भूपेश बघेल ने खनिज संशोधन कानून, जर्जर स्कूलों और प्रधानमंत्री आवास के आंकड़ों पर सरकार को घेरा, वंदे मातरम् को लेकर मोदी-शाह को दी चुनौती
रायपुर, 22 अगस्त 2026। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने शनिवार को पत्रकारों से चर्चा करते हुए केंद्र और राज्य की भाजपा सरकार पर कई महत्वपूर्ण मुद्दों को लेकर निशाना साधा। उन्होंने खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन अधिनियम 2026, प्रदेश के जर्जर स्कूल भवनों, प्रधानमंत्री आवास योजना के आंकड़ों और वंदे मातरम् को लेकर सरकार से जवाब मांगा।
भूपेश बघेल ने विशेष रूप से खनिज संसाधनों से होने वाले राजस्व, राज्यों के अधिकार, स्कूलों की स्थिति और सरकारी आंकड़ों में कथित विरोधाभास को लेकर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ जैसे खनिज संपदा से समृद्ध राज्य के लिए खनिज नीति केवल आर्थिक विषय नहीं है, बल्कि यह राज्य के वित्तीय अधिकारों, स्थानीय समुदायों और विकास से भी जुड़ा हुआ विषय है।
खनिज संशोधन अधिनियम 2026 को लेकर केंद्र पर निशाना
भूपेश बघेल ने कहा कि संसद के हालिया सत्र में खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन अधिनियम 2026 को दोनों सदनों से पारित किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि इस महत्वपूर्ण कानून पर पर्याप्त चर्चा नहीं हुई और इसे जल्दबाजी में पारित किया गया।
उनका कहना है कि संशोधन से राज्यों के वित्तीय अधिकार प्रभावित होंगे। विशेष रूप से खनिज संपदा वाले राज्यों को मिलने वाले राजस्व और उनके अधिकारों को लेकर उन्होंने चिंता जताई।
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ देश के प्रमुख खनिज उत्पादक राज्यों में शामिल है। प्रदेश में कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, टिन और जिंक सहित कई महत्वपूर्ण खनिजों का उत्पादन होता है। ऐसे में खनिज क्षेत्र से जुड़े किसी भी बड़े कानूनी बदलाव का सीधा प्रभाव राज्य की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
उन्होंने राज्य सरकार से सवाल किया कि यदि केंद्र के कानून से राज्य के राजस्व और अधिकार प्रभावित होते हैं तो छत्तीसगढ़ सरकार इस विषय पर स्पष्ट रूप से अपनी स्थिति क्यों नहीं बता रही है।
राज्यों के अधिकार और संघीय ढांचे का सवाल
भूपेश बघेल ने खनिज कानून को केवल राजस्व का मुद्दा नहीं बल्कि संघीय ढांचे से जुड़ा विषय बताया। उन्होंने कहा कि भारत में केंद्र और राज्यों के बीच संवैधानिक अधिकारों का संतुलन लोकतांत्रिक व्यवस्था की महत्वपूर्ण विशेषता है।
उनके अनुसार, खनिज संपदा से जुड़े निर्णयों में राज्यों की भूमिका महत्वपूर्ण है क्योंकि खनन गतिविधियों का सीधा असर स्थानीय क्षेत्रों, पर्यावरण, रोजगार और वहां रहने वाले समुदायों पर पड़ता है।
उन्होंने दावा किया कि नए संशोधन से राज्यों की कर लगाने की क्षमता सीमित होती है। बघेल ने इसे राज्यों के वित्तीय अधिकारों में कटौती बताते हुए कहा कि इससे भविष्य में खनिज संपदा वाले राज्यों को आर्थिक नुकसान हो सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि छत्तीसगढ़ में खनन से जुड़े क्षेत्रों में बड़ी संख्या में स्थानीय और आदिवासी समुदाय रहते हैं। इसलिए खनिज नीति बनाते समय केवल केंद्र के राजस्व को नहीं बल्कि स्थानीय जनता के हितों को भी ध्यान में रखना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के 2024 के फैसले का किया उल्लेख
