लकड़ी आयात के नाम पर 195 करोड़ का फर्जीवाड़ा! ED ने दिल्ली, करनाल और गोवा में मारा छापा, मुख्य आरोपी रडार पर






ED की बड़ी कार्रवाई: महेश टिम्बर प्राइवेट लिमिटेड के ठिकानों पर छापेमारी, 155 करोड़ रुपये से अधिक का बैंक धोखाधड़ी मामला उजागर

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ED की बड़ी कार्रवाई: मेसर्स महेश टिम्बर प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ दिल्ली, करनाल और गोवा सहित 11 ठिकानों पर ताबड़तोड़ छापेमारी; करोड़ों का अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग घोटाला उजागर

विशेष संवाददाता | अपडेटेड: 17 जून, 2026 | स्थान: नई दिल्ली

मुख्य बिंदु: प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स (OBC) और अन्य बैंकों के कंसोर्टियम के साथ हुई ₹155.21 करोड़ की धोखाधड़ी के मामले में धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002 के तहत देश के 11 परिसरों में व्यापक तलाशी अभियान चलाया है। जांच में बिना किसी वास्तविक आयात के ₹195.02 करोड़ के फर्जी फंड ट्रांसफर का सनसनीखेज खुलासा हुआ है।

1. प्रवर्तन निदेशालय (ED) का बड़ा एक्शन: 11 परिसरों पर एक साथ रेड

देश में वित्तीय धोखाधड़ी और शेल कंपनियों के जरिए विदेशों में धन भेजने वाले सिंडिकेट के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने अपनी कार्रवाई तेज कर दी है। प्राप्त आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, प्रवर्तन निदेशालय के चंडीगढ़ आंचलिक कार्यालय द्वारा दिनांक 16.06.2026 को एक बड़ा तलाशी अभियान चलाया गया। यह कार्रवाई मेसर्स महेश टिम्बर प्राइवेट लिमिटेड और उससे जुड़े प्रमोटरों तथा सहयोगियों के खिलाफ चल रही मनी लॉन्ड्रिंग जांच के सिलसिले में की गई है।

ED की टीमों ने देश के तीन प्रमुख राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों—करनार (करनाल), दिल्ली और गोवा में फैले कुल 11 परिसरों पर एक साथ छापेमारी की। इस कार्रवाई के दायरे में मुख्य आरोपी अशोक मित्तल, सौरभ ढींगरा, भारत भूषण मित्तल, रमन सिघल और अन्य से जुड़े ठिकाने शामिल रहे। जांच एजेंसी की इस अचानक हुई कार्रवाई से बैंकिंग और व्यापारिक हलकों में हड़कंप मच गया है।

2. मामले की पृष्ठभूमि और CBI की FIR

इस पूरे मामले की शुरुआत केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI), BS&FC, नई दिल्ली द्वारा दर्ज की गई एक प्राथमिकी (FIR) से हुई थी। CBI ने मेसर्स महेश टिम्बर प्रा. लि., उसके निदेशकों और अन्य अज्ञात लोक सेवकों व निजी व्यक्तियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC), 1860 की विभिन्न धाराओं और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PC Act) के तहत मामला दर्ज किया था।

CBI की इसी प्राथमिकी को आधार बनाते हुए प्रवर्तन निदेशालय ने धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002 के प्रावधानों के तहत अपनी आपराधिक जांच शुरू की। ED का मुख्य उद्देश्य अपराध की कमाई (Proceeds of Crime) का पता लगाना और इस बड़ी वित्तीय धोखाधड़ी के पीछे छिपे मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क को ध्वस्त करना है।

3. ₹155.21 करोड़ की वित्तीय हानि और धोखाधड़ी का तरीका (Modus Operandi)

जांच में यह बात सामने आई है कि यह पूरा मामला विदेशी साख-पत्रों (Foreign Letters of Credit – FLCs) में अनधिकृत रूप से किए गए स्विफ्ट (SWIFT) संशोधनों से जुड़ा हुआ है। आरोपियों ने बैंकिंग प्रणाली में सेंध लगाकर कोर बैंकिंग सॉफ्टवेयर (Finacle) में कोई समतुल्य प्रविष्टि (Matching Entry) किए बिना ही धोखाधड़ीपूर्ण तरीके से FLCs के मूल्य में भारी वृद्धि कर दी।

