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Ambikapur News : करम के डार नोनी सरना कर पूजा, सब ले सुघर ऐदे हमर सरगुजा – संतोष दास ‘सरल’

करम के डार नोनी सरना कर पूजा, सब ले सुघर ऐदे हमर सरगुजा – संतोष दास ‘सरल’

P.S.YADAV/ब्यूरो चीफ सरगुजा// जिला प्रशासन के सौजन्य और अखिल भारतीय हिन्दी महासभा इकाई अम्बिकापुर की ओर से मैनपाट-महोत्सव में कवि-सम्मेलन का आयोजन किया गया।

सम्मेलन के प्रारंभ में कवयित्री पूर्णिमा पटेल ने सुमधुर स्वरों में सरस्वती-वंदना- नित नयन जल से पखारूं पांव तेरे शारदे, हाथ मेरे सर पे रख दे, कर दया मां शारदे- की मनोहर प्रस्तुति देकर वातावरण को भक्तिरस से सराबोर कर दिया। तदुपरांत मालती सिंह तोमर ने सुंदर सरगुजिहा सुआ-गीत- हाथ धरे कउड़ी, खखोरी धरे दउरी, मोर सुगाना चली जाबो भंवरी बाजार- सुनाकर समां बांध दिया। आचार्य दिग्विजय सिंह तोमर ने सरगुजा संभाग में सड़कों की दुर्दशा पर चिंता जाहिर करते हुए जब कविता पढ़ी तो, पूरा आयोजन-स्थल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा- सड़क-दुर्घटना में मौत, मातम पसरता तड़के, कब तक बनेगी हुजूर, सरगुजा संभाग की सड़कें। मंशा शुक्ला ने बेटियों को ईश्वर की अनुपम कृति बताते हुए उनकी महिमा का बखान किया- जो बांध दे दोनों कुलों को एक डोर में। देदीप्यमान दीप की ज्योति हैं बेटियां। बढ़ने दो उन्हें, करने दो, छूने दो फलक को, कुल, रीति, नीति, संस्कार की वाहक हैं बेटियां। आशा पाण्डेय ने बेटियों के हक की गुहार लगाई- न मुझे सम्मान चाहिए, न मुझे अपमान चाहिए। मैं बेटी हूं, मुझे बेटी-सी बस पहचान चाहिए। प्रोफेसर अजयपाल सिंह ने भी अपनी ओजस्वी रचना द्वारा नारी की महानता का स्वर बुलंद किया- जननी हो तुम जनों धनंजय और भीम-सा अभिमानी। आने दो अब राम,कृष्ण को, हे माता! हे कल्याणी!।

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मुकुन्दलाल साहू ने जहां वासंती गीत – पड़े हैं धरा पर जब से वासंती पांव रे, झूम-झूम-झूम उठे हैं मनुआं के गांव रे- द्वारा कार्यक्रम में मधुरिमा भर दी, वहीं गीतकार पूनम दुबे ने अपना चहकदार, सुरीला गीत- तेरी मेरी बात रहे, यूं ही बरसात रहे- सुनाकर सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। संतोषदास ‘सरल’ ने सरगुजा की महिमा पर शानदार सरगुजिहा गीत की प्रस्तुति दी- करम के डार नोनी, सरना कर पूजा, सब ले सुघर ऐदे हमर सरगुजा। आशुकवि विनोद हर्ष ने मैनपाट-महोत्सव की व्यवस्था पर करारा व्यंग्य करते हुए तुरत-फुरत तैयार कर एक ऐसी कविता प्रस्तुत कर दी, जिसे सुनकर श्रोता हंसते-हंसते लोट-पोट हो गए और दिल से दाद भी देने लगे- मुझे नहीं जानना आंखें बंद हैं या खुली हैं। माथे पे लगा लूं हे प्रशासन! कहां आपकी चरण -धूलि है। हम बिलकुल नहीं करेंगे शिकायत इन खाली कुर्सियों की। कुमार विश्वास भी निपट गए, तो विनोद हर्ष किस खेत की मूली है।

अंत में, डॉ0 उमेश पाण्डेय ने ऐतिहासिक दौर में भी कवियों की निरंतर सृजनशीलता का उल्लेख करते हुए कवि-सम्मेलन का यादगार समापन किया- मैंने बदलते हुए कल को देखा है। सनातनकाल के परिवर्तन, सल्तनतकाल के विघटन, भक्तिकाल के नवजागरण। मैं भले ही बदलता रहा पर मेरी कलम कभी नहीं रूकी। कार्यक्रम का काव्यमय संचालन प्रोफेसर डॉ0 अजयपाल सिंह ने किया और आभार डॉ0 उमेश पाण्डेय ने जताया।

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