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मच्छर के खून से संक्रमण का सुराग

 मच्छर आपका खून चूसे तो काफी तकलीफदायक होता है और कभी-कभी बीमारी की सौगात भी साथ लाता है। लेकिन हर चीज़ का एक सकारात्मक पक्ष भी होता है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि रक्तपान कर चुके मच्छर के खून का विश्लेषण करके पता लगाया जा सकता है कि उसने जिस व्यक्ति (अथवा जानवर को) काटा था उसके शरीर में कौन-कौन से संक्रमण मौजूद थे। वैसे यह रोग निदान की तकनीक तो साबित नहीं होगी लेकिन इससे किसी क्षेत्र में संक्रमणों का अध्ययन करने में मदद मिल सकती है। इसके अलावा इस तरीके की मदद से यह भी पता चल सकेगा कि किसी क्षेत्र में कौन-सा संक्रमण फैलने की आशंका है।

ऐसा नहीं है कि इस तरह का अध्ययन पहली बार किया गया है। लेकिन वे सभी स्वयं व्यक्ति के खून में एंटीबॉडीज़ की उपस्थिति पर टिके थे। एंटीबॉडीज़ शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र बनाता है और ये शरीर में कई महीनों तक टिकी रह सकती हैं। लेकिन हाल के अध्ययन में ब्रिसबेन स्थित क्यू.आई.एम.आर. बर्गहॉफर मेडिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट की कार्ला विएइरा ने मच्छरों की मदद ली।

विएइरा ने अपना अध्ययन रॉस रिवर वायरस पर केंद्रित किया था। यह वायरस ऑस्ट्रेलिया और कुछ द्वीपों का स्थानिक है और काफी दुर्बलताजनक बीमारी का कारण बन सकता है। विएइरा और उनके साथियों ने 2021 और 2022 में ब्रिसबेन के बगीचों से करीब 55,000 मच्छर पकड़े। इनमें से जिन मच्छरों ने हाल ही में रक्तपान किया था, उनमें से शोधकर्ताओं ने लगभग 2-2 मिलीलीटर खून निचोड़ा और उसमें रॉस रिवर वायरस की एंटीबॉडी की जांच की। इसके अलावा शोधकर्ताओं ने उस खून में से डीएनए के खंडों का अनुक्रमण करके यह भी पता किया कि किसी मच्छर ने किस मेज़बान (मनुष्य अथवा जानवर) का खून पीया था।

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अध्ययन के प्रारंभिक नतीजों में बताया गया है कि पकड़े गए मच्छरों में से 480 खून से लबालब थे। इनमें से आधे से ज़्यादा ने मनुष्यों का खून पीया था जबकि शेष ने अन्य जानवरों का (जैसे 6 प्रतिशत गाय, 9 प्रतिशत कंगारू वगैरह)। मनुष्यों का खून पी चुके मच्छरों से प्राप्त नमूनों में आधे से ज़्यादा में रॉस रिवर वायरस के विरुद्ध एंटीबॉडी पाई गई।

इसी प्रकार के एक अन्य अध्ययन में मच्छरों द्वारा जानवरों के चूसे गए खून के नमूनों में कोविड वायरस और एक परजीवी (टॉक्सोप्लाज़्मा गोंडी) के विरुद्ध एंडीबॉडी मिलीं।

ऐसा लगता है कि यह तकनीक बीमारियों के प्रसार के अध्ययन में काफी उपयोगी साबित हो सकती है। लेकिन इसकी कुछ सीमाएं भी हैं। जैसे आंकड़ों से यह पता नहीं चलता कि जिस जानवर का खून मच्छर ने पीया था वह मच्छर पकड़े जाने के स्थान से कितना दूर था।

इसके अलावा एक दिक्कत यह है कि मच्छरों के खून में एंडीबॉडी मिलने के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि उतने ही अनुपात में संक्रमण भी आबादी में मौजूद है क्योंकि हो सकता है कि कई मच्छरों ने एक ही व्यक्ति को काटा हो। एक परेशानी यह बताई गई है कि खून पी चुका (चुकी) मच्छर को पकड़ना मुश्किल होता है क्योंकि खून पीने के बाद वह किसी अंधेरे स्थान में बैठकर उस खून को पचाती है। बहरहाल यह रोग प्रसार के संदर्भ में एक नई तकनीक तो है ही, जिसमें यह समस्या नहीं होगी कि आप एक-एक व्यक्ति के खून का नमूना एकत्रित करते फिरें। (स्रोत फीचर्स)

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