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पारंपरिक ज्ञान व चिकित्सा पद्धति पर रविशंकर विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय संगोष्ठी शुरू

रायपुर। भारत में आदिवासियों का विकास, परंपरागत ज्ञान एवं देशज व्यवस्था के विभिन्न आयामों पर मंगलवार से पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय में तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी की शुरुआत हुई। आईसीएसएसआर नई दिल्ली, युनिसेफ और छत्तीसगढ़ शासन के सहयोग के विश्वविद्यालय के मानव विज्ञान अध्ययन शाला द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन करते हुए भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) नई दिल्ली के अध्यक्ष व ख्यात समाज विज्ञानी पद्मश्री डां. जे.के.बजाज ने कहा कि हमें आजादी के अमृत काल में दूसरे की नज़र के बजाए दासता से मुक्त होकर नई दृष्टि से अपने ज्ञान और परंपरा को देखना होगा।

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उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज सहित भारतीय परंपरागत समाज में पारंपरिक ज्ञान की समृद्ध और अनंत परंपरा है जिस पर अविश्वास करने के बजाए उन्हें शास्त्रीय पद्धति से संकलित, व्यवस्थित और संवर्धित करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि जनजातीय विचारधारा और भारत की मुख्यधारा में कोई अंतर नहीं है। यह समझने और समझाने की जरूरत है। हमारी विश्व दृष्टि वहीं से निकलती है। हमें परंपरागत ज्ञान और चिकित्सा पद्धति के दृष्टिकोण से जनजातीय समाज से बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। हम अपने लोगों को बाहर के लोगों की दृष्टि से न देखें बल्कि खुद उनके बीच जाकर अपनी दृष्टि से उन्हें देखें और उनके ज्ञान परंपरा को विज्ञान की कसौटियों पर कसकर उन्हें संकलित करें।

संगोष्ठी के शुभारंभ सत्र के विशिष्ट अतिथि के रूप में अपना व्याख्यान देते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डां.पी.सी.जोशी ने कहा कि परंपरागत ज्ञान ही आदिवासियों का अस्तित्व बचाए हुए है। उन्होंने कहा कि वनवासी के पास जो परंपरागत ज्ञान और चिकित्सा पद्धति है वो किताबों में नही है लेकिन जनजातीय समाज में वर्षों से एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी में स्थानांतरित होती रही है। उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज में पीढ़ियों से जो चिकित्सा पद्धति चली आ रही है वो अनुभव पर आधारित है और जनजातीय समाज में बेहद ही प्रभावी है। उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज में प्रचलित परंपरागत ज्ञान में चिकित्सा, सामाजिक- शिक्षा, मौसम और तकनीक सहित सभी जरूरी ज्ञान परंपरागत रूप से मौजूद है।

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शुभारंभ सत्र की अध्यक्षता करते हुए पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के कुलपति ने कहा कि भारत परंपरागत ज्ञान की दृष्टि से बहुत ही समृद्ध देश है लेकिन तकनीकी युग में हम अपने परंपरागत ज्ञान से विमुख हो रहें है जो उचित नही है। उन्होंने कहा कि कोविड-19 के दौर में जब पूरे विश्व में हाहाकार मचा हुआ था और लाखो लोगों की जाने गई तो जनजातीय समाज उसके प्रभाव से बहुत कुछ बचा रहा, इसके मूल में जनजातीय समाज की पारंपरिक ज्ञान और चिकित्सा पद्धति है। उन्होंने कहा कि जनजातीय समाज की बोली और भाषा मर रही है और उसके साथ ही परंपरागत ज्ञान भी समाप्त हो रहा है क्योंकि भारत का पारंपरिक ज्ञान और चिकित्सा पद्धति स्थानीय बोली और भाषा में ही है।

उद्घाटन सत्र के शुभारंभ में देशभर से आए हुए अतिथियों का स्वागत करते हुए कार्यक्रम के संयोजक निदेशक व मानव विज्ञान अध्ययनशाला के अध्यक्ष प्रो. डां. अशोक प्रधान ने कहा कि तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में देश के परंपरागत ज्ञान और देशज व्यवस्था के साथ पारंपरिक चिकित्सा पद्धति के विभिन्न आयामों पर देशभर के मानव विज्ञानी, समाजशास्त्री, प्राध्यापक और शोधार्थी विशद् चर्चा करेंगे और संगोष्ठी से जो निष्कर्ष निकलेगा वो समाज और देश के लिए मार्गदर्शन का काम करेगा। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार डां. शैलेन्द्र पटेल व वरिष्ठ प्राध्यापक गण समेत देशभर से आए हुए मानव-शास्त्री, समाज-विज्ञानी, प्राध्यापक और बड़ी संख्या में शोधार्थी मौजूद थे। धन्यवाद ज्ञापन मानव विज्ञान अध्ययनशाला के प्राध्यापक डां. जितेन्द्र कुमार प्रेमी ने किया।

स्वास्थ्य शिविर व जनजातीय नायकों की चित्र प्रदर्शनी

तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के दौरान विश्वविद्यालय परिसर में देश के पारंपरिक चिकित्सा पद्धति पर आधारित चिकित्सा शिविर भी लगाया गया है जिसमें छत्तीसगढ़ और छत्तीसगढ़ के बाहर के दस पारंपरिक चिकित्सक (आदिवासी बैगा) पारंपरिक औषधियों से माध्यम से लोगों का इलाज कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त विश्वविद्यालय परिसर में स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के जनजातीय नायकों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर आधारित एक चित्र प्रदर्शनी भी लगाई गई है।

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