

सोमवार की सुबह रामगढ़ की ऐतिहासिक पर्वत श्रृंखलाओं के साये में आयोजित मुख्य मंच पर वैदिक मंत्रोच्चार और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की गूंज के साथ पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री श्री राजेश अग्रवाल ने दीप प्रज्वलित कर दो दिवसीय महोत्सव का विधिवत उद्घाटन किया। इस अवसर पर उनके साथ क्षेत्र के जनप्रिय जनप्रतिनिधि, प्रबुद्ध साहित्यकार, इतिहासकार, वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी तथा अत्यंत विशाल संख्या में स्थानीय नागरिक एवं दूर-दराज से आए कलाप्रेमी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के विशिष्ट गौरव के रूप में क्षेत्रीय सांसद श्री चिंतामणि महाराज, लुंड्रा विधानसभा क्षेत्र के विधायक श्री प्रबोध मिंज, जिला पंचायत के उपाध्यक्ष श्री देवनारायण यादव, जिला सहकारी केंद्रीय बैंक के अध्यक्ष श्री राम किशुन सिंह तथा पूर्व सांसद श्री कमलभान सिंह मरावी मंच पर आसीन रहे। इनके अतिरिक्त स्थानीय शासन के जन-प्रतिनिधियों में जिला पंचायत सदस्य श्रीमती राधा रवि एवं श्रीमती रायमुनिया कुरियम, जनपद पंचायत अध्यक्ष श्री आलोक सिंह, जनपद उपाध्यक्ष श्री सिद्धार्थ सिंह, शहर के प्रतिष्ठित पार्षद श्री आलोक दुबे तथा एल्डरमैन श्री करता राम गुप्ता ने भी अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज कराई।
प्रशासनिक तंत्र की मुस्तैदी और कुशल प्रबंधन को रेखांकित करते हुए कार्यक्रम में सरगुजा जिले के कलेक्टर श्री अजीत वसंत, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक श्री राजेश अग्रवाल, तथा जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) श्री विनय कुमार अग्रवाल सहित विभिन्न विकासखंडों और विभागों के आला अधिकारी-कर्मचारी पूरी मुस्तैदी के साथ उपस्थित रहे। अतिथियों का स्वागत पारंपरिक जनजातीय सूत माला, साफा और प्रतीक चिन्ह भेंट कर किया गया, जो सरगुजा की आतिथ्य सत्कार परंपरा का एक अभिन्न अंग है।
सभागार और विशाल पंडाल में उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए छत्तीसगढ़ शासन के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री श्री राजेश अग्रवाल ने अत्यंत ओजस्वी और विजनरी वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि माननीय मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के कुशल एवं संवेदनशील नेतृत्व में राज्य सरकार प्रदेश की अमूल्य और प्राचीन सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण, संवर्धन और उनके पुनरुद्धार के लिए पूरी निष्ठा के साथ निरंतर कार्य कर रही है। छत्तीसगढ़ की धरती कला, संस्कृति और अध्यात्म का उद्गम स्थल है, और रामगढ़ इसका सबसे दीप्तिमान केंद्र है।
