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गरियाबंद में जैविक कृषि कार्यशाला और किसान सम्मेलन संपन्न, खरीफ फसलों के लिए विशेषज्ञों ने दिए टिप्स






गरियाबंद में जैविक कृषि कार्यशाला एवं किसान सम्मेलन: खरीफ सीजन की शुरुआत के साथ किसानों को मिले उन्नत खेती के गुर


बारिश के आगाज के साथ गरियाबंद में जैविक कृषि कार्यशाला का आयोजन, खरीफ फसलों की तैयारी में जुटे जिले के किसान

प्रदेश खबर न्यूज नेटवर्क | स्थान: गरियाबंद, छत्तीसगढ़ | अपडेटेड: जून 2026

गरियाबंद। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में मानसून की पहली फुहारों के साथ ही खरीफ फसलों की तैयारियां तेजी से शुरू हो गई हैं। जैसे ही बारिश की शुरुआत हुई, वैसे ही अन्नदाता अपने खेतों को सहेजने और बुआई के काम को अंतिम रूप देने में व्यस्त हो गए हैं। इस महत्वपूर्ण मोड़ पर किसानों को सही दिशा देने, पारंपरिक और रासायनिक खेती के नुकसानों से बचाने तथा पर्यावरण के अनुकूल कृषि तकनीकों से जोड़ने के लिए एक सराहनीय कदम उठाया गया है।

कृषि विभाग द्वारा जिले के किसानों को जैविक खेती के प्रति जागरूक करने और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से कृषि विज्ञान केन्द्र (KVK) गरियाबंद के परिसर में एक वृहद ‘जैविक कृषि कार्यशाला एवं किसान सम्मेलन’ का भव्य आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में गरियाबंद जिले के विभिन्न सुदूर विकासखंडों से आए सैकड़ों किसानों, देश के जाने-माने कृषि विशेषज्ञों, क्षेत्र के प्रगतिशील कृषकों, कृषि विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों और जिले के जागरूक नागरिकों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

खरीफ सीजन 2026 के आगमन पर आयोजित इस विशेष सम्मेलन का मुख्य एजेंडा रासायनिक खादों पर निर्भरता कम करना और गरियाबंद की धरती की उर्वरा शक्ति को बचाना रहा। कार्यक्रम में पहुंचे विशेषज्ञों ने एक सुर में कहा कि जैविक खेती समय की मांग है।

कृषि विशेषज्ञों ने सिखाए जैविक खेती के आधुनिक गुर

कार्यशाला के तकनीकी सत्रों में कृषि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने उपस्थित किसानों को संबोधित करते हुए जैविक खेती की उन्नत तकनीकों पर विस्तार से प्रकाश डाला। वैज्ञानिकों ने इस बात पर जोर दिया कि कैसे किसान अपने घर और खेतों में मौजूद संसाधनों का उपयोग करके ही उच्च गुणवत्ता वाली फसलें तैयार कर सकते हैं। कार्यशाला में मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदुओं पर गहन प्रशिक्षण दिया गया:

1. जैविक खाद एवं जैव उर्वरकों का सही उपयोग

कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने किसानों को केंचुआ खाद (वर्मी कम्पोस्ट), नाडेप कम्पोस्ट, हरी खाद और जीवामृत बनाने की व्यावहारिक विधि समझाई। उन्होंने बताया कि मिट्टी में रासायनिक तत्वों के अनियंत्रित उपयोग से जो सूक्ष्म जीवाणु नष्ट हो रहे हैं, उन्हें जैव उर्वरकों (जैसे राइजोबियम, एज़ोटोबैक्टर और पीएसबी कल्चर) के प्रयोग से पुनः जीवित किया जा सकता है।

2. प्राकृतिक कीट एवं रोग प्रबंधन

फसलों में लगने वाली बीमारियों और कीटों के नियंत्रण के लिए महंगे और जहरीले रासायनिक कीटनाशकों के स्थान पर स्थानीय स्तर पर तैयार किए जाने वाले उपायों की जानकारी दी गई। विशेषज्ञों ने नीम तेल, दसपर्णी अर्क, ब्रह्मास्त्र और मट्ठा जनित कीटनाशकों के निर्माण और उनके छिड़काव की समय-सारणी साझा की। इससे न केवल फसलों की सुरक्षा होगी, बल्कि उत्पादन लागत भी शून्य के करीब आ जाएगी।

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3. मृदा स्वास्थ्य संरक्षण (Soil Health)

कार्यक्रम में बताया गया कि मिट्टी का स्वास्थ्य सीधे मानव स्वास्थ्य से जुड़ा है। यदि मिट्टी बीमार होगी, तो उसमें उगने वाला अनाज भी पौष्टिक नहीं हो सकता। लगातार रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग से मिट्टी कठोर होती जा रही है और उसकी जलधारण क्षमता घट रही है। जैविक खेती अपनाने से मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ती है, जिससे मिट्टी अधिक समय तक नमी सोख कर रख सकती है।

रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों और आर्थिक फायदों पर मंथन

सम्मेलन के दौरान किसानों को रासायनिक खेती के गंभीर दुष्प्रभावों के प्रति सचेत किया गया। अधिकारियों और डॉक्टरों ने बताया कि पिछले कुछ दशकों में कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग के कारण न केवल मानव स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ा है और गंभीर बीमारियां बढ़ी हैं, बल्कि पर्यावरण, मित्र कीट, और भूजल स्तर भी बुरी तरह प्रभावित हुए हैं।

इसके विपरीत, जैविक खेती के आर्थिक और पर्यावरणीय फायदों के बारे में बताते हुए विशेषज्ञों ने कहा कि शुरुआत में भले ही उत्पादन में थोड़ा संतुलन बनाना पड़े, लेकिन दीर्घकालिक रूप से यह खेती किसानों को कर्ज के जाल से मुक्त करती है। चूंकि इसमें बाजार से महंगी खाद और दवाइयां खरीदने की आवश्यकता नहीं होती, इसलिए खेती की लागत काफी घट जाती है।

प्रगतिशील किसानों ने साझा किए अपने जमीनी अनुभव

इस किसान सम्मेलन की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसमें केवल सैद्धांतिक बातें नहीं हुईं, बल्कि गरियाबंद के उन प्रगतिशील किसानों ने मंच संभाला जो पिछले कई वर्षों से सफलतापूर्वक जैविक खेती कर रहे हैं। उन्होंने अपनी सफलता की कहानियां साझा करते हुए बताया कि कैसे जैविक पद्धति अपनाने के बाद उनकी फसलों की गुणवत्ता में अभूतपूर्व सुधार हुआ है।

प्रगतिशील कृषकों ने बताया कि आज के समय में बाजार में रसायनों से मुक्त अनाज, फल और सब्जियों की मांग बहुत तेजी से बढ़ रही है। जागरूक उपभोक्ता जैविक उत्पादों के लिए अधिक मूल्य देने को तैयार हैं। ऐसे में उन्हें अपनी उपज का स्थानीय बाजारों के साथ-साथ बड़े शहरों में भी बहुत बेहतर और प्रीमियम मूल्य प्राप्त हो रहा है।

किसानों का सम्मान: जैविक कृषि के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले और अन्य ग्रामीणों को प्रेरित करने वाले प्रगतिशील कृषकों को मंच पर शॉल एवं श्रीफल भेंट कर सम्मानित किया गया, ताकि जिले में जैविक आंदोलन को और गति मिल सके।

सरकारी योजनाओं की मिली विस्तृत जानकारी

कार्यक्रम में मौजूद किसानों की विभिन्न शंकाओं और जिज्ञासाओं का कृषि विशेषज्ञों द्वारा त्वरित समाधान किया गया। इसी कड़ी में अनिल कौशिक, सहायक संचालक कृषि ने मंच से शासन द्वारा जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए चलाई जा रही विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं और अनुदानों की जानकारी दी। उन्होंने किसानों से अपील की कि वे इन शासकीय योजनाओं का अधिक से अधिक लाभ उठाएं और सामूहिक रूप से जैविक खेती के क्लस्टर तैयार करें, ताकि विपणन और प्रमाणीकरण (Certification) में आसानी हो।

वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिकों और विभागीय अधिकारियों की रही गरिमामयी उपस्थिति

गरियाबंद के इस किसान महाकुंभ को सफल बनाने में कृषि वैज्ञानिकों और विभागीय अमले का विशेष योगदान रहा। इस अवसर पर प्रमुख रूप से:

  • डॉ मनीष चौरसिया (कृषि वैज्ञानिक)
  • डॉ देवेन्द्र देवांगन (मृदा विशेषज्ञ)
  • डॉ सत्येन्द्र पाटले (फसल सुरक्षा विशेषज्ञ)
  • डॉ शालू अब्राहम (उद्यानिकी विशेषज्ञ)
  • डॉ तुषार मिश्रा (कृषि विशेषज्ञ)

इसके साथ ही बड़ी संख्या में अन्य कृषि वैज्ञानिक, ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी (RAEO) और कृषि विभाग के मैदानी कर्मचारी उपस्थित थे, जिन्होंने किसानों के साथ बैठकर उनकी व्यावहारिक समस्याओं को समझा और उनके निराकरण के उपाय सुझाए। खरीफ सीजन के ठीक पहले आयोजित इस सम्मेलन से गरियाबंद जिले के किसानों में एक नया उत्साह देखा जा रहा है और उम्मीद है कि इस साल जिले में जैविक खेती के रकबे में रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की जाएगी।


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