भूपेश बघेल ने अपने बयान में वर्ष 2024 में सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय संविधान पीठ के खनिज अधिकारों से जुड़े फैसले का भी उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले में राज्यों के अधिकारों को महत्वपूर्ण माना गया था। बघेल का आरोप है कि नया संशोधन उस फैसले के प्रभाव को सीमित करता है।
उन्होंने सरकार से पूछा कि यदि सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों के अधिकारों के संबंध में महत्वपूर्ण व्यवस्था दी थी, तो उसके बाद केंद्र सरकार द्वारा लाए गए संशोधन का राज्यों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इसकी स्पष्ट जानकारी जनता के सामने क्यों नहीं रखी जा रही है।
उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर छत्तीसगढ़ सरकार को केवल राजनीतिक बयान देने के बजाय प्रदेश के आर्थिक हितों के आधार पर अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
अन्य राज्यों की आपत्तियों का हवाला
पूर्व मुख्यमंत्री ने दावा किया कि केरल, झारखंड, तेलंगाना और कर्नाटक जैसे कुछ राज्यों ने भी खनिज संशोधन कानून को लेकर अपनी आपत्तियां दर्ज कराई हैं।
उन्होंने कहा कि जब कई राज्य खनिज संसाधनों और राज्यों के वित्तीय अधिकारों से जुड़े इस विषय पर सवाल उठा रहे हैं, तब छत्तीसगढ़ सरकार का रुख स्पष्ट होना चाहिए।
बघेल ने भाजपा की डबल इंजन सरकार पर भी राजनीतिक तंज कसा। उन्होंने सवाल किया कि यदि केंद्र और राज्य में एक ही दल की सरकार होने से राज्यों को लाभ मिलता है तो फिर छत्तीसगढ़ के खनिज और वित्तीय अधिकारों से जुड़े विषयों पर सरकार मजबूती से अपनी बात क्यों नहीं रख रही है।
स्कूलों की जर्जर हालत पर सरकार को घेरा
पत्रकार वार्ता में भूपेश बघेल ने प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था और सरकारी स्कूलों की स्थिति को लेकर भी सरकार पर गंभीर आरोप लगाए।
उन्होंने कहा कि राज्य के कई हिस्सों में स्कूल भवनों की स्थिति खराब है और विद्यार्थी तथा उनके अभिभावक स्कूलों की मरम्मत की मांग को लेकर आंदोलन करने को मजबूर हैं।
बघेल ने धमतरी के बारना, धमधा, रायगढ़, मोहला-मानपुर, बलौदाबाजार, सक्ती और सारंगढ़-बिलाईगढ़ सहित कई क्षेत्रों का उल्लेख किया।
उनका कहना है कि स्कूल बच्चों के भविष्य की नींव हैं। यदि स्कूल भवन ही जर्जर होंगे, छतों से पानी टपकेगा, शौचालय खराब होंगे और कक्षाओं में बैठना मुश्किल होगा तो बच्चों की शिक्षा प्रभावित होना स्वाभाविक है।
‘जेन अल्फा’ के सड़क पर उतरने का दावा
भूपेश बघेल ने स्कूलों की मरम्मत के लिए विद्यार्थियों के आंदोलन को नई पीढ़ी की आवाज बताया। उन्होंने इसे ‘जेन अल्फा’ के सड़क पर उतरने का विषय बताते हुए कहा कि बच्चों को पढ़ाई करने के बजाय अपने स्कूल की बुनियादी सुविधाओं के लिए आंदोलन करना पड़ रहा है।
उन्होंने सरकार से पूछा कि आखिर बच्चों को अपने स्कूल की मरम्मत की मांग लेकर सड़कों पर क्यों उतरना पड़ रहा है।
बघेल ने कहा कि स्कूलों की मरम्मत किसी राजनीतिक दल का मुद्दा नहीं होना चाहिए। यह सरकार की नियमित जिम्मेदारी है। स्कूल भवनों का समय-समय पर रखरखाव किया जाना आवश्यक है ताकि विद्यार्थियों और शिक्षकों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
मुख्यमंत्री स्कूल जतन योजना का उल्लेख
पूर्व मुख्यमंत्री ने अपनी सरकार के दौरान शुरू की गई मुख्यमंत्री स्कूल जतन योजना का भी उल्लेख किया।
उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में प्रदेश के लगभग 30 हजार स्कूलों में मरम्मत और निर्माण कार्यों के लिए कुल 1,807.68 करोड़ रुपये का प्रावधान एवं आवंटन किया गया था।
