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एनजीओ संपत्तियों पर सरकारी कब्जे का विरोध: लोकसभा में एडवोकेट गोवाल पादवी ने FCRA संशोधन बिल को बताया ‘लोकतंत्र के लिए खतरा’ | प्रदेश खबर






FCRA संशोधन बिल 2026: लोकसभा विरोध रिपोर्ट


PRADESH KHABAR NEWS NETWORK

लोकसभा समाचार | विधिक विशेष

‘NGO संपत्तियों पर कब्जा है यह बिल’: FCRA संशोधन पर भड़के सांसद गोवाल पादवी, सरकार पर लगाए गंभीर आरोप

लोकसभा में आज विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 के पेश होने के दौरान भारी विरोध देखा गया। कांग्रेस सांसद एडवोकेट गोवाल कागदा पादवी ने इस बिल को नागरिक समाज की आवाज दबाने और संस्थागत संपत्तियों के सरकारीकरण का प्रयास करार दिया।

नई दिल्ली: संसद के निचले सदन में आज विदेशी फंडिंग से जुड़े नए कानून (FCRA Amendment Bill 2026) को लेकर तीखी बहस हुई। कांग्रेस सांसद एडवोकेट गोवाल कागदा पादवी ने बिल की प्रस्तावना पर ही संवैधानिक आपत्ति दर्ज कराई। उन्होंने तर्क दिया कि यह संशोधन केवल नियमों का सरलीकरण नहीं है, बल्कि गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) के स्वतंत्र अस्तित्व पर एक बड़ा हमला है।

“राज्य द्वारा एनजीओ की संपत्तियों का अधिग्रहण करना एक तरह से ‘छद्म-जब्ती’ (Quasi-expropriation) के समान है। यह बिल केंद्र सरकार के हाथों में अत्यधिक शक्तियाँ केंद्रित करता है, जिससे वह नागरिक समाज के कामकाज को पूरी तरह नियंत्रित कर सकेगी।”

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— एडवोकेट गोवाल कागदा पादवी, सांसद (लोकसभा)

लोकतंत्र और नागरिक समाज पर मंडराता खतरा

सांसद पादवी ने सदन में कहा कि नीतिगत विशेषज्ञों के अनुसार, यह संशोधन सिविल सोसाइटी संगठनों के लिए उपलब्ध लोकतांत्रिक स्थान को और कम कर देगा। विशेष रूप से मानवाधिकार, आदिवासी कल्याण, सार्वजनिक स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले एनजीओ अब भारी नियामक अनिश्चितता और दंडात्मक कार्रवाई के डर के साये में रहेंगे।

सांसद पादवी की 3 प्रमुख आपत्तियां:

  • असंतुलित नीतियां: जहां कॉर्पोरेट क्षेत्र के लिए FDI (विदेशी निवेश) के नियम उदार रखे गए हैं, वहीं सेवाभावी संस्थाओं के लिए कड़े प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं।
  • अल्पसंख्यक संस्थानों पर असर: धार्मिक और अल्पसंख्यक संस्थानों, विशेष रूप से चर्च निकायों ने इन संशोधनों से उनके धर्मार्थ कार्यों पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव को लेकर चिंता जताई है।
  • आदिवासी कल्याण में बाधा: ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में काम करने वाली संस्थाओं की फंडिंग पर कड़े पहरे से वहां चल रहे विकास कार्य प्रभावित होंगे।

विदेशी निवेश बनाम विदेशी अंशदान

सदन में अपनी बात रखते हुए पादवी ने सरकार के दोहरे मानकों पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि एक तरफ सरकार विदेशी कॉरपोरेट निवेश का स्वागत करती है, वहीं दूसरी तरफ मानवीय कार्यों के लिए आने वाले अंशदान को ‘अपराध’ की तरह देखा जा रहा है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि यह बिल इसी रूप में पारित होता है, तो भारत में कल्याणकारी कार्यों और मानवाधिकारों की रक्षा का ढांचा चरमरा सकता है।

निष्कर्ष: क्या पुनर्विचार करेगी सरकार?

विपक्ष के कड़े रुख और अल्पसंख्यक व धार्मिक संस्थाओं की ओर से उठती आवाजों के बीच, अब सबकी नजर सरकार के अगले कदम पर है। एडवोकेट गोवाल पादवी की इन आपत्तियों ने कानूनी गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है कि क्या राज्य को निजी ट्रस्टों और एनजीओ की संपत्तियों पर इतना व्यापक नियंत्रण मिलना चाहिए?


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