Advertisement

समन्वित कृषि प्रणाली पर कृषक प्रशिक्षण: आत्मनिर्भरता की ओर एक सार्थक पहल

समन्वित कृषि प्रणाली पर कृषक प्रशिक्षण: आत्मनिर्भरता की ओर एक सार्थक पहल

कवर्धा, 30 मार्च 2025। कृषि विज्ञान केन्द्र, कवर्धा में आदिवासी कृषकों के लिए एक दिवसीय समन्वित कृषि प्रणाली प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस प्रशिक्षण का उद्देश्य किसानों को पारंपरिक कृषि के साथ-साथ अन्य सहायक कृषि गतिविधियों को अपनाने के लिए प्रेरित करना था, जिससे उनकी आय में वृद्धि हो सके और वे आर्थिक रूप से सशक्त बन सकें।

कार्यक्रम का उद्देश्य और महत्व

समन्वित कृषि प्रणाली एक ऐसी पद्धति है, जिसमें कृषि, पशुपालन, बकरी पालन, मुर्गी पालन, मत्स्य पालन, वर्मीखाद उत्पादन, सब्जी उत्पादन आदि को एकीकृत किया जाता है। इस प्रणाली का प्रमुख उद्देश्य कृषकों की आय को बढ़ाना, कृषि संसाधनों का समुचित उपयोग करना और कृषि क्षेत्र को अधिक लाभदायक बनाना है।

इस कार्यक्रम का आयोजन राष्ट्रीय पशुरोग जानपदिक एवं सूचना विज्ञान संस्थान, बेंगलुरू द्वारा वित्त पोषित परियोजना के अंतर्गत किया गया। परियोजना के माध्यम से किसानों को नई तकनीकों और वैज्ञानिक विधियों से अवगत कराया गया, जिससे वे पारंपरिक खेती से अधिक लाभ अर्जित कर सकें।

मुख्य अतिथि एवं विशेषज्ञों का संबोधन

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में जिला पंचायत कबीरधाम के अध्यक्ष ईश्वरी साहु उपस्थित रहे। उन्होंने अपने संबोधन में किसानों को समन्वित कृषि प्रणाली अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया और छत्तीसगढ़ शासन द्वारा चलाई जा रही विभिन्न कृषक हितैषी योजनाओं की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि, “सरकार किसानों की आय दोगुनी करने के लिए कई योजनाएँ चला रही है, जिनका लाभ लेने के लिए उन्हें आधुनिक तकनीकों को अपनाना चाहिए।”

कृषि विज्ञान केन्द्र, कवर्धा के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. बी.पी. त्रिपाठी ने इस प्रशिक्षण कार्यक्रम की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि, “समन्वित कृषि प्रणाली एक प्रभावी कृषि मॉडल है, जिससे किसानों की आय को निरंतर बनाए रखा जा सकता है।” उन्होंने बताया कि किसानों को प्रशिक्षण देकर उन्हें इस प्रणाली से जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं।

इसके अलावा, डॉ. प्रशांत सागर शर्मा, पशुचिकित्सा सहायक शल्यज्ञ ने बकरी और मुर्गी पालन की तकनीकी पहलुओं के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने किसानों को बताया कि किस प्रकार वे उन्नत नस्लों का उपयोग कर अपनी आय को बढ़ा सकते हैं।

कृषकों को वितरित किए गए संसाधन

कार्यक्रम के दौरान मुख्य अतिथि ईश्वरी साहु ने कृषकों को समन्वित कृषि प्रणाली से संबंधित सामग्री वितरित की। इनमें उन्नत नस्ल की बकरियाँ, सब्जियों के उन्नत बीज, कड़कनाथ मुर्गे और बटेर के चूजे शामिल थे। इन संसाधनों के वितरण का उद्देश्य किसानों को इस प्रणाली को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना था।

ऑनलाइन माध्यम से विशेषज्ञों की भागीदारी

इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में निदेशक, अटारी, जोन – 9, जबलपुर, डॉ. एस. आर. के. सिंह और निदेशक प्रसार, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय, रायपुर, डॉ. एस. एस. टुटेजा ने ऑनलाइन माध्यम से किसानों को संबोधित किया। उन्होंने समन्वित कृषि प्रणाली की वैज्ञानिक विधियों और उसके लाभों पर प्रकाश डाला।

file_0000000093d882119d122d54d9d757b5
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.50.40 (4)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.50.38
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.50.39 (1)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.50.40
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.50.39 (3)
sjjj
WhatsApp-Image-2026-03-12-at-6.48.17-PM-1-298x300 (1)

