भोपाल कलियासोत डैम हादसा: फोटो खिंचवाते समय डूबा 17 वर्षीय किशोर, 3 साल की मासूम की भी मौत






भोपाल में दो दर्दनाक हादसे: कलियासोत डैम में फोटो खिंचवाते समय डूबा 17 वर्षीय किशोर, गड्ढे में गिरने से 3 साल की मासूम की मौत

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राजधानी में संडे बना ब्लैक डे: कलियासोत डैम में रील्स-फोटो के चक्कर में गई 17 वर्षीय किशोर की जान, उधर 3 साल की मासूम गड्ढे में डूबी

सुरक्षा चेतावनी बोर्ड और फेंसिंग को तोड़कर प्रतिबंधित क्षेत्र में घुस रहे हैं युवा; तैरना न जानने के बावजूद गहरे पानी में उतरने से लगातार हो रहे हैं हादसे।
विशेष कवरेज: भोपाल ब्यूरो | अपडेटेड: जून 2026 | श्रेणी: राजधानी / दुर्घटना

भोपाल। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में रविवार का दिन दो परिवारों के लिए कभी न भूलने वाला मातम लेकर आया। चूनाभट्टी और कजलीखेड़ा थाना क्षेत्रों में हुए दो अलग-अलग हादसों में एक 17 वर्षीय किशोर और एक 3 वर्षीय मासूम बच्ची की पानी में डूबने से दर्दनाक मौत हो गई। पहली घटना कलियासोत डैम की है, जहां पाबंदियों और मगरमच्छों के खतरे की चेतावनी को नजरअंदाज कर फोटो खिंचवाने उतरा किशोर गहरे पानी में समा गया। वहीं दूसरी घटना में एक तीन साल की बच्ची खेलते-खेलते पानी से भरे गड्ढे में गिर गई। इन दोनों घटनाओं ने एक बार फिर प्रशासनिक दावों और जन-जागरूकता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

कलियासोत डैम हादसा: घुटने भर पानी से शुरू हुआ सफर, मौत के भंवर पर खत्म

पुलिस से मिली विस्तृत जानकारी के अनुसार, जाटखेड़ी (मिसरोद) निवासी 17 वर्षीय अंगद दांडे, पुत्र संतोष दांडे, रविवार दोपहर अपने तीन दोस्तों के साथ कलियासोत डैम घूमने गया था। मौसम सुहाना होने के कारण डैम के आसपास काफी संख्या में लोग मौजूद थे, लेकिन अंगद और उसके दोस्त थोड़ी दूर एकांत और एडवेंचर की तलाश में पुलिस चौकी से कुछ दूरी पर स्थित एक ढलान वाले प्रतिबंधित हिस्से की तरफ चले गए।

बताया जा रहा है कि चारों दोस्तों का मुख्य उद्देश्य डैम के बैकवॉटर की खूबसूरत लोकेशन पर तस्वीरें लेना और सोशल मीडिया के लिए रील्स बनाना था। इसी चक्कर में चारों दोस्त किनारे से पानी के भीतर उतरने लगे। शुरुआती हिस्से में पानी केवल घुटनों तक था, जिससे उनका हौसला और बढ़ गया। लेकिन वे इस बात से पूरी तरह अनजान थे कि कलियासोत डैम की बनावट ढलान वाली और पथरीली है, जहां कुछ ही कदमों की दूरी पर अचानक गहरा गड्ढा शुरू हो जाता है।

चश्मदीदों और पुलिस के मुताबिक, पानी के भीतर पोज देते समय अंगद का पैर अचानक फिसला। काई और चिकनी मिट्टी होने के कारण वह खुद को संभाल नहीं पाया और सीधे गहरे पानी के भंवर में चला गया। चौंकाने वाली बात यह है कि अंगद और उसके साथ आए तीनों दोस्तों में से किसी को भी तैरना नहीं आता था।

मदद के लिए चीखते रहे दोस्त, 2 घंटे के रेस्क्यू के बाद निकला शव

जैसे ही अंगद गहरे पानी में डूबने लगा और छटपटाने लगा, किनारे पर मौजूद उसके दोस्तों के हाथ-पांव फूल गए। डूबते दोस्त को बचाने का कोई जरिया न देख उन्होंने जोर-जोर से चीखना-चिल्लाना शुरू कर दिया। हालांकि, वह क्षेत्र सुनसान और प्रतिबंधित होने के कारण आसपास तुरंत मदद करने वाला कोई स्थानीय नागरिक या गोताखोर मौजूद नहीं था।

