गोंडी भाषा को 8वीं अनुसूची में शामिल करने की मांग: राज्यसभा में दिग्विजय सिंह ने उठाई 1.30 करोड़ आदिवासियों की आवाज






गोंडी भाषा को संवैधानिक मान्यता की मांग: विशेष रिपोर्ट

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संसद विशेष कवरेज | आदिवासी अस्मिता

1.30 करोड़ लोगों की पहचान का सवाल: राज्यसभा में गूंजी गोंडी भाषा को संवैधानिक दर्जा देने की मांग

भारत की सबसे प्राचीन और समृद्ध आदिवासी भाषाओं में से एक ‘गोंडी’ को संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल करने के लिए राज्यसभा में ऐतिहासिक आवाज उठाई गई है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने सरकार से इस भाषा के संरक्षण और आदिवासियों के आत्मसम्मान के लिए तुरंत कदम उठाने का आग्रह किया है।

नई दिल्ली/रायपुर: भारत के हृदय स्थल में सदियों से बोली जाने वाली और गोंड जनजाति की सांस्कृतिक आत्मा कही जाने वाली गोंडी भाषा आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। राज्यसभा के बजट सत्र के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री और सांसद दिग्विजय सिंह ने इस ज्वलंत मुद्दे को शून्यकाल में उठाया। उन्होंने तर्क दिया कि जिस भाषा को बोलने वालों की संख्या एक करोड़ से अधिक हो, उसे संवैधानिक संरक्षण न मिलना लोकतांत्रिक ढांचे में एक बड़ी कमी है।

“गोंडी भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि यह गोंड जनजाति की सांस्कृतिक परंपराओं, लोक कथाओं और प्राचीन ज्ञान की वाहक रही है। करीब 1.30 करोड़ बोलने वालों के बावजूद इसे 8वीं अनुसूची में शामिल न करना इसकी उपेक्षा है। इसे संवैधानिक मान्यता देना अब अनिवार्य हो गया है।”

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— दिग्विजय सिंह, सांसद (राज्यसभा)

5 राज्यों की जीवनधारा है गोंडी भाषा

गोंडी भाषा का प्रभाव क्षेत्र केवल एक राज्य तक सीमित नहीं है। यह मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के विशाल भू-भाग में फैली हुई है। इन राज्यों के करोड़ों आदिवासी अपने दैनिक जीवन और धार्मिक अनुष्ठानों में इसी भाषा का उपयोग करते हैं। दिग्विजय सिंह ने सदन को अवगत कराया कि संवैधानिक मान्यता के अभाव में इस भाषा का अकादमिक और प्रशासनिक उपयोग शून्य है, जिससे नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा से दूर हो रही है।

प्रमुख बिंदु विस्तृत विवरण
प्रभावित राज्य मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश
बोलने वालों की संख्या लगभग 1.30 करोड़ (अध्ययन के अनुसार)
वर्तमान मांग संविधान की 8वीं अनुसूची में समावेश
सांस्कृतिक विरासत लोक कथाएं, जड़ी-बूटी ज्ञान, प्राचीन परंपराएं

8वीं अनुसूची में शामिल होने के दूरगामी लाभ

सांसद दिग्विजय सिंह के अनुसार, गोंडी भाषा को संवैधानिक दर्जा मिलने से न केवल भाषाई गौरव बढ़ेगा, बल्कि इसके कई व्यावहारिक लाभ भी होंगे:

  • शिक्षा प्रणाली में स्थान: नई शिक्षा नीति के तहत आदिवासी अंचल के स्कूलों में गोंडी को शिक्षा के माध्यम के रूप में अपनाया जा सकेगा, जिससे बच्चों की समझ बेहतर होगी।
  • सरकारी संरक्षण: भाषा के साहित्य, शब्दकोश और व्याकरण के विकास के लिए केंद्र सरकार से विशेष बजट और अनुदान मिल सकेगा।
  • रोजगार के अवसर: सरकारी परीक्षाओं और प्रशासनिक कार्यों में गोंडी भाषा के उपयोग से आदिवासी युवाओं के लिए अनुवादक, शिक्षक और शोधकर्ता जैसे नए पदों के द्वार खुलेंगे।
  • साहित्य अकादमी: गोंडी साहित्यकारों को राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता और पुरस्कार मिल सकेंगे, जिससे इस प्राचीन ज्ञान का दस्तावेजीकरण संभव होगा।

आदिवासी आत्मसम्मान और सांस्कृतिक पहचान

रिपोर्ट के अनुसार, भाषा का संरक्षण केवल शब्दों का संरक्षण नहीं है, बल्कि उस समाज के आत्मसम्मान और पहचान की रक्षा है। गोंडी भाषा में आदिवासी समाज का सदियों पुराना लोक-ज्ञान और प्रकृति संरक्षण के अनूठे तरीके छिपे हैं। दिग्विजय सिंह ने जोर देकर कहा कि यदि अब कदम नहीं उठाए गए, तो भारत अपनी एक अनमोल सांस्कृतिक कड़ी खो देगा।

राज्यसभा में उठी यह आवाज अब पूरे देश के आदिवासी अंचलों में गूंज रही है। बस्तर से लेकर गढ़चिरौली तक, गोंडी समुदाय अब केंद्र सरकार की ओर देख रहा है। दिग्विजय सिंह के इस आग्रह ने आदिवासी राजनीति और भाषाई संरक्षण के मुद्दे को राष्ट्रीय मुख्यधारा में ला खड़ा किया है। अब देखना यह है कि क्या केंद्र सरकार करोड़ों आदिवासियों की इस जायज और ऐतिहासिक मांग पर सकारात्मक निर्णय लेती है।