मंत्री श्री अग्रवाल ने विशेष रूप से रेखांकित किया कि रामगढ़ महोत्सव केवल सरगुजा अंचल की स्थानीय लोक संस्कृति का प्रदर्शन मात्र नहीं है, बल्कि यह इतिहास, पुरातत्व, साहित्य और पर्यटन का एक ऐसा अनूठा वैश्विक संगम है, जो हमारी आने वाली युवा पीढ़ियों को अपनी गौरवशाली ऐतिहासिक विरासत, नैतिक मूल्यों और जड़ों से जोड़ने का सबसे सशक्त, वैचारिक और जीवंत माध्यम बनेगा। उन्होंने उपस्थित जनों को बधाई देते हुए एक अत्यंत महत्वपूर्ण मील के पत्थर की घोषणा की। उन्होंने बताया कि रामगढ़ महोत्सव ने अपने सफल आयोजन के गौरवशाली 50 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। इस स्वर्ण जयंती वर्ष के अवसर पर उन्होंने समूचे प्रदेशवासियों और सरगुजा की जनता को हार्दिक शुभकामनाएं दीं।
मंत्री श्री राजेश अग्रवाल ने स्पष्ट किया कि रामगढ़ केवल सरगुजा जिले या छत्तीसगढ़ राज्य की सीमा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समूचे भारतवर्ष की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान का एक अमूल्य और ऐतिहासिक केंद्र बिंदु है। उन्होंने घोषणा की कि राज्य सरकार रामगढ़ को राष्ट्रीय के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र (International Tourism Map) पर एक प्रमुख गंतव्य के रूप में स्थापित करने के लिए दीर्घकालिक और सुनियोजित योजनाएं तैयार कर रही है और इसके लिए हर संभव बजटीय व ढांचागत प्रयास किए जा रहे हैं।
अपने संबोधन को आगे बढ़ाते हुए मंत्री अग्रवाल ने आगंतुकों और विशेषकर युवा शोधकर्ताओं के लिए की गई विशेष व्यवस्थाओं की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इस दो दिवसीय महोत्सव के दौरान सभी आगंतुकों को विश्व की सबसे प्राचीनतम नाट्यशाला (Oldest Amphitheater of the World) के रूप में प्रख्यात ‘सीताबेंगरा गुफा’ (Sitabengra Cave), ऐतिहासिक व रहस्यमयी ‘जटायु और कालिदास की स्मृतियों से युक्त जोगीमारा गुफा’ (Jogimara Cave), अद्भुत रामगढ़ पर्वत श्रृंखला तथा क्षेत्र के अन्य महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों का भ्रमण कराया जा रहा है।
उन्होंने यह भी जोड़ा कि केवल भ्रमण ही नहीं, बल्कि इतिहास, कला और पुरातत्व के राष्ट्रीय स्तर के विशेषज्ञों को आमंत्रित किया गया है, जो इन ऐतिहासिक स्थलों के भूगर्भीय, सांस्कृतिक और पुरातात्विक महत्व की अत्यंत विस्तृत, वैज्ञानिक और प्रामाणिक जानकारी आगंतुकों को प्रदान करेंगे। इससे हमारी नई पीढ़ी अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को कोरे अध्यात्म से आगे बढ़कर तार्किक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझ सकेगी। मंत्री ने एक और बड़ी घोषणा करते हुए बताया कि इस दो दिवसीय भव्य महोत्सव के समापन समारोह में छत्तीसगढ़ के माननीय मुख्यमंत्री विष्णु देव साय मुख्य अतिथि के रूप में सम्मिलित होंगे, जो इस महोत्सव के प्रति राज्य शासन की उच्च प्राथमिकताओं को दर्शाता है।
