ममा गाँव के सुरता..

जब गर्मी के दिन म स्कूल के दू महीना बर छुट्टी हो जावय, त जादा करके लइका मन अपन ममा गाँव के रद्दा धर लेवंय. फेर मोर संग अइसन कभू नइ होइस. काबर ते मोर पढ़ई ह जादा करके शहर म होए हे, तेकर सेती जब कभू स्कूल के छुट्टी सुनावय, त हमन अपन खुद के गाँव नगरगांव जाए बर लकलकाए राहन. मंझनिया भर डंडा पचरंगा अउ संझा सुर के खेलई ह गजब भावय. तब घरेच तीर के पीपर पेंड़ के पिकरी ह घलो अबड़ सुहावय. कतकों मंझनिया तो उहिच म ए डारा ले ओ डारा अउ वो डारा ले ए डारा म ओरमे राहन.
हमर ममा गाँव देवरी (धरसींवा) घलो जावन, फेर बहुत कम. कोनो सुख-दुख के काम म या फेर वो डहार ले नाहकत खानी अमा जावन.
वइसे हमर ममा रामलाल वर्मा जी गजब मयारुक राहय. जावन तहाँ ले दुनिया भर के मान-गौन चालू हो जावय. हमर सग ममा तो एके झन रिहिन हें. फेर कका-बड़ा वाले ममा अबड़ झन. एकरे सेती जब कभू उहाँ जाना होवय, त एक जुवर के भात एक घर, दूसर जुवर के भात दूसर घर. चाय ककरो अउ घर त नाश्ता कोनो अउ घर. बस घूम-घूम के खवईच तो राहय. अउ हमर मामी जब खाना खावन त एक कौंरा मोरो बर छोड़ देबे भांचा कहिके हकन के परोस देवय. तहाँ ले मामी ह हमर छोड़े थारी म ही परोसा ले-ले के खावय. भगवान जानय, अइसन करे म कतका पुण्य मिलथे ते? फेर उंकर श्रद्धा अउ विश्वास खातिर आजो माथा नव जाथे. हमर ए मामी ह जब सरग सिधारिस त मोला एक हफ्ता के टूर बना के सड़क के रस्ता इलाहाबाद लेग के पूरा तीरथ-बरत कराए रिहिन हें.
हमन शहर म रहिके पढ़े लिखे हावन तेकर सेती सियान-सियान ममा-मामी मन के पांव परई ह अलकर लागय. अभी घलो लागथे. फेर हमर ममा-मामी जीयत भर अइसन करिन. जब उन आखिरी बेरा म खटिया म राहंय तभो भांचा तोर पांव ल इही जगा मुरसरिया म राखना कहिके पांव परबेच करंय.
हमर नाना जी के तो मुंह ल हम देखे नइ पाए हन, काबर ते हमर जनम के पहिली ही उंकर सरग रेंगान होगे रिहिसे. फेर हमर महतारी मन बतावंय, के उन अपन बेरा के नामी जादूगर रिहिन हें. अपन छोटे भाई संग दुरिहा- दुरिहा तक अपन कला के प्रदर्शन करे खातिर जावंय. हमर ममा घलो नाचा के नामी कलाकार रिहिन हें बताथें.
हमर महतारी बतावय, के ममा जी नाचा म परी बनंय तब अपन छाती ऊपर गाड़ी के चक्का ल बोह के तलवार के धार ऊपर नाचंय.
आज जब वो सब बात के सुरता आथे, त बड़ा दुख होथे के हमन ल वो सब अद्भुत अउ रोमांचकारी दृश्य मनला देखे के अवसर काबर नइ मिलिस? कहूँ देखे रहितेन त उंकर मन के स्मृति ल अक्षुण्ण बनाए राखे खातिर लंबा-चौड़ा लेख लिख के किताब छपवाए रहितेन.-सुशील भोले

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