वनांचल में संजीवनी की गूँज: लेमरू के दुर्गम इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं का नया उदय, 16 हजार आदिवासियों को मिली बड़ी राहत
छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में स्वास्थ्य सेवाओं के सरलीकरण और सुदृढ़ीकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की गई है। कलेक्टर कुणाल दुदावत के विशेष मार्गदर्शन में जिले के सबसे चुनौतीपूर्ण और दुर्गम वनांचल क्षेत्र लेमरू में ‘संजीवनी एक्सप्रेस 108’ एम्बुलेंस सेवा का विस्तार किया गया है। यह पहल उन हजारों आदिवासियों के लिए उम्मीद की नई किरण लेकर आई है, जो भौगोलिक बाधाओं के कारण समय पर इलाज से वंचित रह जाते थे।
कलेक्टर कुणाल दुदावत की संवेदनशीलता का परिणाम
प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार, लेमरू क्षेत्र लंबे समय तक बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए संघर्ष करता रहा। दुर्गम रास्तों और घने जंगलों के बीच एम्बुलेंस का पहुँचना असंभव माना जाता था। कलेक्टर कुणाल दुदावत ने पदभार संभालते ही इस चुनौती को प्राथमिकता पर रखा। उनके निर्देश पर लेमरू में स्थायी रूप से संजीवनी 108 की तैनाती की गई है, जो अब एक कॉल पर मरीज के द्वार तक पहुँच रही है।
20 गांवों का स्वास्थ्य कवच बना ‘संजीवनी’
सीएमएचओ कार्यालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार, आयुष्मान आरोग्य मंदिर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र लेमरू के अधीन आने वाले 20 गांवों की विशाल आबादी को इस सेवा का लाभ मिल रहा है। इन गांवों में विशेष पिछड़ी जनजातियों के करीब 1700 सदस्य शामिल हैं।
नकिया लेमरू रापा
बड़गांव छातीबहार लामपहाड़
चलती-फिरती जीवनरक्षक इकाई: आधुनिक चिकित्सा उपकरणों से लैस
लेमरू में तैनात यह एम्बुलेंस केवल एक वाहन नहीं, बल्कि एक छोटी ‘इमर्जेंसी यूनिट’ की तरह काम करती है। इसमें निम्नलिखित अत्याधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं:
- आपातकालीन किट: फोल्डेबल स्ट्रेचर, व्हीलचेयर और ऑक्सीजन सिलिंडर की निरंतर उपलब्धता।
- जांच उपकरण: पल्स ऑक्सीमीटर, बीपी मॉनिटर और शुगर जांच की मशीनें।
- विशेष किट: प्रसव (डिलीवरी) किट और बर्न किट, ताकि मौके पर ही प्राथमिक उपचार शुरू हो सके।
- एडवांस्ड लाइफ सपोर्ट (ALS): गंभीर मरीजों के लिए वेंटिलेटर और प्रशिक्षित ईएमटी (EMT) स्टाफ।
खत्म हुआ ‘चारपाई’ का दौर, सायरन सुनते ही रास्ता देते हैं ग्रामीण
ग्रामीणों के अनुभवों को साझा करते हुए स्थानीय स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने बताया कि पहले मरीजों को चारपाई या डोली में लादकर पैदल मिलों दूर ले जाना पड़ता था। सर्पदंश या प्रसव के दौरान यह देरी जानलेवा साबित होती थी। अब स्थिति बदल चुकी है। जैसे ही संजीवनी 108 का सायरन गूंजता है, ग्रामीण स्वेच्छा से रास्ता बना देते हैं। पिछले एक वर्ष में हृदयघात, सड़क दुर्घटना और मलेरिया-डेंगू के सैकड़ों मरीजों की जान इसी सेवा की बदौलत बची है।
कोरबा की आपातकालीन व्यवस्था हुई और भी मजबूत
कोरबा जिले को हाल ही में शासन से 12 नई संजीवनी 108 एम्बुलेंस प्राप्त हुई हैं। इनमें से एक को विशेष रूप से लेमरू के लिए सुरक्षित किया गया है। वर्तमान में जिले में कुल 23 संजीवनी 108 और 14 महतारी 102 एम्बुलेंस का जाल बिछ चुका है, जो शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच की दूरी को पाट रहा है।
आदिवासी परिवारों को आर्थिक सुरक्षा
निजी वाहनों का किराया दुर्गम क्षेत्रों के गरीब आदिवासियों के लिए असहनीय बोझ होता था। लेमरू जैसे इलाकों में निजी वाहन वाले मनमाना किराया वसूलते थे। सरकारी एम्बुलेंस सेवा पूरी तरह निःशुल्क होने से इन परिवारों को बड़ी आर्थिक राहत मिली है। अब उन्हें इलाज के लिए कर्ज लेने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
निष्कर्ष: भरोसे का नया नाम ‘संजीवनी’
लेमरू के ग्रामीणों के लिए यह सेवा केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि प्रशासन के प्रति उनके बढ़ते भरोसे का प्रतीक है। कलेक्टर कुणाल दुदावत की इस संवेदनशील पहल ने साबित कर दिया है कि यदि प्रशासनिक इच्छाशक्ति हो, तो विकास और सुविधाएं घने जंगलों को चीरकर सबसे अंतिम व्यक्ति तक पहुँच सकती हैं। आज लेमरू का हर नागरिक सुरक्षित महसूस कर रहा है, क्योंकि उसे पता है कि संकट की घड़ी में ‘संजीवनी’ उसके साथ खड़ी है।