बघेल के अनुसार, इस राशि में से करीब 1,191 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। उन्होंने आरोप लगाया कि सत्ता परिवर्तन के बाद भाजपा सरकार ने इस योजना को समाप्त कर दिया और शेष आवंटन को निरस्त कर दिया।
उन्होंने कहा कि यदि सरकार पुरानी योजना को आगे नहीं बढ़ाना चाहती थी तो उसे स्कूल भवनों के रखरखाव के लिए कोई प्रभावी वैकल्पिक व्यवस्था करनी चाहिए थी।
छत टपकने और शौचालय खराब होने का आरोप
भूपेश बघेल ने कहा कि प्रदेश के कई स्कूलों में भवनों की स्थिति खराब है। उन्होंने दावा किया कि कुछ स्कूलों में बारिश के दौरान छतों से पानी टपकता है और कई स्थानों पर शौचालयों की स्थिति भी खराब है।
उन्होंने कहा कि बच्चों को सुरक्षित वातावरण में शिक्षा देना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।
उन्होंने आरोप लगाया कि स्कूलों के रखरखाव में लापरवाही के कारण कई स्थानों पर विद्यार्थी जोखिम उठाकर पढ़ने को मजबूर हैं।
बघेल ने कहा कि स्कूल भवनों की मरम्मत में देरी केवल भवन संबंधी समस्या नहीं है, बल्कि यह बच्चों की सुरक्षा और शिक्षा के अधिकार से जुड़ा विषय है।
प्रधानमंत्री आवास योजना के आंकड़ों पर बड़ा सवाल
पत्रकार वार्ता में भूपेश बघेल ने प्रधानमंत्री आवास योजना के आंकड़ों को लेकर भी सरकार से जवाब मांगा।
उन्होंने उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा के 9 जून 2026 के कथित पत्र और रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल द्वारा 11 अगस्त 2026 को लोकसभा में मिली जानकारी के आधार पर दिए गए आंकड़ों का हवाला दिया।
बघेल के अनुसार, उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर राज्य में 18.5 लाख प्रधानमंत्री आवास पूर्ण होने की जानकारी दी थी।
वहीं, बघेल ने दावा किया कि रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने लोकसभा में मिली जानकारी के आधार पर राज्य में 9.81 लाख प्रधानमंत्री आवास पूर्ण होने की बात कही।
उन्होंने दोनों आंकड़ों के बीच बड़े अंतर को लेकर सरकार से स्पष्टीकरण मांगा।
‘झूठ कौन बोल रहा है?’—बघेल का सवाल
भूपेश बघेल ने कहा कि यदि उपमुख्यमंत्री द्वारा मुख्यमंत्री को दी गई जानकारी सही है तो लोकसभा में सांसद को मिली जानकारी अलग क्यों है।
और यदि लोकसभा में दी गई जानकारी सही है तो राज्य सरकार द्वारा 18.5 लाख आवास पूर्ण होने का दावा किस आधार पर किया गया।
उन्होंने सरकार से सवाल करते हुए कहा कि जनता के सामने सही आंकड़ा रखा जाना चाहिए। उन्होंने मांग की कि राज्य सरकार इस मामले में आधिकारिक रूप से स्पष्टीकरण जारी करे।
बघेल ने इसे केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय नहीं बल्कि सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता से जुड़ा मामला बताया।
पिछले पांच वर्षों के आवास लक्ष्य पर भी सवाल
भूपेश बघेल ने कहा कि लोकसभा में मिली जानकारी के अनुसार पिछले पांच वर्षों में कुल 15.45 लाख आवास का लक्ष्य रखा गया था और इनमें से 13.55 लाख आवास स्वीकृत हुए।
उन्होंने इन आंकड़ों को राज्य सरकार द्वारा बताए जा रहे आंकड़ों के साथ जोड़ते हुए सरकार से स्थिति स्पष्ट करने को कहा।
उनका कहना है कि प्रधानमंत्री आवास योजना जैसी बड़ी जनकल्याणकारी योजना में आंकड़ों की स्पष्टता बेहद जरूरी है, क्योंकि इससे सीधे लाखों गरीब परिवार जुड़े हुए हैं।
उन्होंने कहा कि ग्रामीण और गरीब परिवारों के लिए पक्का मकान केवल एक सरकारी योजना नहीं बल्कि उनके जीवन में स्थायी बदलाव का माध्यम है। इसलिए आवास निर्माण से जुड़े आंकड़ों में किसी भी प्रकार का भ्रम नहीं होना चाहिए।