इस जालसाजी का सीधा परिणाम यह हुआ कि ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स (OBC) और बैंकों के पूरे कंसोर्टियम (संघ) को लगभग ₹155.21 करोड़ की भारी और अनुचित वित्तीय हानि उठानी पड़ी। इस राशि को सुनियोजित तरीके से बैंकिंग चैनल से निकाल लिया गया।

4. सनसनीखेज खुलासा: बिना लकड़ी आयात किए ₹195.02 करोड़ का ट्रांसफर

ED की गहन वित्तीय फॉरेंसिक जांच में जो तथ्य सामने आए हैं, वे बेहद चौंकाने वाले हैं। जांच के दौरान यह स्थापित हुआ कि मेसर्स महेश टिम्बर प्रा. लि. ने भारत और सिंगापुर में स्थित अपनी ही संबद्ध संस्थाओं (Sister Concerns) और कुछ संदिग्ध व्यक्तियों के साथ मिलकर एक गहरी आपराधिक साजिश रची।

इस साजिश के तहत, कागजों पर लकड़ी का आयात दिखाया गया, जबकि वास्तव में लकड़ी का कोई वास्तविक आयात (No Actual Import of Timber) हुआ ही नहीं था। बिना किसी वास्तविक व्यापार के, केवल हेरफेर किए गए विदेशी साख-पत्रों (FLCs) के माध्यम से लगभग ₹195.02 करोड़ की भारी-भरकम राशि को धोखाधड़ी से विदेशों में हस्तांतरित (Transfer) कर दिया गया।

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फर्जी दस्तावेजों का जाल (Fake Bills of Entry & Lading)

जब प्रवर्तन निदेशालय ने सीमा शुल्क (Customs) अधिकारियों के माध्यम से इन आयातों से जुड़े दस्तावेजों का भौतिक और डिजिटल सत्यापन (Verification) कराया, तो इस बड़े घोटाले की पुष्टि हो गई। सीमा शुल्क अधिकारियों की जांच में यह साफ हो गया कि बैंकों के समक्ष प्रस्तुत किए गए बड़ी संख्या में ‘बिल ऑफ एंट्री’ (Bills of Entry) और ‘बिल ऑफ लैडिंग’ (Bills of Lading) पूरी तरह से जाली और मनगढ़ंत (Fake and Fabricated) थे।

5. शेल कंपनियों का अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क (The Corporate Nexus)

जांच एजेंसी ने पाया कि इस अंतरराष्ट्रीय मनी लॉन्ड्रिंग और फंड डायवर्जन को अंजाम देने के लिए भारत से लेकर सिंगापुर तक कंपनियों का एक जटिल जाल (Nexus) तैयार किया गया था। इस नेटवर्क का मुख्य उद्देश्य बैंकों को गुमराह करना और पैसे को इस तरह घुमाना था कि उसकी वास्तविक प्रकृति छिप जाए।

इस सिंडिकेट द्वारा निम्नलिखित कंपनियों के नेटवर्क का उपयोग किया गया था:

  • मेसर्स अमेजन एक्सपोर्ट्स पीटीई. लि. (सिंगापुर)
  • मेसर्स महेश टिम्बर सिंगापुर पीटीई. लि. (सिंगापुर)
  • मेसर्स ट्रैफिक मीडिया इंडिया प्रा. लि.
  • मेसर्स ट्रैफिक मीडिया प्रा. लि.
  • मेसर्स बीवीएम शिपिंग पीटीई. लि. (शिपिंग कंपनी)
  • मेसर्स पर्ल मैरीटाइम पीटीई. लि. (शिपिंग कंपनी)

इस पूरे नेटवर्क के माध्यम से सिंगापुर से भारत में लकड़ी के फर्जी आयात का एक आभास (Mirage/Illusion) पैदा किया गया था। इस नकली आयात को दिखाकर ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स (OBC) को न केवल गुमराह किया गया, बल्कि बढ़ी हुई मूल्य राशि वाले विदेशी साख-पत्र (FLCs) धोखाधड़ी से जारी कराए गए। इसके बाद, लोन और क्रेडिट के रूप में मिली भारी राशि को वैध व्यापार के नाम पर सिंगापुर स्थानांतरित कर दिया गया।

