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हथकरघा संघ स्कूल यूनिफॉर्म की रंगाई में बड़ा घोटाला फूटा है। यहां से लाखों मीटर थान कपड़ा डाई कराने हैदराबाद भेजा गया

हथकरघा संघ स्कूल यूनिफॉर्म की रंगाई में बड़ा घोटाला फूटा है। यहां से लाखों मीटर थान कपड़ा डाई कराने हैदराबाद भेजा गया। वहां से तैयार थान के साथ कतरनें भी रंगकर भेज दी गईं।

करीब छह माह तक यह गड़बड़ी पकड़ में नहीं आई, क्योंकि जिन लोगों को कपड़े की जांच करनी थी, उन्होंने करीब 60 हजार मीटर कपड़े के बंडल खोलकर देखा ही नहीं और सही होने की रिपोर्ट दे दी।

बाद में गोदाम प्रभारी ने अफसरों को बताया कि भेजा गया कपड़ा हथकरघा संघ का नहीं है। इसके बाद हड़कंप मचा। आनन-फानन में जांच कमेटी बनाई गई। जांच में हथकरघा से अलग कपड़ा होने की पुष्टि हुई।

मामले में तत्कालीन गोदाम प्रभारी रामकिशुन देवांगन को निलंबित कर दिया गया, जबकि तकनीकी कर्मचारी की सेवा समाप्त कर दी गई। मारुति कोटेक्स लिमिटेड, हैदराबाद से 22.42 लाख रुपए की वसूली के निर्देश दिए गए हैं। फर्जीवाड़ा पिछले साल 2025-26 शिक्षा सत्र के लिए बांटे गए यूनीफार्म में किया गया है।

हाथकरघा संघ ने जेम पोर्टल के जरिए निविदा कर मारुति कोटेक्स को डाईंग, प्रोसेसिंग और प्रिंटिंग का काम दिया था। इसके लिए 65.06 लाख मीटर ग्रे कपड़ा भेजा गया। कंपनी ने 63.16 लाख मीटर फ्रेश यानी थान कपड़ा यूनीफार्म के रंग में रंगकर लौटाया। इसके साथ 1.90 लाख मीटर कटपीस, सेकंड क्लास, मिस प्रिंट और वेस्टेज भी भेजा गया।

इसके अलावा 60 हजार मीटर से ज्यादा कपड़ा कतरन यानी छोटे छोटे टुकड़ों वाला दे दिया। अफसरों ने इसकी जांच नहीं की।

हर साल 140 करोड़ का स्कूल ड्रेस, 345 समितियां बनाती हैं 60 लाख मीटर थान

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राज्य के करीब 39 हजार स्कूलों में पढ़ने वाले 50 लाख से अधिक छात्रों को हर साल यूनिफॉर्म बांटी जाती है। इस पर करीब 140 करोड़ रुपए खर्च होते हैं। हाथकरघा संघ पहले यूनीफार्म के लिए धागे खरीदता है। ये धागे राज्य की 345 बुनकर समितियों को दिए जाते हैं। समितियां इन्हीं धागों को करीब 60 लाख मीटर थान में बदलती हैं। धागे ग्रे रंग के होते हैं, इसलिए तैयार थान भी ग्रे रहता है।

इसके बाद इसे सरकारी स्कूलों की यूनिफॉर्म के तय रंग में रंगने के लिए भेजा जाता है। हैदराबाद की जिस कंपनी को पिछले साल कपड़ा भेजा गया था, वह पिछले 10-12 साल से डाई यानी यूनिफॉर्म के रंग में कपड़ा रंगने का काम कर रही है।

जिन्हें जांच करनी थी, उन्होंने बंडल खोलकर भी नहीं देखा: थान वाले कपड़े और उसी कपड़े की छोटी-छोटी कतरनों की कीमत में खासा अंतर होता है। कतरन से पैंट-शर्ट सिलने पर फिनिशिंग नहीं आती। लाइनिंग और चेक्स वाले कपड़े में डिजाइन भी बिगड़ जाती है।

इसलिए कतरन कम कीमत की होती है। इसी वजह से हैदराबाद से यूनिफॉर्म के रंग में रंगकर आने वाले थान की तकनीकी जांच कराई जाती है। लेकिन पिछले सत्र में तकनीकी एक्सपर्ट और गोदाम प्रभारी ने कतरन कपड़े के बंडल को खोलकर कपड़ा देखा ही नहीं।

करीब छह माह बाद अचानक अफसरों को बताया गया कि करीब 60 हजार मीटर कपड़े के बंडल खोले ही नहीं गए थे। इसके बाद संघ में हड़कंप मचा और जांच कमेटी बनाई गई। कमेटी की जांच में कतरन होने की पुष्टि हुई।

एजेंसी ने पेनाल्टी देने से किया इनकार संघ की ओर से गोदाम प्रभारी व तकनीकी स्टाफ के खिलाफ कार्रवाई करने के बाद हैदराबाद की फर्म को वसूली को नोटिस भेजा जरूर है लेकिन एजेंसी ने पेनाल्टी के पैसे देने से इनकार कर दिया है। उनका कहना है कि उन्होंने थान वाले कपड़े ही रंगकर भेजे हैं। गोदाम में गड़बड़ी हुई होगी। अफसरों का कहना है कि पेनाल्टी की पैसे नहीं मिले तो कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

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