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‘चलना तुझको किस तरह, पांव न आए मोच, मैंने पा लीं मंज़िलें, तू अपना अब सोच’…………….

‘चलना तुझको किस तरह, पांव न आए मोच, मैंने पा लीं मंज़िलें, तू अपना अब सोच’…………….

ब्यूरो चीफ/सरगुजा// गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की पुण्यतिथि पर सामाजिक कार्यकर्ता वंदना दत्ता के निवास पर सरगुजा के वरिष्ठ कवि अंजनी कुमार सिन्हा की अध्यक्षता में काव्यगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पूर्व बीईओ सुरेश प्रसाद जायवाल और विशिष्ट अतिथि गीता दुबे थीं। काव्यगोष्ठी का शुभारंभ गीतकार कृष्णकांत पाठक ने सरस्वती वंदना – हे सुरेश्वरी, स्वरभाषिणी, मां स्वर प्रकाश-प्रकाशिनी मां शारदे- से किया। कार्यक्रम की आयोजिका वंदना दत्ता ने सभी कवियों का आदर-सत्कार किया और गुरूदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के महान् व्यक्तित्व पर संक्षेप में प्रकाश डालते हुए बताया कि वे देश के महान् कवि, साहित्यकार, संगीतकार, दार्शनिक, चिंतक, मनीषी, समाज सुधारक और राजनीतिज्ञ थे। उनके दो गीतों को भारत व बांग्लादेश के राष्ट्रगीतों का दर्जा प्राप्त है। वे एशिया के पहले नोबेल पुरस्कार विजेता रहे। उनके द्वारा देशहित में किए गए महान् कार्य हमेशा देशवासियों को प्रेरणा देते रहेंगे। गीता द्विवेदी ने शिव-दरबार की मनोरम झांकी प्रस्तुत की- शेखर सुशोभित चन्द्रशेखर, गंग जल धारा चले, सब भक्त विनती कर रहे हैं, शम्भु हैं अम्बर तले। अनिता मंदिलवार ने कविता- मौसम की मनमानी लिखते हैं, कहीं धूप, कहीं पानी लिखते हैं- में वर्षाकालीन वातावरण का जीवंत चित्रण किया।
मनुष्य को जीवन में एक सच्चे जीवन साथी की तलाश हमेशा रहती है, जिससे वह अपने निजी सुख-दुख, परेशानियों, विचारों और भावनाओं को साझा कर सके। गीतकार संतोषदास सरल के गीत ने इसी ओर संकेत भी किया- कोई हमदर्द मिले, दिल का दर्द बांट लूं, ज़िदगी चल तुझे मौसम की तरह काट लूं। वरिष्ठ कवि एसपी जायसवाल ने भारतीय नारी की अपार शक्तियों और बेमिसाल उपलब्धियों का बखान करते हुए यहां तक कह डाला कि- अब घूंघट के पार हुईं नारियां, अब बुरके उतार रहीं नारियां। अब अबला नहीं, सबला हुईं नारियां। धरती ही नहीं आसमान में वायुयान उड़ा रहीं नारियां। उन्होंने सरगुजिहा गीत- दाई मोर दाई, तोर से सुघ्घर कोनो नहीं, दुनिया ले खोज के हारें मैं- की भी सुन्दर प्रस्तुति दी। देवेन्द्रनाथ दुबे एक मंजे हुए गीतकार हैं। उन्होंने जीवन की सच्चाईयों से सबको रूबरू कराया- तनहाई को मीत बनाया जा सकता है, दीवारों को गीत सुनाया जा सकता है। नागफनी को देखा तो ये याद आया, गमले में भी दर्द उगाया जा सकता है। उनके गीत – तोल-मोल के बोल रे बंदे- ने गोष्ठी में धूम मचा दी। वरिष्ठ कवि अंजनी कुमार सिन्हा ने अपने गीत में सही फरमाया कि- दिल में चुभे जो बात वो बोली नहीं जाती, दिल है दिल से दिल्लगी की नहीं जाती। इबादत दिखावटी, इरादे नापाक हों, ख़ुदा क़सम ख़ुदा तलक बंदगी नहीं जाती।
अम्बरीष कश्यप ने अपने काव्य में चुनौतियों का सामना करने का आव्हान किया- कांटों से भरपूर भरा था ये रस्ता, चला तो अब आसान दिखाई देता है। इनके अलावा गीता दुबे की कविता- भाई-बहनों का निश्छल प्यार, रक्षाबंधन का शुभ त्योहार, राजलक्ष्मी पाण्डेय का गीत- सारा जगत् है राममय, कण-कण में हैं प्रभुराम जी, राजनारायण द्विवेदी की कविता- घर का बूढ़ा हूं, बुज़ुर्ग कहलाता हूं और मीना वर्मा की रचना- ये सोच है हम इंसानों की, कि अकेला क्या कर सकता है पर देख ज़रा उस सूरज को वो अकेला ही चमकता है- ने गोष्ठी को नई ऊंचाइयां प्रदान कीं। कार्यक्रम में वंदना दत्ता और ममता चौहान ने भी सुमधुर गीत सुनाए। अंत में, कवि मुकुन्दलाल साहू ने अपने प्रेरक दोहों से गोष्ठी का यादगार समापन किया- चलना तुझको किस तरह, पांव न आए मोच। मैंने पा लीं मंज़िलें, तू अपना अब सोच। जीने में आए मज़ा, मधुर लगे संसार, तेरे-मेरे हृदय के, जुड़ जाएं जब तार। कार्यक्रम का काव्यमय संचालन वरिष्ठ कवयित्री मीना वर्मा और आभार वंदना दत्ता ने जताया।
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