समारोह के विशिष्ट वक्ता, क्षेत्रीय सांसद श्री चिंतामणि महाराज ने अपने उद्बोधन में रामगढ़ के आध्यात्मिक और पौराणिक आयामों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि रामगढ़ भारत की अत्यंत प्राचीन और सनातन सांस्कृतिक चेतना का एक जीवंत ऊर्जा केंद्र है। जन-आस्था और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री रामचंद्र जी ने अपने चौदह वर्षों के कठिन वनवास काल का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और लंबा समय इसी रामगढ़ के घने जंगलों और गुफाओं में व्यतीत किया था। यह भूमि भगवान राम के चरणों से पवित्र है।
सांसद ने आगे जोड़ते हुए कहा कि यह वही पावन भूमि है जहां संस्कृत साहित्य के देदीप्यमान नक्षत्र महाकवि कालिदास ने अपने अमर ग्रंथ ‘मेघदूतम्’ (Meghdootam) की कालजयी रचना की थी। रामगढ़ की वादियों की सुंदरता और विरह की तड़प ने ही कालिदास की लेखनी को प्रेरित किया था। सीताबेंगरा, जोगीमारा, प्राचीन राम-जानकी मंदिर और विशालकाय ‘हाथीपोल’ जैसे अद्वितीय और विस्मयकारी ऐतिहासिक स्थल विश्व पर्यटन के क्षितिज पर अपनी एक विशिष्ट और अमिट पहचान बनाने की संपूर्ण वैज्ञानिक व ऐतिहासिक क्षमता रखते हैं। उन्होंने संकल्प लिया कि सभी जनप्रतिनिधियों, शासन और जनता के सामूहिक व समन्वित प्रयासों से रामगढ़ को एक विश्वस्तरीय पर्यटन स्थल (World Class Tourist Destination) के रूप में प्रतिष्ठित किया जाएगा।
इसी क्रम में लुंड्रा क्षेत्र के माननीय विधायक श्री प्रबोध मिंज ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि रामगढ़ को केवल एक धार्मिक आस्था के केंद्र के संकुचित चश्मे से नहीं देखा जा सकता; यह स्थल ऐतिहासिक, पुरातात्विक और साहित्यिक दृष्टिकोण से भी वैश्विक महत्व का हकदार है। यहां की समृद्ध जनजातीय सांस्कृतिक विरासत और प्रकृति द्वारा बख्शा गया बेजोड़ नैसर्गिक सौंदर्य पर्यटन की असीम संभावनाओं से लबालब भरा हुआ है। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि इस महान धरोहर को वैश्विक स्तर (Global Scale) पर प्रचारित-प्रसारित करने के साथ-साथ इसके मूल स्वरूप को भावी पीढ़ियों के लिए संरक्षित और पुनर्जीवित करना आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
इससे पूर्व, सरगुजा के जिला कलेक्टर श्री अजीत वसंत ने गरिमामयी मंच से सभी आगंतुक अतिथियों, मंत्रियों, जनप्रतिनिधियों, पत्रकारों, साहित्यकारों और विशाल संख्या में पधारे नागरिकों का जिले की ओर से आत्मीय स्वागत व अभिनंदन किया। उन्होंने अपना स्वागत प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए कहा कि रामगढ़ महोत्सव सरगुजा की प्राचीन, समृद्ध और अनूठी सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय और प्रांतीय स्तर पर एक नई, सुदृढ़ पहचान दिलाने का सबसे सशक्त और प्रभावी लोकतांत्रिक मंच बन चुका है।
