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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: प्राचार्य पदोन्नति नियम वैध, 1378 व्याख्याताओं का प्रमोशन रास्ता साफ

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने प्राचार्य पदोन्नति को लेकर राज्य सरकार के बनाए नियमों को पूरी तरह वैध ठहराया है। कोर्ट ने नारायण प्रकाश तिवारी की याचिका खारिज कर दी, जिससे ई संवर्ग के 1378 व्याख्याताओं की पदोन्नति का रास्ता साफ हो गया है।

बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में लंबे समय से अटकी प्राचार्य पदोन्नति को लेकर अब बड़ा फैसला आ गया है। हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने राज्य सरकार के बनाए गए नियमों और मापदंडों को वैध ठहराते हुए याचिकाकर्ता नारायण प्रकाश तिवारी की याचिका को खारिज कर दिया है। इस फैसले के बाद ई संवर्ग के 1378 व्याख्याताओं के लिए प्राचार्य पद पर पदोन्नति का रास्ता साफ हो गया है।

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यह मामला उस समय चर्चा में आया था जब स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा 30 अप्रैल 2025 को प्राचार्य पदोन्नति की सूची जारी की गई थी। इस सूची में ई संवर्ग और टी संवर्ग के कुल 2,925 शिक्षकों को प्राचार्य बनाया गया था। लेकिन कुछ शिक्षकों ने इस सूची को चुनौती देते हुए याचिकाएं दायर की थीं।

याचिकाकर्ता नारायण प्रकाश तिवारी ने अपनी याचिका में मांग की थी कि प्राचार्य पद पर 65% की बजाय 100% पद ई संवर्ग को दिए जाएं। उनका कहना था कि लोकल बॉडी संवर्ग और सीधी भर्ती के लिए तय किए गए प्रतिशत असंवैधानिक हैं।

इस पर राज्य शासन की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने तर्क दिया कि प्राचार्य पदोन्नति के लिए जो नियम बनाए गए हैं, उनकी वैधता पहले ही हाईकोर्ट के डिवीजन बेंच में चुनौती दी जा चुकी है। 9 जून से 17 जून 2025 के बीच हुई सुनवाई के बाद कोर्ट ने इन नियमों को सही माना था और आधा दर्जन याचिकाओं को खारिज कर दिया था।

डिवीजन बेंच ने यह स्पष्ट किया था कि प्राचार्य पदों के लिए 65% ई संवर्ग, 25% लोकल बॉडी संवर्ग और 10% सीधी भर्ती का कोटा ही लागू रहेगा। इस फैसले के बाद 30 अप्रैल को जारी प्राचार्य पदोन्नति सूची पर लगी रोक भी हटा दी गई है।

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5 अगस्त 2025 को फैसला सुरक्षित रखा गया था
जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की सिंगल बेंच ने 5 अगस्त को याचिका पर सुनवाई पूरी कर ली थी और फैसला सुरक्षित रख लिया था। अब कोर्ट ने अपने निर्णय में राज्य सरकार के बनाए नियमों को पूरी तरह वैध बताते हुए याचिका को खारिज कर दिया।

लंबे समय से चल रहा था विवाद
छत्तीसगढ़ में प्राचार्य पदोन्नति को लेकर विवाद 2019 से चला आ रहा था। पहले यह मुद्दा ई संवर्ग और लोकल बॉडी संवर्ग के बीच कोटे को लेकर उठा, बाद में इसमें बीएड और डीएलएड योग्यताओं का सवाल भी जुड़ गया।

28 मार्च 2025 को हुई पिछली सुनवाई में राज्य सरकार ने कोर्ट को आश्वस्त किया था कि अगली सुनवाई तक प्राचार्य पदोन्नति का आदेश जारी नहीं किया जाएगा। लेकिन 30 अप्रैल को सूची जारी कर दी गई, जिस पर अगले दिन 1 मई को कोर्ट ने रोक लगा दी थी।

अब जब कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि सरकार के नियम वैध हैं, तो विभाग पदोन्नति प्रक्रिया को फिर से बहाल कर सकता है। इससे ई संवर्ग के 1378 व्याख्याताओं को प्रमोशन का लाभ मिलने का मार्ग प्रशस्त हो गया है।

इन्टरविनर अधिवक्ता अनूप मजूमदार ने सरकार की ओर से पैरवी करते हुए कहा कि राज्य सरकार ने प्रमोशन नीति बनाते समय संवर्गों के बीच संतुलन रखा है। इस पर कोर्ट ने सहमति जताई और सरकार के नियमों को संवैधानिक और तर्कसंगत माना।

इस फैसले को लेकर शिक्षा विभाग में राहत का माहौल है। विभागीय सूत्रों का कहना है कि कोर्ट के आदेश के बाद अब जल्द ही पदोन्नति प्रक्रिया दोबारा शुरू की जाएगी।

Ashish Sinha

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