बेहिसाब उत्खनन से कराह रही धरती! लोकसभा में प्रशांत पड़ोले ने सरकार से पूछा- विनाश रोकने के लिए क्या है मास्टर प्लान? | प्रदेश खबर






बेहिसाब उत्खनन और पर्यावरण संकट: विशेष रिपोर्ट – प्रदेश खबर

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संसद अपडेट | पर्यावरण और खनन

धरती के सीने पर गहरे जख्म: प्रशांत पड़ोले ने लोकसभा में उठाया बेहिसाब खनन का मुद्दा, सरकार से पूछे तीखे सवाल

लोकसभा में आज बेहिसाब और अवैध उत्खनन से पर्यावरण को हो रहे गंभीर नुकसान का मुद्दा गूंजा। कांग्रेस सांसद प्रशांत पड़ोले ने सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए पूछा कि प्रकृति के इस दोहन को रोकने के लिए क्या योजना है?

नई दिल्ली: भारत के प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन अब पर्यावरण के लिए एक अस्तित्वगत खतरा बनता जा रहा है। लोकसभा के मौजूदा सत्र के दौरान कांग्रेस सांसद प्रशांत पड़ोले ने देश के विभिन्न हिस्सों में चल रहे बेहिसाब उत्खनन (Mining) पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने सदन का ध्यान इस ओर खींचा कि कैसे खनन माफिया और नियमों की अनदेखी के कारण धरती की उर्वरता, जल स्तर और जैव विविधता को अपूरणीय क्षति पहुँच रही है।

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“देश में बेहिसाब उत्खनन के कारण धरती को भारी नुकसान हो रहा है। पहाड़ गायब हो रहे हैं, नदियाँ सूख रही हैं और पारिस्थितिकी संतुलन बिगड़ रहा है। मैं सरकार से पूछना चाहता हूँ कि इसके समाधान के लिए और आने वाली पीढ़ी को सुरक्षित भविष्य देने के लिए आप क्या कर रहे हैं?”

— प्रशांत पड़ोले, सांसद (लोकसभा)

खनन और जलवायु परिवर्तन का गहरा नाता

प्रशांत पड़ोले ने तर्क दिया कि अवैध और अनियंत्रित खनन न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि यह सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन की गति को तेज कर रहा है। जंगलों की कटाई और जमीन की खुदाई के कारण भूस्खलन और बाढ़ जैसी आपदाओं का खतरा बढ़ गया है। उन्होंने सरकार से स्पष्टीकरण माँगा कि क्या उत्खनन क्षेत्रों में ‘पुनर्वनीकरण’ (Reforestation) और ‘पर्यावरण बहाली’ के मानकों का पालन किया जा रहा है या नहीं।

सदन में उठाए गए 3 प्रमुख बिंदु:

  • प्राकृतिक संतुलन: बेहिसाब खुदाई से स्थानीय इको-सिस्टम पर पड़ रहा विनाशकारी प्रभाव।
  • जवाबदेही: खनन कंपनियों द्वारा पर्यावरण नियमों के उल्लंघन पर सरकार की चुप्पी।
  • भविष्य की योजना: सतत विकास (Sustainable Mining) सुनिश्चित करने के लिए सरकार की रणनीति।

निष्कर्ष: क्या जागेगा मंत्रालय?

सांसद पड़ोले के इन सवालों ने खनन मंत्रालय की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। विशेषज्ञ भी मानते हैं कि यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो कई क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधन पूरी तरह समाप्त हो जाएंगे। अब देखना यह होगा कि सरकार इस दिशा में कोई नई नीति लेकर आती है या केवल ‘कागजी कार्रवाई’ तक ही सीमित रहती है।