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रायगढ़ : कोविड में आक्सीजन ड्राप होने पर घर में रहने का निर्णय मरीज के सेहत के लिए हो सकता है घातक

कोविड में आक्सीजन लेवल ड्राप होने पर आक्सीजन के साथ ही उचित दवाओं का निर्णय भी चिकित्सकों द्वारा मरीज के मेडिकल हिस्ट्री के मुताबिक लिया जाता है

94 से कम आया आक्सीजन सैचुरेशन तो तुरंत हास्पिटल में एडमिट होइये, रिकवरी की संभावना होगी अधिकतम

रायगढ़, 07 मई2021पुरानी कहावत है कि अधूरा ज्ञान खतरनाक होता है। फिर कोविड जैसी बीमारी, ऐसे में यदि किसी मरीज के परिजन डॉक्टर की सलाह की उपेक्षा कर मरीज के ट्रीटमेंट पर अपना निर्णय लें तो मरीज की रिकवरी के लिए गंभीर खतरा हो सकता है। कोविड पर शासन की गाइडलाइन है कि 94 से कम आक्सीजन सैचुरेशन आने पर मरीज को हॉस्पिटल की देखरेख में रखा जाना ही उसके स्वास्थ्य के लिए बेहतर है। इस संबंध में सीएमएचओ डॉ.केशरी ने विस्तार से जानकारी दी कि किस तरह होम आइसोलेशन की गाइडलाइन का पालन कर कोविड से रिकवरी का रास्ता सुनिश्चित किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि होम आइसोलेशन में रह रहे लोगों को लगातार ऑक्सीजन सैचुरेशन की जाँच करनी है और 94 से कम आते ही काउंसलर को जानकारी देनी है तथा हॉस्पिटल में एडमिट होना है। ऐसा करने से रिकवरी की संभावना काफी बढ़ जाती है। उन्होंने कहा कि देखा गया है कि कुछ मामलों में मरीज के परिजन ऑक्सीजन लेवल डाउन होने पर घर में ही ऑक्सीजन सिलेंडर की व्यवस्था में लग जाते हैं जबकि हास्पिटल में ऑक्सीजन बेड्स के साथ ही मेडिकल सुपरविजन भी होता है और मरीज की मेडिकल हेल्थ के मुताबिक दवा भी दी जाती है। मरीज का ऑक्सीजन लेवल डाउन होने के साथ ही उनके इलाज के लिए डॉक्टर एंटीबायोटिक और स्टेराइड प्लान करते हैं घर में इस तरह का प्लान संभव ही नहीं है जिसके कारण से पेशेंट की स्थिति बिगड़ जाती है। ज्यादा खराब स्थिति में अस्पताल आने में रिकवरी की संभावना घट जाती है। डॉ.केशरी ने बताया कि कई बार मरीज के परिजन ऑक्सीजन लेवल ड्राप होने की जानकारी नहीं देते और कई बार फोन भी बंद कर देते हैं। ऐसी स्थिति उनके मरीजों के लिए घातक हो सकती है। डॉ.केशरी ने कहा कि जिले में पर्याप्त संख्या में ऑक्सीजन बेड्स उपलब्ध हैं अतएव मरीजों के परिजनों को चाहिए कि 94 से नीचे ऑक्सीजन लेवल आते ही किसी तरह का जोखिम नहीं ले।

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जानिये अस्पताल आने से पेशेंट के ट्रीटमेंट में क्या बेहतर
डॉ.केशरी ने कहा कि कोविड मरीजों के लिए एकमात्र ऑक्सीजन ही इलाज नहीं है। ऑक्सीजन की उपलब्धता हो जाने के बाद मेडिसीन भी स्थिति के मुताबिक दिया जाना जरूरी है। आक्सीजन लेवल के अनुसार और कोमार्बिडिटी (बीपी, शुगर, थायराइड जैसी बीमारियां) देखते हुए डॉक्टर मेडिसीन प्लान करते हैं। मरीज की स्थिति के मुताबिक एंटीबायोटिक दवाएं तय की जाती हैं। स्टेराइड्स तय किये जाते हैं। सही मौके पर सही दवा के प्रयोग से रिकवरी की संभावना काफी बढ़ जाती है।
घर में रह गये तो किस तरह के नुकसान की आशंका
पहली बात तो यह कि मरीज के घर में रहने से उपयुक्त दवा का प्लान नहीं किया जा सकता और मरीज केवल आक्सीजन के भरोसे रहेगा। डॉ.केशरी ने दूसरी महत्वपूर्ण बात यह बताई कि मरीज के ऑक्सीजन लेवल के मुताबिक उसे आक्सीजन दिये जाने का प्लान हास्पिटल में होता है। पहले चरण में आक्सीजन सिलेंडर के माध्यम से, फिर इसके बाद थोड़ी गंभीर जरूरत होने पर हाई कंसट्रेटर मास्कर के माध्यम से ऑक्सीजन दिया जाता है। तीसरा और चौथा चरण एनआईवी और वेंटिलेटर का होता है। कई बार मरीज के परिजन पेशेंट को घर में ही रखते हैं मरीज को पहले चरण की जरूरत तो सामान्य ऑक्सीजन सिलेंडर से पूरी हो सकती है लेकिन दूसरे, तीसरे और चौथे चरण के लिए घर में कोई व्यवस्था नहीं होती। यदि मरीज ऑक्सीजन लेवल के डाउन होने के शुरूआती स्टेज में ही अस्पताल आ जाए तो इस बात की न्यूनतम आशंका होगी कि मरीज तीसरे या चौथे चरण तक पहुँचे। उन्होंने कहा कि सैचुरेशन कम होने के बावजूद घर में मरीजों को रखे रहने के निर्णय का असर मरीज के सेहत पर पड़ता है और तेजी से आक्सीजन लेवल कम होने से फेफड़ों की जो क्षति होने लगती है उसे ठीक नहीं किया जा सकता।

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