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GST के ‘दीवाली गिफ़्ट’ की सच्चाई: प्रभात पटनायक का विश्लेषण

GST के ‘दीवाली गिफ़्ट’ की सच्चाई: प्रभात पटनायक का विश्लेषण

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक ने मोदी सरकार के जीएसटी रियायतों को ‘दीवाली गिफ़्ट’ बताने को भ्रामक कहा। लेख में आर्थिक प्रभाव, संपदा असमानता और सरकारी नीतियों पर गहन चर्चा।

(आलेख: प्रभात पटनायक, अनुवाद: राजेंद्र शर्मा)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस भाषण को लेकर अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने जीएसटी स्लैब में दी गई रियायतों को “दीवाली गिफ़्ट” कहे जाने को भ्रामक बताया और इसे जनता के साथ आर्थिक गणित छुपाने का प्रयास कहा।

पटनायक के अनुसार, 28% से 18% और 12% से 5% कर स्लैब पर दी गई रियायतें, कुल जीएसटी राजस्व में लगभग 1.45% की कमी करेंगी, जो कि 2024-25 की जीडीपी का केवल 0.6% है। उनका कहना है कि इतनी छोटी कर रियायत को “बड़ा उपहार” बताना अतिशयोक्ति है।

वे तर्क देते हैं कि यदि सरकार इस राजस्व हानि की भरपाई सरकारी खर्चों में कटौती करके करती है, तो इसका कोई वास्तविक विस्तारकारी प्रभाव नहीं होगा। इसके बजाय, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ाकर ही अर्थव्यवस्था को गति दी जा सकती है।

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पटनायक ने देश में बढ़ती संपदा असमानता का भी उल्लेख किया। बर्नस्टीन की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि भारत की कुल संपदा का लगभग 60% हिस्सा केवल शीर्ष 1% लोगों के पास है। उनके अनुसार, संपत्ति और विरासत कर लागू करके सरकारी वित्तीय स्थिति मजबूत की जा सकती है।

लेख में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के हालिया बयान का भी जिक्र है, जिसमें उन्होंने शिक्षा और स्वास्थ्य के महंगे होते जाने पर चिंता जताई थी। पटनायक का कहना है कि नीतिगत विफलताएँ और संस्थाओं की गुणवत्ता में गिरावट ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है।

पटनायक ने अंत में लिखा कि मोदी सरकार के कदमों में वास्तविक आर्थिक सुधार के बजाय सार्वजनिक दिखावे पर जोर है, जबकि देश को संरचनात्मक बदलाव और समावेशी नीतियों की आवश्यकता है।

(यह लेख प्रभात पटनायक की राय पर आधारित है। प्लेटफ़ॉर्म इन विचारों से सहमत होना आवश्यक नहीं है।)

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