कांकेर न्यूज़: इच्छापुर की महिलाओं ने वनौषधि प्रसंस्करण से बदला जीवन, ₹75 लाख का वनधन उत्पाद तैयार | Pradesh Khabar






कांकेर: आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिख रही हैं इच्छापुर की ग्रामीण महिलाएं, हर्रा प्रसंस्करण से बढ़ी आय | Pradesh Khabar

file_000000000ae07206b6dd6cb6073112cd
WhatsApp Image 2026-03-12 at 6.47.26 PM (1)
c3bafc7d-8a11-4a77-be3b-4c82fa127c77 (1)


कांकेर की महिलाओं ने वनौषधि प्रसंस्करण से रचा इतिहास: 4 साल में 75 लाख से अधिक का कारोबार, हर साल कमा रहीं ₹40 हजार तक अतिरिक्त आय
उत्तर बस्तर कांकेर | 15 अप्रैल 2026 | रिपोर्ट: आशीष सिन्हा

कांकेर: छत्तीसगढ़ के उत्तर बस्तर कांकेर जिले में वनधन योजना ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ साबित हो रही है। जिला वनोपज सहकारी यूनियन मर्यादित के अंतर्गत संचालित “हर्रा वनौषधि प्रसंस्करण केन्द्र इच्छापुर” आज महिला सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता की एक चमकती मिसाल बन चुका है। यहाँ की ग्रामीण महिलाओं ने साबित कर दिया है कि यदि सही संसाधन और अवसर मिलें, तो वे अपनी किस्मत खुद लिख सकती हैं।

mantr
66071dc5-2d9e-4236-bea3-b3073018714b
₹75.76 लाख
कुल उत्पाद निर्माण (4 वर्ष)
2137
कुल लाभान्वित परिवार
₹40,000
वार्षिक व्यक्तिगत आय

मर्दापोटी क्लस्टर के 17 गाँवों को समेटे हुए इस केंद्र से वर्तमान में 1512 परिवार सीधे तौर पर लघु वनोपज संग्रहण से जुड़े हैं। इन्दिरा वन मितान स्वसहायता समूह की महिलाओं द्वारा संचालित इस केंद्र को जिला प्रशासन ने खनिज विकास निधि के माध्यम से पलवेराइज़र मशीन, पैकेजिंग सामग्री और अन्य आधुनिक उपकरण उपलब्ध कराए हैं।

बाजार में धूम मचा रहे हैं ये 8 आयुर्वेदिक उत्पाद:

इच्छापुर केंद्र में वर्तमान में पूर्णतः शुद्ध और मानकों के अनुरूप 8 प्रकार के चूर्ण तैयार किए जा रहे हैं:
हर्रा, बहेड़ा, त्रिफला, अश्वगंधा, सफेद मूसली, नीम, सतावरी और आंवला।

समूह की सदस्यों ने अपनी संघर्ष गाथा साझा करते हुए बताया कि पहले वे गाँव में अनिश्चित मजदूरी पर निर्भर थीं, जिससे परिवार का भरण-पोषण कठिन था। लेकिन वनौषधि प्रसंस्करण से जुड़ने के बाद उनकी स्थिति बदल गई है। अब वे न केवल आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं, बल्कि समाज में उनकी एक नई पहचान बनी है। विशेषज्ञों और आयुर्वेद विभाग के तकनीकी सहयोग से तैयार इन उत्पादों की आपूर्ति सीधे ‘मार्ट कांकेर’ को की जा रही है।

यह केंद्र आज न केवल रोजगार का जरिया है, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के बढ़ते आत्मविश्वास और सामूहिक प्रयास की जीत का प्रतीक है।