कलेक्टर ने विशेष रूप से इस बात का उल्लेख किया कि इस वर्ष के आयोजन में शासन के निर्देशानुसार स्थानीय ग्रामीण कलाकारों, लुप्तप्राय होती लोक संस्कृति और पारंपरिक जनजातीय कलाओं को विशेष और प्राथमिकता के आधार पर स्थान दिया गया है। इससे हमारी छुपी हुई ग्रामीण और आंचलिक प्रतिभाओं को जिला और राज्य स्तर के मंचों पर अपनी अद्भुत कला प्रदर्शित करने का एक सुनहरा और न्यायसंगत अवसर प्राप्त हो रहा है। उन्होंने दृढ़ विश्वास व्यक्त किया कि रामगढ़ की यह अनूठी ऐतिहासिक और पुरातात्विक पहचान आने वाले भविष्य में वैश्विक स्तर पर और अधिक मजबूत व सशक्त होकर उभरेगी, जिससे देश-विदेश के अधिकाधिक पर्यटक, शोधकर्ता और इतिहासकार इस पावन धरोहर की ओर आकर्षित होंगे और क्षेत्र के आर्थिक विकास को भी गति मिलेगी। उन्होंने सभी नागरिकों से अपील की कि वे महोत्सव के दौरान आयोजित होने वाले सभी साहित्यिक व सांस्कृतिक कार्यक्रमों में सपरिवार बढ़-चढ़कर हिस्सा लें और इस ऐतिहासिक धरोहर के आनंद का रसास्वादन करें।
रामगढ़ महोत्सव-2026 के प्रथम दिवस की सांस्कृतिक संध्या पूरी तरह से अध्यात्म, कला और उत्कृष्ट अभिनय के रंग में सराबोर रही। कार्यक्रम का मुख्य और सबसे बहुप्रतीक्षित आकर्षण देश की राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली से विशेष रूप से आमंत्रित ख्याति प्राप्त और सिद्धहस्त कलाकारों के दल द्वारा प्रस्तुत की गई भव्य रामलीला रही। दिल्ली के इन मँजे हुए कलाकारों ने मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री रामचंद्र जी के पावन जीवन प्रसंगों का ऐसा जीवंत, मनमोहक और अत्यंत प्रभावशाली मंचन किया कि उपस्थित हजारों दर्शक सीधे त्रेतायुग की अलौकिक अनुभूति में बह गए।
कलाकारों ने भगवान राम के आदर्श जीवन मूल्यों, उनके धर्म, अटूट सत्य निष्ठा, महान त्याग, भ्रातृ प्रेम और कर्तव्यपरायणता को अपने सशक्त अभिनय और सुस्पष्ट, ओजपूर्ण संवादों के माध्यम से दर्शकों के सामने साकार कर दिया। इस भव्य रामलीला मंचन की तकनीकी और कलात्मक विशेषताएं निम्नलिखित तालिका में देखी जा सकती हैं:
| सांस्कृतिक आयाम | प्रस्तुति एवं तकनीकी विशेषताएँ (दिल्ली रामलीला दल) | दर्शकों एवं समीक्षकों पर प्रभाव |
|---|---|---|
| अभिनय और संवाद | उच्च स्तरीय संवाद अदायगी, स्पष्ट हिंदी और संस्कृतनिष्ठ शब्दों का प्रयोग, पात्रों के भावों का सटीक और संवेदनशील प्रकटीकरण। | मंचन के दौरान दर्शक मंत्रमुग्ध रहे; संवादों की गंभीरता ने लोगों को बांधे रखा। |
| वेशभूषा और सज्जा | त्रेतायुगीन काल के अनुरूप प्रामाणिक, भव्य और चमकीले वस्त्र, मुकुट, पारंपरिक धनुष-बाण और आभूषणों का उत्कृष्ट संयोजन। | पात्रों के रंगमंच पर आते ही दृश्य अत्यंत सजीव और वास्तविक प्रतीत होने लगा। |
| मंच और प्रकाश व्यवस्था | आधुनिक 3D बैकड्रॉप, गतिशील प्रकाश (Dynamic Lighting) और दृश्यों के बदलते ही सजीव होने वाले विशेष सेट। | विशाल रंगमंच पर प्रत्येक दृश्य (जैसे वनवास गमन, सीता हरण) ने जादुई समां बांधा। |
| संगीत और ध्वनि | शास्त्रीय और अर्ध-शास्त्रीय धुनों पर आधारित पृष्ठभूमि संगीत, लाइव वाद्ययंत्रों और चौपाइयों का सुमधुर गायन। | ध्वनि के उतार-चढ़ाव ने दृश्यों के संवेगों और करुण-वीर रसों को सीधे दर्शकों के दिलों तक पहुंचाया। |
