता, प्रेम और सहयोग का भाव होना चाहिए।
चंद्रदेव की कृपा से देश और प्रदेश में शांति, भाइचारा और आर्थिक समृद्धि बनी रहे, यही इस पावन पर्व का मूल संदेश है।













