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अक्ती तिहार 2026: कृषि मंत्री रामविचार नेताम ने चलाया ट्रैक्टर, छत्तीसगढ़ में जैविक खेती का बड़ा संदेश






अक्ती तिहार 2026: रायपुर में कृषि मंत्री रामविचार नेताम ने किया माटी पूजन, जैविक खेती का दिया संदेश


अक्ती तिहार पर कृषि मंत्री रामविचार नेताम ने चलाया ट्रैक्टर; प्रदेश में जैविक खेती और नवाचार को बढ़ावा देने का संकल्प

छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा और कृषि उत्सव ‘अक्ती तिहार’ (अक्षय तृतीया) के पावन अवसर पर राजधानी रायपुर में राज्य स्तरीय समारोह का भव्य आयोजन किया गया। कृषि विकास एवं किसान कल्याण मंत्री रामविचार नेताम ने आज इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के परिसर में आयोजित इस विशेष उत्सव में शिरकत की। पारंपरिक विधि-विधान से पूजा-अर्चना के बाद, उन्होंने आधुनिक तकनीक का प्रदर्शन करते हुए स्वयं ट्रैक्टर चलाकर ‘सीड ड्रिल’ के माध्यम से धान के बीजों का रोपण किया।

मुख्य आकर्षण: कृषि मंत्री ने न केवल बीजों का रोपण किया, बल्कि बाड़ी में सब्जियों के बीजों की बुआई भी की। उन्होंने गौ माता की सेवा कर उन्हें चारा खिलाया और धरती माता से प्रार्थना की कि प्रदेश के अन्नदाताओं के घर धन-धान्य से भरे रहें और इस वर्ष फसल की पैदावार उत्तम हो।

माटी पूजन और कृषि यंत्रों का वितरण

रामविचार नेताम ने इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के अनुसंधान प्रक्षेत्र में पहुंचकर माटी पूजन और बीज पूजन की रस्म निभाई। इसके साथ ही उन्होंने ठाकुर देवता की विशेष पूजा-अर्चना कर प्रदेश में खेती-किसानी के नए कार्यों का औपचारिक शुभारंभ किया। इस अवसर पर किसानों का उत्साह बढ़ाने के लिए मंत्री ने उन्नत बीज, जैविक खाद और खेती में उपयोग होने वाले आधुनिक कृषि यंत्रों का वितरण भी किया।

अक्ती तिहार का यह उत्सव केवल राजधानी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के अंतर्गत आने वाले छत्तीसगढ़ के समस्त महाविद्यालयों, अनुसंधान केंद्रों और कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK) में भी एक साथ मनाया गया, जिससे पूरे प्रदेश में उत्सव का माहौल रहा।

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रासायनिक खेती को छोड़ जैविक की ओर बढ़ने का आह्वान

समारोह को संबोधित करते हुए रामविचार नेताम ने मिट्टी की उर्वरता और पर्यावरण संतुलन पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा, “हमें कृषि में रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध उपयोग को कम करना होगा और अपनी जड़ों की ओर लौटते हुए जैविक खेती को अपनाना होगा।”

“अक्ती तिहार धरती के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का पर्व है। हमें यह सोचना चाहिए कि हम प्रकृति से जितना ले रहे हैं, उसके बदले हम धरती को क्या लौटा रहे हैं।” – रामविचार नेताम

उन्होंने आगे स्पष्ट किया कि छत्तीसगढ़ शासन द्वारा रासायनिक खादों के विकल्प के रूप में जैव उर्वरकों और जैविक खाद के उपयोग को प्रोत्साहित करने के लिए एक ठोस रणनीति तैयार की गई है। इस मिशन में इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय तकनीकी सहयोगी के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, ताकि किसानों को वैज्ञानिक आधार पर जैविक खेती की ट्रेनिंग दी जा सके।

‘ड्रोन दीदी’ का सम्मान और आधुनिक तकनीक

इस वर्ष का अक्ती तिहार महिला सशक्तिकरण का भी गवाह बना। मंत्री ने समारोह में विशेष रूप से फुलेश्वरी निषाद को सम्मानित किया, जो ‘ड्रोन दीदी’ के रूप में अपनी पहचान बना चुकी हैं। उन्होंने कहा कि एक ग्रामीण महिला का ड्रोन संचालन जैसी उच्च तकनीक में प्रशिक्षित होकर किसानों की सेवा करना पूरे प्रदेश के लिए गौरव का विषय है।

कुलपति डॉ. गिरीश चंदेल का संबोधन

समारोह की अध्यक्षता कर रहे कुलपति डॉ. गिरीश चंदेल ने बताया कि पिछले चार-पांच वर्षों से विश्वविद्यालय इस त्यौहार को बड़े पैमाने पर मना रहा है। उन्होंने कहा कि आज के दिन धरती और बीजों की पूजा करना छत्तीसगढ़ की अस्मिता से जुड़ा है। किसानों को नई बुआई तकनीकों के साथ-साथ कृषि में ड्रोन के बढ़ते महत्व से अवगत कराया जा रहा है, जो भविष्य की खेती के लिए अनिवार्य है।

विशेषज्ञों द्वारा ‘रासायनिक उर्वरकों का विकल्प’ प्रशिक्षण

कार्यक्रम के दौरान कृषि विज्ञान केंद्र रायपुर द्वारा एक विशेष कृषक प्रशिक्षण शिविर आयोजित किया गया। इसमें विशेषज्ञों ने किसानों को रासायनिक खादों की कमी को पूरा करने के लिए निम्नलिखित विकल्पों की जानकारी दी:

  • नील हरित काई और अजोला का उपयोग
  • राइजोबियम और एजोटोबैक्टर जैसे जैव उर्वरक
  • फॉस्फोरस स्थिरीकरण बैक्टीरिया का महत्व
  • हरी खाद और जैविक कचरे से तैयार खाद

समारोह में उपस्थित गणमान्य

इस गरिमामयी अवसर पर शासन के वरिष्ठ अधिकारी और विशेषज्ञ उपस्थित रहे, जिनमें संचालक कृषि राहुल देव, मंडी बोर्ड के प्रबंध संचालक महेन्द्र सिंह सवन्नी, छत्तीसगढ़ राज्य बीज विकास निगम के एमडी अजय अग्रवाल, कुलसचिव डॉ. कपिल देव दीपक, और संचालक प्रक्षेत्र डॉ. एस.एस. टूटेजा प्रमुख थे। इनके अलावा अधिष्ठाता डॉ. अजय वर्मा, अपर संचालक जी.के. पीढ़िया सहित बड़ी संख्या में कृषि वैज्ञानिक, छात्र और प्रगतिशील किसान इस ऐतिहासिक पल के साक्षी बने।


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