जब कोई रास्ता नहीं सूझा, तो दोस्त भागते हुए कुछ दूरी पर स्थित पुलिस चौकी पहुंचे और ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों को हादसे की सूचना दी। चूनाभट्टी थाना पुलिस ने बिना वक्त गंवाए तत्काल स्थानीय गोताखोरों और एसडीईआरएफ (SDERF) की टीम को सूचित किया। सूचना मिलते ही गोताखोरों की टीम साजो-सामान के साथ मौके पर पहुंची।

कलियासोत डैम का वह हिस्सा काफी गहरा और नीचे से पथरीला होने के कारण रेस्क्यू ऑपरेशन में काफी दिक्कतें आईं। करीब दो घंटे की भारी मशक्कत और सर्च ऑपरेशन के बाद गोताखोरों की टीम अंगद के शरीर को पानी से बाहर निकालने में कामयाब रही। हालांकि, तब तक काफी देर हो चुकी थी। पानी में लंबे समय तक रहने और फेफड़ों में पानी भर जाने के कारण किशोर की मौत हो चुकी थी। पुलिस ने पंचनामा बनाकर शव को पोस्टमार्टम के लिए हमीदिया अस्पताल भेज दिया है।

हादसों का मुख्य कारण: चेतावनियों को ठेंगे पर रख रहे हैं लोग

चूनाभट्टी पुलिस के मुताबिक, कलियासोत डैम का यह पूरा इलाका बेहद संवेदनशील और खतरनाक घोषित है। इस डैम में न केवल पानी की गहराई अनियंत्रित है, बल्कि यह क्षेत्र मगरमच्छों (Crocodiles) का प्राकृतिक आवास भी है। वन विभाग और नगरीय प्रशासन द्वारा इस पूरे क्षेत्र में स्पष्ट अक्षरों में चेतावनी बोर्ड लगाए गए हैं, जिन पर साफ लिखा है—“आगे जाना सख्त मना है, पानी गहरा है और मगरमच्छों का खतरा है।”

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इसके अलावा, नगर निगम की मदद से लोगों को रोकने के लिए कटीली फेंसिंग (तारबंदी) और लोहे के स्टॉपर भी लगाए गए हैं। लेकिन जमीन पर हकीकत इसके उलट है। स्थानीय निवासियों और सुरक्षाकर्मियों का कहना है कि युवा और सैलानी एडवेंचर के चक्कर में फेंसिंग को नीचे से काट देते हैं या पत्थरों की मदद से रास्ता बना लेते हैं। सुरक्षा इंतजामों को नजरअंदाज कर चोरी-छिपे डैम के प्रतिबंधित कैचमेंट एरिया में घुसना अब एक ट्रेंड बन गया है, जो इस तरह के जानलेवा हादसों को निमंत्रण दे रहा है।

हादसे की मुख्य कड़ियां (घटनाक्रम सार)

क्र.सं. विवरण स्थान / स्थिति
1 मृतक का नाम व आयु अंगद दांडे (17 वर्ष), निवासी जाटखेड़ी
2 हादसे का कारण प्रतिबंधित क्षेत्र में पानी के अंदर फोटो खिंचवाते समय पैर फिसलना
3 सुरक्षा चूक चेतावनी बोर्ड और फेंसिंग को दरकिनार कर क्षेत्र में प्रवेश
4 रेस्क्यू अवधि गोताखोरों द्वारा लगभग 2 घंटे का कड़ा सर्च ऑपरेशन

दूसरी घटना: कजलीखेड़ा में ईंट-भट्ठे के गड्ढे ने ली 3 साल की मासूम की जान

कलियासोत डैम की त्रासदी के चंद घंटों के भीतर ही भोपाल के कजलीखेड़ा थाना क्षेत्र से एक और झकझोर देने वाली खबर आई। यहाँ धोली खदान के पास पानी से भरे एक अनपॉइन्टेड (लावारिस) गड्ढे में डूबने से तीन वर्षीय मासूम बच्ची देविका की मौत हो गई।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, बच्ची के पिता राज रैकवार एक स्थानीय ईंट-भट्ठे पर मजदूरी का काम करते हैं। रविवार दोपहर को राज रैकवार और परिवार के अन्य सदस्य भट्ठे पर ईंटें बनाने और सुखाने के काम में व्यस्त थे। इसी दौरान उनकी तीन साल की बेटी देविका घर के बाहर और भट्ठे के आसपास खेल रही थी।

खेलते-खेलते मासूम बच्ची भट्ठे के पास ही खोदे गए एक गहरे गड्ढे की तरफ चली गई, जिसमें हाल ही में हुई बारिश का पानी लबालब भरा हुआ था। गड्ढे की गहराई लगभग तीन से चार फीट थी, जो एक तीन साल की बच्ची के डूबने के लिए काफी थी। बच्ची खेलते समय अनजाने में उस गड्ढे में गिर गई और मूक मौत का शिकार हो गई।