फील्ड विजिट एवं व्यावहारिक प्रशिक्षण

इस कार्यक्रम के तहत किसानों को कृषि विज्ञान केन्द्र, कवर्धा में स्थापित विभिन्न कृषि इकाइयों का भ्रमण भी कराया गया। इसमें निम्नलिखित इकाइयाँ शामिल थीं:

  1. पशुपालन इकाई: जहां किसानों को उन्नत नस्ल के दुधारू पशुओं के पालन और देखभाल की जानकारी दी गई।
  2. कड़कनाथ पालन इकाई: इसमें किसानों को इस विशेष प्रजाति के मुर्गों के पालन की तकनीकें समझाई गईं।
  3. बटेर पालन इकाई: किसानों को बटेर पालन के लाभ और तकनीकी पहलुओं से अवगत कराया गया।
  4. मछली और बत्तख पालन इकाई: इस इकाई में किसानों को मत्स्य पालन और बत्तख पालन के बारे में व्यावहारिक जानकारी दी गई।

समन्वित कृषि प्रणाली के लाभ

विशेषज्ञों के अनुसार, समन्वित कृषि प्रणाली के कई लाभ हैं, जिनमें प्रमुख हैं:

  • निरंतर आय का स्रोत: किसानों को पूरे वर्ष आय प्राप्त होती है, जिससे वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनते हैं।
  • कम जोखिम: फसल खराब होने पर अन्य सहायक कृषि गतिविधियों से आय का स्रोत बना रहता है।
  • संसाधनों का समुचित उपयोग: पशुओं के अपशिष्ट पदार्थों का उपयोग खाद के रूप में किया जाता है, जिससे उर्वरता बनी रहती है।
  • पर्यावरण संरक्षण: जैविक कृषि पद्धतियों को अपनाने से पर्यावरण को कम नुकसान होता है।

किसानों की प्रतिक्रियाएँ

कार्यक्रम में शामिल हुए किसानों ने इस प्रशिक्षण को अत्यंत उपयोगी बताया। कवर्धा जिले के किसान रामलाल साहू ने कहा कि, “इस कार्यक्रम से हमें नई तकनीकों की जानकारी मिली, जिससे हम अपनी कृषि को अधिक लाभकारी बना सकते हैं।” वहीं, एक अन्य कृषक गीता बाई ने बताया कि वे अब बकरी पालन और सब्जी उत्पादन को अपनी आय का मुख्य स्रोत बनाने की योजना बना रही हैं।

कार्यक्रम में भागीदारी और भविष्य की योजनाएँ

इस कार्यक्रम में 50 से अधिक आदिवासी कृषकों ने भाग लिया। इसके अलावा, सेवा सहकारी समिति, कवर्धा के अध्यक्ष गोपाल साहू, कृषि विज्ञान केन्द्र, कवर्धा के अधिकारी/कर्मचारी तथा अन्य कृषि विशेषज्ञ भी इस कार्यक्रम में उपस्थित रहे।

कृषि विज्ञान केन्द्र, कवर्धा ने भविष्य में भी इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने की योजना बनाई है, ताकि अधिक से अधिक किसानों को समन्वित कृषि प्रणाली से जोड़ा जा सके।

कृषि विज्ञान केन्द्र, कवर्धा द्वारा आयोजित यह प्रशिक्षण कार्यक्रम किसानों के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर साबित हुआ। इस कार्यक्रम ने न केवल किसानों को नई कृषि तकनीकों से अवगत कराया, बल्कि उन्हें अपनी आय बढ़ाने के लिए विभिन्न सहायक कृषि गतिविधियों को अपनाने के लिए प्रेरित भी किया। इस तरह के प्रयास किसानों को आत्मनिर्भर बनाने में सहायक सिद्ध होंगे और समन्वित कृषि प्रणाली को बढ़ावा देंगे।

इस कार्यक्रम के माध्यम से आदिवासी कृषकों को कृषि के विविध पहलुओं पर व्यापक जानकारी मिली और उन्होंने समन्वित कृषि प्रणाली को अपनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाए। यह कार्यक्रम न केवल किसानों के लिए बल्कि कृषि क्षेत्र के सतत विकास के लिए भी एक महत्वपूर्ण पहल साबित हुआ।

 

ChatGPT Image Jul 20, 2026, 05_14_44 PM
ChatGPT Image Jul 20, 2026, 05_53_50 PM
ChatGPT Image Jul 20, 2026, 06_08_26 PM
ChatGPT Image Jul 20, 2026, 06_16_13 PM
ChatGPT Image Jul 20, 2026, 06_22_41 PM
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.12.06
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.16.05