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मजरूह सुल्तानपुरी: भारतीय सिनेमा के वो जादुई गीतकार, जिन्होंने शब्दों से रचा प्रेम का संसार





मजरूह सुल्तानपुरी: भारतीय सिनेमा के अमर गीतकार | एक श्रद्धांजलि

मजरूह सुल्तानपुरी: भारतीय सिनेमा के अमर गीतकार को शत-शत नमन

स्मृति दिवस: 24 मई | एक युगपुरुष, जिन्होंने शब्दों से रचा प्रेम का नया संसार


परिचय: एक हकीम से सुप्रसिद्ध गीतकार तक का सफर

हिंदी सिनेमा के इतिहास में जब भी प्रेम, दर्शन और मानवीय संवेदनाओं के गीतों की चर्चा होगी, मजरूह सुल्तानपुरी का नाम सबसे ऊपर लिया जाएगा। 1 अक्टूबर 1919 को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में जन्मे ‘असरार उल हसन खान’, जिन्हें दुनिया मजरूह सुल्तानपुरी के नाम से जानती है, एक ऐसी शख्सियत थे जिन्होंने अपनी लेखनी से लाखों दिलों का इलाज किया। आश्चर्यजनक रूप से, अपने फिल्मी करियर से पहले वे पेशे से एक ‘हकीम’ थे। हकीम की दवाइयों से उन्होंने शरीर का इलाज किया, लेकिन गीतकार बनकर उन्होंने लोगों के मन और आत्मा को मरहम दिया।

काव्यात्मक यात्रा और शैली

मजरूह साहब की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे साहित्य और मनोरंजन के बीच एक सुंदर संतुलन बनाए रखते थे। 1945 से लेकर 2000 तक, यानी पाँच दशकों से अधिक के अपने लंबे करियर में, उन्होंने करीब 300 से अधिक फिल्मों के लिए 4000 से अधिक गीतों की रचना की। उनके गीतों में उर्दू की नज़ाकत और हिंदी की सरलता का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।

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प्रमुख विशेषताएं:

  • बहुमुखी प्रतिभा: उन्होंने नौशाद जैसे दिग्गज संगीतकारों से लेकर आर.डी. बर्मन जैसे आधुनिक संगीतकारों तक के साथ काम किया।
  • सामाजिक चेतना: वे केवल प्रेम के गीत ही नहीं, बल्कि सामाजिक सरोकार के भी कवि थे। पंडित नेहरू की नीतियों के खिलाफ कविता लिखने के कारण उन्हें डेढ़ साल जेल में भी रहना पड़ा था।

कालजयी गीत: जो आज भी गुनगुनाए जाते हैं

मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे गीतों ने हर पीढ़ी को प्रभावित किया है। उनके कुछ अमर गीत इस प्रकार हैं:

  • “चला जाता हूँ किसी की धुन में, धड़कते दिल के तराने लिए” (फिल्म: यादों की बारात)
  • “अजी रूठ कर अब कहाँ जाइएगा, जहाँ जाइएगा हमें पाइएगा” (फिल्म: आर-पार)
  • “चाहूँगा मैं तुझे साँझ सवेरे” (फिल्म: दोस्ती)
  • “राही मनवा दुख की चिंता क्यों सताती है” (फिल्म: दोस्ती)

सम्मान और उपलब्धियां

मजरूह सुल्तानपुरी को उनके अमूल्य योगदान के लिए भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान ‘दादा साहब फाल्के पुरस्कार’ (1994) से सम्मानित किया गया। यह सम्मान पाने वाले वे पहले फिल्मी गीतकार थे। इसके अलावा उन्हें ‘इकबाल सम्मान’ और ‘गालिब अवार्ड’ जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से भी नवाजा गया।

एक अमर विरासत

24 मई, 2000 को इस महान शायर ने इस दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन वे अपने पीछे शब्दों का एक ऐसा खजाना छोड़ गए जो कभी समाप्त नहीं होगा। आज उनके स्मृति दिवस पर हम उन्हें नमन करते हैं। वे केवल एक गीतकार नहीं थे, बल्कि वे भारतीय सिनेमा की वह आवाज़ थे जिसने प्यार, विरह और जीवन के दर्शन को शब्दों के जरिए अमर कर दिया।


श्रद्धांजलि संदेश

“रहा गर्दिशों में हरदम, मेरे इश्क का सितारा,
कभी तुम नहीं तो आए, कभी याद बिन पुकारा।”
मजरूह साहब, आपके शब्द हमेशा हमारे बीच जीवित रहेंगे।


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