काफी देर तक जब देविका की आवाज सुनाई नहीं दी और वह कहीं नजर नहीं आई, तो परिजनों को चिंता हुई। उन्होंने आसपास के घरों और भट्ठे के चक्कर लगाए। जब तलाश करते हुए वे पानी से भरे गड्ढे के पास पहुंचे, तो वहां का दृश्य देखकर उनके होश उड़ गए। परिजनों ने तुरंत बच्ची को पानी से बाहर निकाला और आनन-फानन में नजदीकी निजी अस्पताल ले गए। लेकिन डॉक्टरों ने परीक्षण के बाद उसे ‘ब्रॉट डेड’ (अस्पताल लाने से पहले ही मृत) घोषित कर दिया। कजलीखेड़ा पुलिस ने इस मामले में मर्ग कायम कर जांच शुरू कर दी है कि भट्ठा संचालक द्वारा सुरक्षा मानकों का पालन किया गया था या नहीं।

प्रशासनिक जवाबदेही और विशेषज्ञों की राय: अब क्या कदम उठाना जरूरी?

इन दोनों लगातार हुए हादसों के बाद भोपाल के नागरिक समाज और सुरक्षा विशेषज्ञों में भारी आक्रोश और चिंता है। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल चेतावनी बोर्ड लगा देने से प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता। जब यह सर्वविदित है कि कलियासोत और केरवा डैम जैसे पर्यटन स्थलों पर रविवार को भारी भीड़ उमड़ती है, तो वहां अतिरिक्त पुलिस बल या होमगार्ड के जवानों की गश्त क्यों नहीं लगाई जाती?

दूसरी ओर, ईंट-भट्टों और निर्माण स्थलों पर खोदे जाने वाले खुले गड्ढों को लेकर भी सख्त गाइडलाइंस हैं। नियमों के मुताबिक, किसी भी कमर्शियल या माइनिंग एक्टिविटी के कारण बने गड्ढों को चारों तरफ से घेरना अनिवार्य होता है ताकि कोई बच्चा या मवेशी उसमें न गिरे। कजलीखेड़ा मामले में भट्ठा मालिक की लापरवाही साफ उजागर हो रही है, जिस पर पुलिस जांच के बाद कानूनी कार्रवाई की मांग की जा रही है।

वॉटर सेफ़्टी गाइडलाइंस: खुद को और अपनों को कैसे सुरक्षित रखें?

बारिश के मौसम में नदी, तालाब, डैम और जलप्रपातों (Waterfalls) पर जाना रोमांचक हो सकता है, लेकिन थोड़ी सी लापरवाही जानलेवा साबित हो सकती है। सुरक्षा एजेंसियों ने नागरिकों से निम्नलिखित बातों का कड़ाई से पालन करने की अपील की है:

  • सेल्फी और रील्स के दीवाने न बनें: पानी के किनारे या पानी के अंदर जाकर खतरनाक पोज में तस्वीरें न लें। सोशल मीडिया के ‘लाइक्स’ आपके जीवन से कीमती नहीं हैं।
  • चेतावनी बोर्ड का सम्मान करें: यदि किसी स्थान पर ‘खतरा’ या ‘प्रतिबंधित क्षेत्र’ लिखा है, तो वहां बिल्कुल न जाएं। स्थानीय प्रशासन को उस जगह के खतरों (जैसे गहराई, दलदल या जंगली जानवर) का आपसे बेहतर अंदाजा होता है।
  • तैरना न आने पर पानी से दूर रहें: अगर आपको प्रोफेशनल तैराकी नहीं आती, तो कभी भी घुटने से ऊपर के पानी में कदम न रखें। पानी के नीचे का बहाव और ढलान अदृश्य होते हैं।
  • बच्चों पर चौबीसों घंटे नजर रखें: निर्माण स्थलों, ग्रामीण इलाकों या तालाबों के किनारे रहने वाले माता-पिता अपने छोटे बच्चों को कभी भी अकेला न छोड़ें। बच्चे पानी के आकर्षण में बहुत जल्दी आकर्षित होते हैं।

कलियासोत में अंगद की मौत और कजलीखेड़ा में देविका का जाना, भोपाल के लिए एक वेक-अप कॉल (चेतावनी) है। जब तक लोग खुद जागरूक नहीं होंगे और सुरक्षा फेंसिंग को तोड़ना बंद नहीं करेंगे, तब तक पुलिस और गोताखोर हर पॉइंट पर मौजूद नहीं रह सकते। सजगता ही एकमात्र बचाव है।