रामलीला के प्रत्येक प्रमुख दृश्य के समाप्त होने पर संपूर्ण रामगढ़ परिसर और विशाल सभागार दर्शकों की करतल ध्वनि और ‘जय श्री राम’ के उद्घोष से गूंज उठता था। कलाकारों की इस उत्कृष्ट प्रस्तुति ने न केवल लोगों का मनोरंजन किया, बल्कि उन्हें राम के आदर्शों को जीवन में उतारने की गहरी प्रेरणा भी दी।
रामगढ़ महोत्सव के प्रथम दिवस का सबसे भावुक, संवेदनशील और कलात्मक दृष्टिकोण से सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय, उदयपुर (सरगुजा) की जनजातीय एवं ग्रामीण बालिकाओं द्वारा प्रस्तुत ‘जटायु मोक्ष’ नृत्य-नाटिका रही। स्कूल की इन छोटी-छोटी बालिकाओं ने मंच पर अपनी प्रतिभा, कड़े अभ्यास और अद्वितीय आत्मविश्वास का ऐसा प्रदर्शन किया कि वहां उपस्थित बड़े-बड़े नीति-निर्माता और समीक्षक भी दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर हो गए।
रामायण के सबसे कारुणिक और वीरतापूर्ण प्रसंगों में से एक—जब वृद्ध राज जटायु माता सीता की रक्षा के लिए लंकाधिपति रावण से अपने प्राणों की परवाह किए बिना आकाश में युद्ध लड़ते हैं और अंततः प्रभु श्री राम की गोद में अपने प्राणों का उत्सर्ग करते हैं—को इन बालिकाओं ने अपनी भावपूर्ण नृत्य भंगिमाओं, मूक अभिनय और शारीरिक भाषा (Body Language) के माध्यम से मंच पर पूरी तरह जीवंत कर दिया।
बालिकाओं की भावपूर्ण अभिव्यक्तियों, उत्कृष्ट और त्रुटिहीन मंच संचालन, सुंदर पारंपरिक आंचलिक वेशभूषा और सुमधुर संगीत के अद्भुत समन्वय ने इस नृत्य-नाटिका को एक अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रस्तुति बना दिया। जटायु के प्राण त्यागने और भगवान राम के विलाप व मोक्ष प्रदान करने के अंतिम दृश्य में बालिकाओं के संवेदनशील अभिनय ने वहां उपस्थित हजारों दर्शकों की आंखें नम कर दीं। पूरा सभागार भावविभोर हो गया और प्रस्तुति की समाप्ति पर सभी अतिथियों और नागरिकों ने खड़े होकर (Standing Ovation) देर तक तालियों की गड़गड़ाहट से इन होनहार बालिकाओं का उत्साहवर्धन किया, जो कि उनकी कलात्मक उत्कृष्टता का सबसे बड़ा प्रमाण है।
सांस्कृतिक कार्यक्रमों की इस कढ़ी में साहित्य अनुरागी दर्शकों के लिए आयोजित ‘राष्ट्रीय कवि सम्मेलन’ महोत्सव का एक और सबसे बड़ा और बौद्धिक आकर्षण साबित हुआ। देर रात तक चले इस कवि सम्मेलन में देश और राज्य के प्रतिष्ठित, ख्याति प्राप्त और सिद्धहस्त कवियों ने मंच साझा किया। कवियों ने अपनी ओज, वीर, श्रृंगार, करुण, और तीखे हास्य-व्यंग्य के साथ-साथ समसामयिक राष्ट्रीय और सामाजिक विषयों पर आधारित अपनी कालजयी रचनाओं का अत्यंत प्रभावशाली और दमदार पाठ किया।
कवि सम्मेलन की मुख्य धाराएं और उनका समाज पर प्रभाव कुछ इस प्रकार विस्तृत रहा:
कवियों की इस अद्भुत और दमदार प्रस्तुति पर प्रबुद्ध श्रोताओं और स्थानीय नागरिकों ने लगातार तालियां बजाकर और ‘वाह-वाह’ के नारों से कवियों का मान बढ़ाया और देर रात तक साहित्य के इस महाकुंभ का आनंद लिया।