वंदे मातरम् को लेकर भाजपा पर हमला
पत्रकारों से चर्चा के दौरान भूपेश बघेल ने वंदे मातरम् को लेकर चल रहे विवाद पर भी अपनी बात रखी।
उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् का भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण स्थान रहा है। उनके अनुसार, स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कांग्रेस के अनेक नेताओं और कार्यकर्ताओं ने वंदे मातरम् का उद्घोष करते हुए आंदोलन किया और अंग्रेजी शासन का सामना किया।
बघेल ने आरोप लगाया कि भाजपा इस ऐतिहासिक गीत को लेकर अनावश्यक विवाद पैदा कर रही है।
उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् के शुरुआती दो पदों को लेकर ऐतिहासिक रूप से एक स्वीकार्य व्यवस्था रही है और लंबे समय से राष्ट्रीय आयोजनों में इसे इसी स्वरूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है।
1896 के कांग्रेस अधिवेशन का किया उल्लेख
भूपेश बघेल ने कहा कि वर्ष 1896 में कांग्रेस के अधिवेशन में पहली बार वंदे मातरम् गाया गया था। उन्होंने कहा कि उस समय भी शुरुआती दो पद ही गाए गए थे।
उनका कहना है कि शुरुआती दो पदों में मातृभूमि की वंदना की गई है और इसे लंबे समय से भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा स्वीकार किया गया है।
उन्होंने इस ऐतिहासिक संदर्भ को वर्तमान राजनीतिक विवाद से जोड़ते हुए कहा कि अब अचानक पूरे गीत को लेकर दबाव क्यों बनाया जा रहा है।
1937 के निर्णय का हवाला
पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्ष 1937 में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, रविंद्रनाथ टैगोर, सुभाष चंद्र बोस और सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे नेताओं ने वंदे मातरम् के संबंध में एक निर्णय लिया था।
बघेल ने कहा कि उस समय गीत के शुरुआती दो अंतरों को लेकर व्यवस्था तय की गई थी और आज उसी व्यवस्था पर सवाल उठाना इतिहास को अलग तरीके से प्रस्तुत करने की कोशिश है।
उन्होंने भाजपा नेताओं से सवाल किया कि यदि वंदे मातरम् को लेकर आज इतना राजनीतिक जोर दिया जा रहा है तो स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उनके वैचारिक पूर्वजों की भूमिका क्या थी।
मोदी और शाह को दी चुनौती
वंदे मातरम् के मुद्दे पर भूपेश बघेल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को चुनौती देते हुए कहा कि वे बिना टेलीप्रॉम्प्टर के पूरा वंदे मातरम् गाकर दिखाएं।
उनकी यह टिप्पणी पत्रकार वार्ता के दौरान चर्चा का प्रमुख विषय रही।
बघेल ने कहा कि राष्ट्रभक्ति किसी गीत को कितनी बार या कितने अंतरों तक गाने से साबित नहीं होती, बल्कि देश के लिए किए गए संघर्ष और संविधान के प्रति प्रतिबद्धता से साबित होती है।
उन्होंने भाजपा पर वंदे मातरम् के मुद्दे को राजनीतिक बहस में बदलने का आरोप लगाया।
स्वतंत्रता आंदोलन और कांग्रेस की भूमिका का उल्लेख
भूपेश बघेल ने स्वतंत्रता आंदोलन में कांग्रेस की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष किया था।
उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अनेक लोगों ने जेल यात्राएं कीं और लाठियां-गोलियां झेलीं।
इसी संदर्भ में उन्होंने भाजपा के वैचारिक पूर्वज संगठनों की भूमिका पर भी सवाल उठाया और भाजपा नेताओं से इतिहास पर बहस करने की चुनौती दी।
सरकार से मांगा जवाब
पत्रकार वार्ता के अंत में भूपेश बघेल ने केंद्र और राज्य सरकार से कई सवालों के जवाब मांगे।