6. मुख्य किरदारों की भूमिका और लेयरिंग (Layering) के सबूत

ED की जांच में इस पूरे घोटाले के मास्टरमाइंड और मददगारों की भूमिका स्पष्ट रूप से रेखांकित की गई है:

अशोक कुमार मित्तल, रमन सिंघल और दीपक सिंगला

जांच के दौरान इन तीनों व्यक्तियों की मुख्य भूमिका प्रमुख रूप से सामने आई है। दस्तावेजी साक्ष्यों से पता चला है कि संबंधित अवधि के दौरान अशोक कुमार मित्तल और रमन सिंघल मेसर्स महेश टिम्बर प्रा. लि., मेसर्स महेश रिसोर्सेज प्रा. लि., मेसर्स अमेजन एक्सपोर्ट्स पीटीई. लि. (सिंगापुर), मेसर्स महेश टिम्बर सिंगापुर पीटीई. लि., मेसर्स पर्ल मैरीटाइम, मेसर्स बीवीएम शिपिंग और मेसर्स ट्रैफिक मीडिया इंडिया प्रा. लि. जैसी कंपनियों में निदेशक (Director) एवं अन्य प्रमुख प्रबंधकीय पदों (Key Managerial Positions) पर कार्यरत थे। इन्हीं के इशारे पर बैंक खातों और शेल कंपनियों का संचालन किया जा रहा था।

सौरभ ढींगरा और भारत भूषण मित्तल

जांच में यह भी पाया गया कि वास्तविक आयात के बिना ही किए गए इन फर्जी लेन-देनों से अर्जित ‘अपराध की कमाई’ को ठिकाने लगाने में सौरभ ढींगरा और भारत भूषण मित्तल ने सक्रिय भूमिका निभाई। इन लोगों ने विभिन्न वित्तीय माध्यमों से पैसे को घुमाने (Routing) और उसकी कई परतें बनाने (Layering) में मुख्य आरोपियों की सहायता की, ताकि कानून प्रवर्तन एजेंसियों की नजरों से फंड को छुपाया जा सके।

7. छापेमारी में बरामदगी और आगामी कार्रवाई

16 जून को हुई इस व्यापक छापेमारी के दौरान ED को बड़ी सफलता हाथ लगी है। आरोपी सौरभ ढींगरा के परिसर से बिक्री विलेख (Sale Deed) समझौते बरामद किए गए हैं। इसके अलावा, पूरे घोटाले से संबंधित कई अन्य अपराध-संकेती दस्तावेज (Incriminating Documents) और डिजिटल/इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जब्त किए गए हैं, जो धन शोधन निवारण अधिनियम के प्रासंगिक प्रावधानों के तहत बेहद महत्वपूर्ण साक्ष्य हैं।

ED ने स्पष्ट किया है कि ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स और अन्य बैंकों को धोखा देकर अर्जित की गई इस पूरी ‘अपराध की कमाई’ (Proceeds of Crime) का अंतिम छोर तक पता लगाने के लिए आगे की जांच और फॉरेंसिक ऑडिट की कार्रवाई मुस्तैदी से जारी है। आने वाले दिनों में इस मामले में कुछ बड़ी गिरफ्तारियां भी संभव हैं।

मामले का त्वरित सारांश (Quick Reference Data)

विवरण घटक मामले से जुड़े तथ्य और आंकड़े
मुख्य आरोपी इकाई मेसर्स महेश टिम्बर प्राइवेट लिमिटेड एवं सहयोगी कंपनियां
कार्रवाई की तारीख 16 जून 2026 (छापेमारी), 17 जून 2026 (आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति)
प्रभावित बैंक ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स (OBC) एवं बैंकों का कंसोर्टियम
बैंकों को हुई अनुमानित हानि लगभग ₹155.21 करोड़
धोखाधड़ी से ट्रांसफर की गई कुल राशि लगभग ₹195.02 करोड़
छापेमारी वाले राज्य/स्थान करनाल (करनार), दिल्ली और गोवा (कुल 11 परिसर)
लागू कानून / अधिनियम धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002; IPC 1860; PC Act
संदर्भ सूचना: यह समाचार समीक्षा आधिकारिक दस्तावेज फाइल के रूप में उपलब्ध प्रवर्तन निदेशालय (ED) की प्रेस विज्ञप्ति (दिनांक 17.06.2026) में दिए गए आधिकारिक तथ्यों और बयानों पर आधारित है।