‘मोदी सरकार ने छीन ली त्योहारों की खुशी’: टीएस सिंहदेव का महंगाई और ग्रामीण संकट पर केंद्र पर तीखा प्रहार
देश में त्योहारों का सीजन चरम पर है, लेकिन आम आदमी की रसोई और जेब पर लगातार बढ़ती महंगाई का भारी दबाव है। इसी बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता टीएस सिंहदेव के एक आक्रामक बयान ने राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। सिंहदेव ने दो टूक शब्दों में कहा है कि यदि सरकार को देश की असलियत जाननी है, तो उसे विज्ञापनों और दावों की बजाय किसी आम भारतीय परिवार की रसोई और उसकी जेब के भीतर झांककर देखना चाहिए, जहां महंगाई ने जीना मुहाल कर दिया है।
“मोदी सरकार त्योहारों और व्यापारियों का नाम लेकर वोट चोरी के विरुद्ध हो रहे आंदोलन के खिलाफ दुष्प्रचार में जुटी है। सच्चाई जानना है, तो आम परिवार की जेब में झाँक लीजिए।”
“सितंबर में खुदरा महँगाई 5.54% और खाद्य महँगाई 7.74% रही। यानी रसोई का बजट लगातार दबाव में है।”
आंकड़े बयां कर रहे हैं जनता का दर्द: खुदरा और खाद्य महंगाई में बेतहाशा वृद्धि
टीएस सिंहदेव ने आधिकारिक आर्थिक आंकड़ों का हवाला देते हुए केंद्र सरकार की नीतियों पर सवालिया निशान लगाए हैं। हाल ही में जारी आंकड़ों के अनुसार, सितंबर महीने में खुदरा महंगाई (Retail Inflation) बढ़कर 5.54% पर पहुंच गई है, जबकि रसोई के मुख्य स्तंभ यानी खाद्य महंगाई (Food Inflation) की दर बढ़कर 7.74% दर्ज की गई है।
5.54%
सितंबर खुदरा महंगाई दर (CPI)
7.74%
सितंबर खाद्य महंगाई दर (CFPI)
इन आंकड़ों का सीधा अर्थ यह है कि आम आदमी की थाली से जुड़ी जरूरतें—जैसे सब्जियां, दालें, तेल और अन्य खाद्य पदार्थ—लगातार महंगे होते जा रहे हैं। सिंहदेव का कहना है कि लगातार बढ़ती कीमतों के कारण मध्यम वर्ग और गरीब परिवार का रसोई बजट पूरी तरह असंतुलित हो गया है, और सरकार इन जमीनी सच्चाइयों से मुंह मोड़ने का प्रयास कर रही है।
ग्रामीण भारत पर सबसे बड़ी मार: एफएमसीजी (FMCG) बिक्री में भारी गिरावट
कांग्रेस नेता ने केवल महंगाई तक अपनी बात सीमित नहीं रखी, बल्कि उन्होंने उपभोग (Consumption) के मोर्च पर आए संकट को भी उजागर किया। उनके मुताबिक, चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही यानी अप्रैल से जून 2026 के दौरान रोजमर्रा के इस्तेमाल होने वाले सामानों (Fast Moving Consumer Goods – FMCG) की बिक्री के वॉल्यूम में 2% की कुल गिरावट दर्ज की गई है।
स्थिति की गंभीरता को रेखांकित करते हुए उन्होंने विशेष रूप से ग्रामीण भारत का जिक्र किया। आंकड़े बताते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में एफएमसीजी उत्पादों की खपत में 5% की भारी गिरावट आई है। इसका स्पष्ट संदेश यह है कि गांवों में क्रय शक्ति (Purchasing Power) लगातार घट रही है। लोग अपनी बुनियादी जरूरत का सामान भी खरीदने में असमर्थ होते जा रहे हैं, और देश का ग्रामीण वर्ग इस आर्थिक मार से सबसे ज्यादा पिस रहा है।
एक आम भारतीय परिवार की रोजमर्रा की संघर्ष गाथा
आम आदमी के जीवन की वास्तविक कठिनाइयों को बयां करते हुए टीएस सिंहदेव ने मध्यम वर्गीय परिवारों के मासिक बजट के गणित को सामने रखा। उन्होंने सवाल उठाया कि जरा कोई अपने घर का हिसाब-किताब लगाकर देखे कि किस तरह आम नागरिक हर महीने आर्थिक चक्रव्यूह में फंसता जा रहा है:
- वेतन आते ही कटौतियां: महीने की पहली तारीख को तनख्वाह आते ही सबसे पहले घर का किराया और विभिन्न प्रकार की ईएमआई (EMI) कट जाती है।
- अनिवार्य खर्चों का बोझ: इसके बाद राशन, दूध, ताजी सब्जियां, बिजली के भारी-भरकम बिल, बच्चों की स्कूल-कॉलेज की फीस और जीवनरक्षक दवाइयों के खर्च सामने मुंह बाए खड़े रहते हैं।
- बचत का शून्य होना और भविष्य की चिंता: महीने के अंत तक पहुंचते-पहुंचते बचत तो दूर की बात है, बल्कि कई घरों में तो अगली तनख्वाह आने से पहले ही पैसे खत्म होने और उधार मांगने या खर्च चलाने की गहरी मानसिक चिंता सताने लगती है।
सिंहदेव ने जोर देकर कहा कि जब एक परिवार की पूरी कमाई केवल बुनियादी बिलों और ऋण चुकाने में ही समाप्त हो जाएगी, तो वह व्यक्ति त्योहारों की खुशियां कैसे मना पाएगा? सरकार का मुख्य दायित्व देशवासियों के जीवन को सुगम बनाना और महंगाई पर लगाम कसना था, लेकिन मोदी सरकार ने अपने इस मूल कर्तव्य से पूरी तरह मुंह मोड़ लिया है।
राजनीतिक विश्लेषक और जनता की प्रतिक्रिया
राजनीतिक गलियारों में टीएस सिंहदेव के इस बयान को बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। एक तरफ जहां केंद्र सरकार अपनी नीतियों और त्योहारी सीजन में बाजार की रौनक के दावे कर रही है, वहीं विपक्ष लगातार महंगाई और ग्रामीण भारत की बदहाली को मुख्य मुद्दा बना रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि खाद्य पदार्थों की कीमतें और गिरती ग्रामीण मांग आने वाले दिनों में राजनीतिक बहस का एक बड़ा केंद्र बन सकती हैं।
बढ़ती महंगाई ने आम आदमी के हाथ से त्योहारी उल्लास और उमंग को छीन लिया है। त्योहारों के इस पावन अवसर पर जहां बाजारों में रौनक होनी चाहिए थी, वहां आम नागरिक महंगाई के बोझ तले दबा हुआ अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहा है।














