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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जस्टिस पार्थ प्रीतम साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत ने कहा कि, पति-पत्नी के बीच सामान्य घरेलू विवाद, तीखी नोकझोंक या रंग-रूप को लेकर की गई टिप्पणियां हिंदू विवाह अधिनियम के तहत क्रूरता की श्रेणी में नहीं आता

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जस्टिस पार्थ प्रीतम साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत ने कहा कि, पति-पत्नी के बीच सामान्य घरेलू विवाद, तीखी नोकझोंक या रंग-रूप को लेकर की गई टिप्पणियां हिंदू विवाह अधिनियम के तहत क्रूरता की श्रेणी में नहीं आता है।

विवाह जैसे पवित्र बंधन को खत्म करने के लिए आरोपों का केवल लगाया जाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें कानून सम्मत और पुख्ता सबूतों से साबित करना अनिवार्य है। डिवीजन बेंच ने पति की तलाक नामंजूर कर दिया है। साथ ही जांजगीर- चांपा फैमिली कोर्ट के आदेश के खिलाफ पति की अपील खारिज कर दी है।

दरअसल, जांजगीर- चांपा निवासी दंपती का विवाह 7 मार्च 2019 को हिंदू रीति-रिवाज से हुआ था। विवाह के कुछ समय बाद ही दोनों पक्षों में मतभेद शुरू हो गए। पति ने फैमिली कोर्ट में हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत तलाक की अर्जी दी।

पति का आरोप था कि, पत्नी उसे झूठे मामलों में फंसाने की धमकी देती थी, बिना अनुमति के बाहर जाती थी और वैवाहिक जिम्मेदारी निभाने की जगह अलग रहने लगी थी।

पति का आरोप- काला कहकर ताने मारती थी पत्नी

पति ने यह भी दावा किया कि पत्नी उसे उसके सांवले रंग या शारीरिक बनावट को लेकर ताने देती थी। वहीं, पत्नी ने पति के आरोपों को गलत बताते हुए कहा कि पति उपेक्षा करते थे।

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पत्नी बोली- इलाज के लिए अस्पताल नहीं ले गया अस्पताल

गर्भावस्था के दौरान भी उसे उचित चिकित्सकीय देखभाल और सहयोग नहीं मिला। स्वास्थ्य बिगड़ने पर उसकी मां इलाज के लिए रायगढ़ ले गई थीं। इसके बाद पति या उसके परिजनों ने उसे वापस लाने के लिए प्रयास नहीं किया। पत्नी ने अधिनियम की धारा 27 के तहत अपना स्त्रीधन वापस दिलाने की भी मांग की थी।

फैमिली कोर्ट पति की अर्जी खारिज की, स्त्रीधन लौटाने के आदेश

जांजगीर के फैमिली कोर्ट ने 28 अगस्त 2024 को दिए फैसले में पति की तलाक की अर्जी को खारिज कर दिया था, जबकि पत्नी के स्त्रीधन वापसी के आवेदन को स्वीकार करते हुए एक महीने के भीतर लौटाने का निर्देश दिया था। इसी आदेश को पति ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

जीवन का असहनीय होना क्रूरता

हाईकोर्ट ने कहा कि, वैवाहिक जीवन की असुविधाओं, तीखी प्रतिक्रियाओं या रंग-रूप को लेकर की गई साधारण टिप्पणियों को तब तक क्रूरता नहीं माना जा सकता, जब तक कि वे जीवन को असहनीय बनाने वाले गंभीर और निरंतर आचरण का रूप न ले लें। इसके अलावा पति ने कहा कि पत्नी बिना किसी पर्याप्त कारण के उसे छोड़कर अलग रह रही है।

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