छत्तीसगढ़राज्यसूरजपुर

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भगवान बिरसा मुंडा शहादत दिवस दी गई श्रद्धांजलि

धरती आबा बिरसा मुंडा शहादत दिवस मनाया गया

गोपाल सिंह विद्रोही प्रदेश खबर प्रमुख छत्तीसगढ़/ग्राम पंचायत पोड़ी में 9 जून को धरती आबा जननायक बिरसा मुंडा शहादत दिवस मनाया गया । शहादत दिवस में बिरसा मुंडा चौक नामांतरण किया गया । शहादत दिवस पर मुख्य रूप से बीपीएस पोया, दरोगा सिंह, मोतीलाल सिंह , तुलसी सिंह अलवा ,रामधन पावले बैगा ,सिधारी सिंह देवायर उमाशंकर देवांगन सुनील ,नीरू सिंह, कलावती बच्चे ,ग्रामीण जन उपस्थित थे । शहादत कार्यक्रम बिरसा मुंडा चौक नामांतरण से प्रारंभ किया गया उसके बाद बिरसा मुंडा छाया चित्र पर दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम को बढ़ाया गया । शहादत दिवस पर बीपीएस पोया ने संबोधित करते हुए जननायक दिशा मुंडा के जीवनी पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बिरसा मुंडा आदिवासी मूलनिवासी समुदाय ही नहीं पूरे भारतवर्ष के लिए उनका संघर्ष हमारे लिए क्रांति की प्रेरणा देती है बिरसा मुंडा ने 18 वीं शताब्दी में झारखंड से पैदा हुआ वीर बिरसा पूरे देश में जल जंगल जमीन व संस्कृति की लड़ाई के लिए आंदोलन किए बिरसा मुंडा कम उम्र की आयु में ही अपना योगदान भावी पीढ़ी के लिए एक चेतना संघर्ष उलगुलान का रास्ता दिखाया । पोया ने बताया कि यह देश यहां के मूल वंशजों का है जिसने इस प्रकृति धरती का रक्षा के लिए अपनी जान तक कुर्बान कर दिए आज भी हमारे महापुरुषों की आंदोलन से सीख लेना चाहिए की आदिवासी समुदाय को जल जंगल जमीन व संस्कृति हक अधिकार के लिए हमेशा उलगुलान संघर्ष करते रहना चाहिए। आज ही हमारी स्थिति दयनीय है हमारे साथ शोषण अत्याचार हो रहे हैं जबकि भारत के संविधान में हमारे लिए अलग से प्रावधान हैं जो हमें सुरक्षा प्रदान करती हैं इसका भी उल्लंघन किया जा रहा है जिसका हमारा समुदाय लगातार हक के लिए संघर्ष कर रहा है , बीपीएस पोया ने आदिवासियों की समस्याओं का चार समाधान सांस्कृतिक समाधान, संविधानिक समाधान ,मानव अधिकारों का समाधान, राजनीतिक समाधान, आदिवासी मूल निवासी सरकार एवं राज्य बनाने का समाधान आदिवासी मूल निवासी इंसानों पर सकारात्मक रूप से कार्य करें तो उनके जल जंगल जमीन व संस्कृति सुरक्षित रहेगी । वर्तमान में भारत के आदिवासी मूल निवासियों का भारत के संविधान मे दो चीजों का भूल होने से पहला भारत के संविधान में आदिवासी शब्द का ना होना , दूसरा भारत के संविधान में मानव अधिकारों का ना होना यह दो बड़ी भूल हुई है जिससे नागरिकों को शोषण जुल्म अत्याचार अधिकारों से वंचित , मानवता का हनन होना अन्य समस्याओं से जूझना पड़ रहा है आदिवासी मूल निवासी पिछली जनजातियां एक साथ एकता के सूत्र में बंधकर संगठन बनाकर एक आवाज एक साथ कदम पर कदम मिलाकर चलें तो उनकी समस्याओं का समाधान जल्द हो जाएगा और उलगुलान जारी रहेगा

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