बाहरी कलाकारों के साथ-साथ रामगढ़ महोत्सव की जो मूल आत्मा है—यानी सरगुजा अंचल की स्थानीय जनजातीय जनजातियों की पारंपरिक कला—उसका भी एक अत्यंत व्यापक और मनमोहक प्रदर्शन महोत्सव के मुख्य मंच पर देखने को मिला। क्षेत्र के विभिन्न दूरस्थ अंचलों से आए लोक कलाकारों के दलों ने पारंपरिक वेशभूषा, मयूर पंख, और कौड़ियों से सजे परिधानों में सज्ज होकर मुख्य मंच पर कदम रखा।
कलाकारों ने सरगुजा के गौरव ‘करमा नृत्य’ (Karma Dance), पारंपरिक ‘सरगुजिहा लोकनृत्य’, सुआ नृत्य तथा स्वागत गीतों की ऐसी झड़ी लगाई कि पूरा माहौल माटी की सोंधी सुगंध से महक उठा। मांदर, झांझ, और नगाड़ों की थाप पर थिरकते कलाकारों के पैरों की जुगलबंदी ने यह साबित कर दिया कि आधुनिकता के इस दौर में भी सरगुजा की जनजातीय संस्कृति कितनी समृद्ध, अक्षुण्ण और जीवंत है। इन लोकनृत्यों ने महोत्सव में आए राष्ट्रीय स्तर के अतिथियों और पर्यटकों को सरगुजा की कलात्मक संपन्नता से गहराई से परिचित करवाया।
रामगढ़ महोत्सव-2026 के इस पावन अवसर पर केवल सांस्कृतिक मंच ही नहीं, बल्कि बौद्धिक और ऐतिहासिक विमर्श के सत्र भी समानांतर रूप से आयोजित किए जा रहे हैं। इतिहासकार और पुरातत्ववेत्ता इस बात पर एकमत हैं कि रामगढ़ की पहाड़ियां मानव सभ्यता के विकास की प्रारंभिक और सबसे महत्वपूर्ण कड़ियों में से एक हैं। इस संबंध में तीन प्रमुख पुरातात्विक धरोहरों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया है:
इन पुरातात्विक स्थलों के वैज्ञानिक संरक्षण और इन्हें यूनेस्को (UNESCO) की विश्व धरोहर सूची की प्राथमिकताओं में शामिल कराने के लिए भी इस सेमिनार और महोत्सव के माध्यम से एक वैचारिक खाका तैयार किया जा रहा है।
संक्षेप में, दो दिवसीय रामगढ़ महोत्सव-2026 का प्रथम दिवस अपने उद्देश्यों को पूर्ण रूप से प्राप्त करने में न केवल सफल रहा, बल्कि उसने सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए। इस महोत्सव का मूल और परम उद्देश्य सरगुजा अंचल की इस अप्रतिम ऐतिहासिक धरोहर, गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत एवं समृद्ध साहित्यिक परंपरा को राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक नई और मजबूत पहचान दिलाना है, और साथ ही आज की आधुनिक, तकनीक-उन्मुख नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, अपनी अमूल्य संस्कृति और अपने गौरवशाली अतीत से भावनात्मक रूप से जोड़ना है।
प्रथम दिवस के इस भव्य, अनुशासित, सुरुचिपूर्ण और अत्यंत सफल आयोजन ने इस पवित्र और दूरदर्शी उद्देश्य को अत्यंत सार्थक, प्रभावी और जीवंत रूप से समाज के सामने अभिव्यक्त किया है। स्थानीय प्रशासन की चाक-चौबंद व्यवस्था, जनप्रतिनिधियों का दृढ़ संकल्प और आम जनता का अपनी संस्कृति के प्रति अगाध प्रेम—इन तीनों के समन्वय ने रामगढ़ महोत्सव को छत्तीसगढ़ के सांस्कृतिक पुनरुत्थान का एक स्वर्णिम अध्याय बना दिया है। आने वाले समापन समारोह में मुख्यमंत्री जी की उपस्थिति इस अभियान को और अधिक गति प्रदान करेगी।
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