सार्वजनिक बैंकों के एनपीए पर केंद्र सरकार के दावों पर उठे सवाल, सुरेंद्र वर्मा बोले- कॉरपोरेट का 16.11 लाख करोड़ कर्ज राइट ऑफ करना बड़ी डकैती
रायपुर, 19 अगस्त 2026: केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSB) के नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPA) न्यूनतम होने के दावों पर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के मुख्य प्रवक्ता सुरेंद्र वर्मा ने तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि जिन कॉरपोरेट-परस्त नीतियों के लिए सरकार को जनता से माफी मांगनी चाहिए, उन्हें अपनी उपलब्धि बताकर पेश किया जा रहा है। पिछले एक दशक में बैंकों ने लगभग 16 लाख 11 हजार करोड़ रुपये से अधिक के एनपीए को बट्टे खाते (राइट ऑफ) में डाल दिया है, जो किसी गरीब या किसान का नहीं बल्कि चुनिंदा बड़े उद्योगपतियों का है।
- पिछले 10 वर्षों में अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों ने 16.11 लाख करोड़ का एनपीए बट्टे खाते में डाला।
- आम उपभोक्ताओं से मिनिमम बैलेंस, मैसेज, चेकबुक व कैश निकासी शुल्क वसूल कर निचोड़ा जा रहा है।
- शिक्षा, स्वास्थ्य, खाद सब्सिडी और मनरेगा बजट में कटौती, लेकिन पूंजीपतियों को कर्ज राहत।
- 2008 में मनमोहन सिंह सरकार ने 60 हजार करोड़ का कृषि ऋण माफ किया था, वर्तमान सरकार कॉरपोरेट का लोन माफ कर रही है।
आम जनता पर टैक्स और चार्जेज का बोझ, कॉरपोरेट को राहत
सुरेंद्र वर्मा ने कहा कि एक तरफ बैंकिंग संस्थाएं मिनिमम बैलेंस पेनाल्टी, डिजिटल सेवा शुल्क, एसएमएस चार्ज, चेक बुक शुल्क और खुद के खाते से पैसे निकालने पर चार्ज लगाकर आम ग्राहकों से हजारों करोड़ वसूल रही हैं। वहीं दूसरी ओर, बड़े बकायादारों के लाखों करोड़ के लोन राइट ऑफ किए जा रहे हैं। यह सरकार की गरीब विरोधी और जन विरोधी नीतियों का जीता-जागता उदाहरण है।
नीति और नीयत का अंतर: यूपीए बनाम एनडीए
कांग्रेस प्रवक्ता ने तुलना करते हुए कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने 2008 में देश के किसानों का 60 हजार करोड़ रुपये का कृषि ऋण माफ किया था, जबकि वर्तमान केंद्र सरकार सिर्फ अपने पूंजीपति मित्रों के लोन राइट ऑफ कर रही है। यह सीधे तौर पर नीति और नीयत के अंतर को दिखाता है। एक तरफ सामाजिक सुरक्षा, मनरेगा और खाद-खाद्य सब्सिडी के बजट में कटौती की जा रही है, वहीं दूसरी तरफ कॉरपोरेट जगत को राहत दी जा रही है।
बैंक डकैती अनवरत जारी
वर्मा ने आरोप लगाया कि सत्ता के संरक्षण में पिछले दस वर्षों से जालसाजों और कॉरपोरेट जगत के शातिर लोगों द्वारा बैंकिंग सिस्टम को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। सार्वजनिक बैंकों की इस साल की कमाई भले ही 1 लाख 98 हजार करोड़ दिख रही हो, लेकिन इस पूरे खेल की कीमत आम आदमी को अतिरिक्त शुल्कों के रूप में चुकानी पड़ रही है।














