वंदे मातरम भाजपा की राजनैतिक मजबूरी, आजादी की लड़ाई से लेकर आज तक किया विरोध: कांग्रेस
रायपुर, 16 अगस्त 2026: राष्ट्रगीत वंदे मातरम को लेकर प्रदेश कांग्रेस संचार विभाग के अध्यक्ष सुशील आनंद शुक्ला ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर करारा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रगीत को लेकर भाजपा अपने पूर्वजों की गलतियों को छुपाने का राजनैतिक प्रोपेगंडा कर रही है। वंदे मातरम के लिए कांग्रेस को भाजपा से सीख लेने की जरूरत नहीं है, क्योंकि कांग्रेस तो आजादी की लड़ाई के समय से ही भारत के जनजागरण के हथियार के रूप में इसका उपयोग करती आ रही है। जब स्वतंत्रता संग्राम में कांग्रेस कार्यकर्ता वंदे मातरम का गायन करते थे, तब भाजपा के पितृ संगठन इसका विरोध करते थे।
- RSS की किसी एक बैठक या भाजपा कार्यालय में वंदे मातरम गायन का वीडियो जारी करने की खुली चुनौती।
- कांग्रेस ने 1896 के राष्ट्रीय अधिवेशन में प्रथम बार सामूहिक गायन कर वंदे मातरम को दी थी मान्यता।
- 1937 में कांग्रेस ने इसे राष्ट्रीय गीत घोषित किया था।
- आजादी के आंदोलन में RSS और हिंदू महासभा की भूमिका पर उठाए गंभीर सवाल।
RSS और भाजपा को खुली चुनौती
सुशील आनंद शुक्ला ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर भाजपा का हर छोटा-बड़ा नेता खुद को बड़ा देशभक्त साबित करने के लिए वंदे मातरम पर बयानबाजी कर रहा है, लेकिन यह सिर्फ दिखावा है। उन्होंने चुनौती देते हुए कहा, “कांग्रेस की हर बैठक की शुरुआत वंदे मातरम के गायन से होती है। संसद में बड़ी-बड़ी बातें करने वाली भाजपा की बैठकों और आरएसएस के कार्यक्रमों में वंदे मातरम नहीं गाया जाता। यदि आरएसएस की एक भी बैठक में इसका गायन हुआ हो, तो भाजपा उसका वीडियो जारी करने का साहस दिखाए।”
कांग्रेस ने 1896 में दिया था सम्मान
कांग्रेस संचार अध्यक्ष ने कहा कि वंदे मातरम पर बात करने से पहले भाजपा को कांग्रेस का धन्यवाद करना चाहिए। कांग्रेस पार्टी ने 1896 में अपने राष्ट्रीय अधिवेशन में सामूहिक गायन करके प्रथम बार इसे मान्यता और सम्मान दिया था तथा 1937 में इसे राष्ट्रगीत घोषित किया। उन्होंने आरोप लगाया कि जिन्होंने पहले संविधान और तिरंगे को नकारा, वे आज सत्ता में बने रहने के लिए गिरगिट की तरह रंग बदल रहे हैं और अपने पितृ संगठनों के इतिहास पर पर्दा डालने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं।
आजादी की लड़ाई में RSS के योगदान पर सवाल
सुशील आनंद शुक्ला ने कहा कि वंदे मातरम आजादी की लड़ाई का अग्रिम गीत था। जब देश आजादी की लड़ाई लड़ रहा था, तब भाजपा के पितृ संगठन के लोग मुस्लिम लीग के साथ मिलकर अंग्रेजी सरकार की चाटुकारिता में लगे थे। उन्होंने सवाल उठाया कि 1925 में गठित आरएसएस का 1947 तक चले आजादी के आंदोलन में क्या योगदान था? अंग्रेजों का साथ देने वाले लोग किस नैतिकता से आज वंदे मातरम की वर्षगांठ मना रहे हैं?
सियासी विवशता या राजनैतिक पाखंड?
उन्होंने आगे कहा कि 1876 में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संन्यासी विद्रोह की पृष्ठभूमि पर रचित इस देशभक्ति गीत का प्रथम प्रकाशन 1882 में हुआ था। इसके बाद 1896 में कांग्रेस अधिवेशन के माध्यम से इसे प्रसिद्धि मिली और यह जन-जन के हृदय में बसा। भाजपा और आरएसएस को बताना चाहिए कि उन्हें राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान से इतनी हिकारत क्यों रही है? अब तक जिस गीत का विरोध करते रहे, उस पर इवेंट आयोजित करना भाजपा की सियासी विवशता है या राजनैतिक पाखंड?











