भारत की अनमोल ज्ञान-परंपरा को वैश्विक सम्मान: महाभारत, राजतरंगिणी और अर्थशास्त्र UNESCO की ‘Memory of the World’ रजिस्टर में शामिल
मुख्य बिंदु (Summary Highlights)
- ऐतिहासिक उपलब्धि: महर्षि वेद व्यास रचित महाभारत, कल्हण कृत राजतरंगिणी और कौटिल्य (चाणक्य) रचित अर्थशास्त्र को यूनेस्को के ‘Memory of the World Asia-Pacific Regional Register’ (MOWCAP) में पंजीकृत किया गया।
- वैश्विक पहचान: यह निर्णय मंगोलिया की राजधानी उलानबटार में आयोजित Memory of the World Committee for Asia and the Pacific के 10वें आम सत्र के दौरान लिया गया।
- सांस्कृतिक संवर्धन: इन तीन पांडुलिपियों को शामिल किए जाने के साथ ही वैश्विक स्तर पर भारत की बौद्धिक, दार्शनिक और राजनीतिक परंपरा की निरंतरता की पुष्टि हुई है।
- संरक्षण का संकल्प: इस पहल का मुख्य उद्देश्य एशिया-प्रशांत क्षेत्र की असाधारण दस्तावेजी विरासत (Documentary Heritage) का डिजिटलीकरण और भावी पीढ़ियों के लिए दीर्घकालिक संरक्षण सुनिश्चित करना है।
भारत की प्राचीन सभ्यतागत ज्ञान-परंपरा को एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर अभूतपूर्व प्रतिष्ठा हासिल हुई है। संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) ने भारत के तीन सबसे प्रतिष्ठित और कालजयी ग्रंथों—महर्षि वेद व्यास रचित ‘महाभारत’, 12वीं शताब्दी के विद्वान कल्हण द्वारा रचित इतिहास ग्रंथ ‘राजतरंगिणी’, और नीतिशास्त्र एवं राजनीति विज्ञान के मूर्धन्य विद्वान कौटिल्य (चाणक्य) कृत ‘अर्थशास्त्र’—को आधिकारिक तौर पर Memory of the World Asia-Pacific Regional Register में शामिल कर लिया है।
यह ऐतिहासिक घोषणा वैश्विक स्तर पर भारत की समृद्ध बौद्धिक, साहित्यिक, दार्शनिक और राजनीतिक विरासत पर मुहर लगाती है। यूनेस्को का यह कदम न केवल इन ग्रंथों के कालजयी महत्व को स्वीकार करता है, बल्कि यह भी साबित करता है कि प्राचीन भारत के विचार, शासन प्रणाली और नैतिक मूल्य संपूर्ण मानव जाति की साझी बौद्धिक धरोहर हैं।
क्या है UNESCO का Memory of the World Programme?
