मोदी सरकार का मिनरल संशोधन अधिनियम 2026 छत्तीसगढ़ के हितों के खिलाफ, राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता पर हमला: दीपक बैज
रायपुर, 16 अगस्त 2026: प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने संसद में बिना किसी सार्थक चर्चा के पारित ‘मिनरल संशोधन अध्यादेश 2026’ को छत्तीसगढ़ के आर्थिक हितों के खिलाफ लिया गया फैसला करार दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि मोदी सरकार ने अपने पूंजीपति मित्रों के मुनाफे के लिए यह कानून पारित करवाया है, जो खनिज अधिकारों पर राज्यों द्वारा कर या उपकर (Cess) लगाने के संवैधानिक अधिकार पर रोक लगाता है और केंद्र को खनिज-युक्त भूमि पर पूर्ण नियंत्रण प्रदान करता है।
- ‘मिनरल संशोधन बिल 2026’ राज्यों के कर लगाने के अधिकारों पर सीधा कुठाराघात।
- सुप्रीम कोर्ट के 2024 के ऐतिहासिक फैसले को निष्प्रभावी करने की साजिश।
- छत्तीसगढ़, झारखंड और केरल जैसे खनिज उत्पादक राज्यों के राजस्व में भारी गिरावट का अंदेशा।
- कांग्रेस की मांग: संवेदनशील विधेयक को तुरंत संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजा जाए।
संघीय ढांचे पर कुठाराघात और वित्तीय अधिकारों का हनन
दीपक बैज ने कहा कि MMDR Act 1957 के तहत अब तक मुख्य खनिजों और गौण खनिजों के बीच स्पष्ट अंतर रहा है। नए संशोधन से अब छत्तीसगढ़ जैसे खनिज समृद्ध राज्य केंद्र की निर्धारित सीमाओं के बिना अतिरिक्त कर या लेवी नहीं लगा सकेंगे। केंद्र सरकार का यह दावा कि यह बदलाव ‘खनन उद्योग पर आर्थिक बोझ कम करने’ के लिए किया गया है, पूरी तरह से राज्यों के अधिकारों का अतिक्रमण और संघीय ढांचे (Federalism) के खिलाफ है।
निजी कंपनियों के फायदे के लिए पेसा और ग्रामसभा के अधिकारों की उपेक्षा
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि पांचवीं अनुसूची के क्षेत्रों में पेसा कानून के तहत मिले अधिकारों को पहले भी छीना जाता रहा है। नंदराज पर्वत से लेकर हसदेव, तमनार, धर्मजयगढ़, रायगढ़, मैनपाट, बैलाडीला, बचेली, किरंदुल, कांकेर और बीजापुर में ग्रामसभाओं की सैकड़ों आपत्तियों को दरकिनार कर निजी कंपनियों को लाभ पहुंचाया गया। यह नया संशोधन भी इसी षड्यंत्र का हिस्सा है।
सुप्रीम कोर्ट के 2024 के फैसले को बेअसर करने का प्रयास
दीपक बैज ने ध्यान दिलाया कि संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत ‘भूमि’ राज्य सूची का विषय है। यह संशोधन 2024 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए उस फैसले को निष्प्रभावी करने के लिए लाया गया है, जिसमें राज्यों को खनिज अधिकारों पर टैक्स लगाने की अनुमति दी गई थी। इसके तहत पूर्व में लगाए गए लेकिन वसूल न किए गए करों को अवैध घोषित करना राज्य की वित्तीय स्वायत्तता पर सीधा प्रहार है।
पर्यावरण क्षति की भरपाई पर रोक और JPC मांग की अनदेखी
उन्होंने कहा कि खनन गतिविधियों से स्थानीय पर्यावरण और बुनियादी ढांचे को होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए राज्यों द्वारा लगाया जाने वाला टैक्स बेहद जरूरी है। संसद में भारी हंगामे के बीच पारित किए गए इस विधेयक की गहन समीक्षा के लिए कांग्रेस ने संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के गठन की मांग की थी, जिसे सरकार ने नजरअंदाज कर दिया।