उनका पहला सवाल खनिज संशोधन अधिनियम से छत्तीसगढ़ के राजस्व और राज्य के अधिकारों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर था।
दूसरा सवाल प्रदेश के जर्जर स्कूल भवनों की मरम्मत और बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा था।
तीसरा सवाल प्रधानमंत्री आवास योजना के आंकड़ों में कथित अंतर को लेकर था।
चौथा मुद्दा वंदे मातरम् के ऐतिहासिक और वर्तमान राजनीतिक संदर्भ से जुड़ा रहा।
राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रही पत्रकार वार्ता
भूपेश बघेल की यह पत्रकार वार्ता ऐसे समय हुई है जब छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार के सामने विपक्ष लगातार जनहित से जुड़े मुद्दे उठा रहा है।
कांग्रेस की ओर से खनिज नीति, शिक्षा व्यवस्था और प्रधानमंत्री आवास जैसे विषयों को सरकार के खिलाफ राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश की जा रही है।
वहीं, भाजपा सरकार की ओर से इन आरोपों पर विस्तृत प्रतिक्रिया सामने आने के बाद ही तस्वीर और स्पष्ट होगी।
खनिज कानून का मुद्दा विशेष रूप से छत्तीसगढ़ के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य की अर्थव्यवस्था में खनिज संसाधनों की बड़ी भूमिका है। इसी तरह प्रधानमंत्री आवास योजना सीधे गरीब और ग्रामीण परिवारों से जुड़ी हुई है, जबकि स्कूलों की स्थिति का असर प्रदेश के लाखों विद्यार्थियों पर पड़ता है।
कांग्रेस ने सरकार को घेरने की बनाई रणनीति
भूपेश बघेल के बयान से यह स्पष्ट है कि कांग्रेस आने वाले समय में सरकार को आर्थिक अधिकारों, शिक्षा और जनकल्याणकारी योजनाओं के मुद्दों पर घेरने की तैयारी में है।
खनिज संशोधन अधिनियम को लेकर कांग्रेस का मुख्य तर्क राज्यों के अधिकार और राजस्व का है। स्कूलों के मामले में पार्टी सरकार की कार्यप्रणाली और रखरखाव व्यवस्था पर सवाल उठा रही है। वहीं प्रधानमंत्री आवास के आंकड़ों को लेकर कांग्रेस सरकारी आंकड़ों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाने की कोशिश कर रही है।
वंदे मातरम् का मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति से जुड़ा हुआ है और इस पर बघेल की टिप्पणी ने इसे छत्तीसगढ़ की राजनीतिक बहस में भी ला दिया है।
अब सरकार के जवाब का इंतजार
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पत्रकार वार्ता में जिन मुद्दों को उठाया है, उनमें कई ऐसे विषय हैं जिन पर सरकारी आंकड़े और आधिकारिक स्पष्टीकरण महत्वपूर्ण होंगे।
विशेष रूप से प्रधानमंत्री आवास योजना के आंकड़ों में कथित अंतर को लेकर राज्य सरकार की ओर से स्पष्ट जानकारी सामने आना जरूरी है। इसी प्रकार स्कूल भवनों की मरम्मत के लिए वर्तमान सरकार की योजना और बजट की जानकारी भी सार्वजनिक होने से स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
खनिज संशोधन अधिनियम के मामले में केंद्र और राज्य सरकार का आधिकारिक पक्ष सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि छत्तीसगढ़ के राजस्व और राज्यों के अधिकारों पर इसका वास्तविक प्रभाव कितना पड़ेगा।
फिलहाल पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इन मुद्दों को लेकर सरकार के सामने कई सवाल रख दिए हैं। अब राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर इन सवालों के जवाब का इंतजार है।
नोट: इस खबर में भूपेश बघेल द्वारा पत्रकार वार्ता में लगाए गए आरोप और प्रस्तुत किए गए आंकड़ों को उनके बयान के रूप में रखा गया है। संबंधित सरकारी आंकड़ों और दावों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि आवश्यक है।