UNESCO का Memory of the World (MoW) Program 1992 में शुरू किया गया एक अंतरराष्ट्रीय अभियान है। इसका मुख्य उद्देश्य दुनिया भर की दुर्लभ पांडुलिपियों, ऐतिहासिक दस्तावेजों, अभिलेखागारों और मौखिक इतिहास परंपराओं का संरक्षण करना है जो युद्ध, प्राकृतिक आपदाओं, या देखरेख के अभाव में नष्ट होने की कगार पर हैं।
एशिया-प्रशांत क्षेत्र के लिए इसकी क्षेत्रीय संस्था MOWCAP (Memory of the World Committee for Asia and the Pacific) इस क्षेत्र के देशों की उन दस्तावेजी विरासतों की पहचान करती है जिनका सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, दार्शनिक या साहित्यिक महत्व असाधारण होता है। इस रजिस्टर में शामिल होने वाले दस्तावेजों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संरक्षण, डिजिटलीकरण और वैश्विक सुलभता का समर्थन प्राप्त होता है।
शामिल किए गए तीनों महाग्रंथों की विस्तृत रूपरेखा
| ग्रंथ का नाम | रचनाकार / रचयिता | रचना काल / समय | विषय-वस्तु एवं मूल योगदान |
|---|---|---|---|
| महाभारत (Mahabharata) | महर्षि वेद व्यास | प्राचीन काल (वैदिक एवं उत्तर-वैदिक युग) | धर्म, कर्तव्य, न्याय, मानवीय रिश्ते, समाजशास्त्र और ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ के माध्यम से जीवन का दर्शन। |
| राजतरंगिणी (Rajatarangini) | कवि कल्हण | 12वीं शताब्दी (इसा पूर्व 1148-1149) | कश्मीर का प्रामाणिक कालानुक्रमिक इतिहास, निष्पक्ष इतिहास-लेखन शैली, समाज एवं राजनीति का वर्णन। |
| अर्थशास्त्र (Arthashastra) | कौटिल्य (चाणक्य) | चौथी शताब्दी ईसा पूर्व (मौर्य काल) | राज्यव्यवस्था, कूटनीति, आर्थिक नीति, सैन्य रणनीति, कर प्रणाली और लोक कल्याणकारी शासन। |
1. महाभारत: सभ्यतागत मूल्य और मानव दर्शन का महाकाव्य
महाभारत केवल कौरवों और पांडवों के बीच हुए युद्ध का वृत्तांत भर नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन के मूल आधारों—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। 1,00,000 से अधिक श्लोकों वाला यह विशाल ग्रंथ विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य है।
यूनेस्को ने माना है कि महाभारत की प्रासंगिकता समय और सीमाओं से परे है। इसके अंतर्गत समाहित ‘श्रीमद्भगवद्गीता’ निष्काम कर्म और जीवन के सबसे जटिल नैतिक संकटों का समाधान प्रदान करती है। महाभारत में न्याय, शक्ति का संतुलन, मानवाधिकारों की प्राथमिक अवधारणाएं और पारिस्थिति-पारस्परिक जिम्मेदारियों का जैसा विस्तृत विवरण मिलता है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। भंडारी प्राच्य शोध संस्थान (BORI), पुणे और राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन द्वारा संरक्षित महाभारत की प्राचीन पांडुलिपियों ने इस नामांकन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
2. राजतरंगिणी: भारतीय इतिहास-लेखन की वैज्ञानिक परंपरा
12वीं शताब्दी में कश्मीर के विद्वान कल्हण द्वारा संस्कृत में रचित ‘राजतरंगिणी’ (जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘राजाओं की नदी’) भारतीय उपमहाद्वीप में वस्तुनिष्ठ इतिहास-लेखन (Historiography) का उत्कृष्ट उदाहरण है।
पश्चिमी विद्वानों की यह भ्रांति रही है कि प्राचीन भारत में कालानुक्रमिक इतिहास दर्ज करने की परंपरा नहीं थी। राजतरंगिणी इस धारणा को पूरी तरह ध्वस्त करती है। कल्हण ने इतिहास लिखते समय सिक्के, शिलालेख, भूमि-अनुदान पत्र, प्राचीन अवशेष और पूर्ववर्ती ग्रंथों जैसे प्राथमिक साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद ही अपना विवरण दर्ज किया। राजतरंगिणी में कश्मीर के राजवंशों के साथ-साथ वहां के समाज, अर्थशास्त्र, भूगोल और प्रशासकों के गुणों एवं दोषों का निष्पक्ष मूल्यांकन किया गया है।
3. अर्थशास्त्र: राज्यशास्त्र, कूटनीति और अर्थव्यवस्था का आधारशिला ग्रंथ
चौथी शताब्दी ईसा पूर्व में मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य के प्रधानमंत्री और गुरु कौटिल्य (चाणक्य) द्वारा रचित ‘अर्थशास्त्र’ राज्य संचालन, कूटनीति और अर्थशास्त्र की विश्व की सबसे प्राचीन एवं प्रामाणिक कृतियों में से एक है।
15 भागों (अधिकरणों) में विभाजित यह ग्रंथ किसी राज्य की विदेश नीति (‘मंडल सिद्धांत’), गुप्तचर प्रणाली, कर संग्रहण, प्रशासनिक संरचना, भ्रष्टाचार नियंत्रण और कानून-व्यवस्था का विस्तृत विवरण देता है। अर्थशास्त्र का मूल मंत्र—“प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्” (प्रजा के सुख में ही राजा का सुख है और प्रजा के हित में ही राजा का हित है)—आज के आधुनिक लोकतांत्रिक राज्यों के लिए भी लोक कल्याण का मार्गदर्शक सिद्धांत है।
राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन और संरक्षण के प्रयास
भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के तत्वावधान में कार्यरत राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन (National Mission for Manuscripts – NMM) ने इन अमूल्य ग्रंथों के नामांकनों को तैयार करने और यूनेस्को के समक्ष प्रस्तुत करने में केंद्रीय भूमिका निभाई है।
भारत में लाखों की संख्या में पांडुलिपियां उपलब्ध हैं, जो ताड़पत्रों, भोजपत्रों, कपड़ों और हस्तनिर्मित कागजों पर लिखी गई हैं। इन ग्रंथों को यूनेस्को के रजिस्टर में स्थान मिलने से:
- इन दुर्लभ पांडुलिपियों का उच्च गुणवत्ता वाला डिजिटल आर्काइव (High-resolution Digitization) तैयार किया जाएगा।
- वैश्विक शोधकर्ताओं और विद्वानों के लिए ये दस्तावेज आसानी से उपलब्ध होंगे।
- पांडुलिपि संरक्षण तकनीकों (Conservation Techniques) में अंतरराष्ट्रीय सहयोग प्राप्त होगा।
- भावी पीढ़ियों के लिए भारत की लिपि-ज्ञान और भाषाई विविधता को सुरक्षित रखा जा सकेगा।
भारत की अन्य धरोहरें जो MoW रजिस्टर में दर्ज हैं
इससे पूर्व भी भारत की कई ऐतिहासिक और साहित्यिक निधियों को यूनेस्को के Memory of the World अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय रजिस्टरों में स्थान मिल चुका है, जिनमें प्रमुख हैं:
- ऋग्वेद पांडुलिपि: भंडारी प्राच्य शोध संस्थान, पुणे में संरक्षित ऋग्वेद की 28 पांडुलिपियां।
- शाकुंतलम: महाकवि कालिदास की विश्वप्रसिद्ध नाट्य कृति।
- रामचरितमानस: संत तुलसीदास कृत कालजयी काव्य।
- पंचतंत्र: पंडित विष्णु शर्मा की नीति कथाएं।
- तमिल चिकित्सा पांडुलिपियां: सिद्ध चिकित्सा प्रणाली से संबंधित प्राचीन दस्तावेज।
- शांतिनिकेतन और गांधीजी के पत्र: आधुनिक भारत की ऐतिहासिक दस्तावेजी संपत्तियां।
भविष्य पर प्रभाव और सांस्कृतिक कूटनीति
यूनेस्को द्वारा महाभारत, राजतरंगिणी और अर्थशास्त्र को दी गई यह मान्यता भारत की सांस्कृतिक कूटनीति (Cultural Diplomacy) और ‘सॉफ्ट पावर’ को वैश्विक पटल पर और अधिक सुदृढ़ करती है। यह इस बात का प्रमाण है कि प्राचीन भारत केवल धार्मिक या आध्यात्मिक ज्ञान तक सीमित नहीं था, बल्कि इतिहास, राजनीति, कूटनीति, समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में भी दुनिया का अग्रणी मार्गदर्शक था।
आने वाले समय में, इस मान्यता से भारत के शोध संस्थानों, विश्वविद्यालयों और संग्रहालयों को वैश्विक स्तर पर नई पहचान मिलेगी और युवाओं में अपनी विरासत के प्रति जागरूकता और गौरव का संचार होगा।












