दिल्ली उच्च न्यायालय का बड़ा फैसला: राघव चड्ढा को निशाना बनाने वाली आपत्तिजनक पोस्ट हटाने का आदेश






दिल्ली उच्च न्यायालय का बड़ा फैसला: राघव चड्ढा को निशाना बनाने वाली आपत्तिजनक पोस्ट हटाने का आदेश, जानें पूरा मामला

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दिल्ली उच्च न्यायालय का बड़ा फैसला: सांसद राघव चड्ढा को निशाना बनाने वाली आपत्तिजनक सोशल मीडिया सामग्री को हटाने का दिया आदेश

राष्ट्रीय ब्यूरो |
अपडेटेड: बुधवार, 1 जुलाई 2026 |
पढ़ने का समय: 10 मिनट

नई दिल्ली: दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश जारी करते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा को निशाना बनाने वाली कुछ अत्यधिक आपत्तिजनक और मानहानिकारक सामग्री को तुरंत हटाने (टेकडाउन) का निर्देश दिया है। अदालत ने माना कि सोशल मीडिया पर प्रसारित की जा रही कुछ सामग्रियां प्रथम दृष्टया मानहानिकारक हैं और उनसे नेता की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंच रहा है। हालांकि, अदालत ने इस मामले में राघव चड्ढा की ओर से मांगी गई व्यापक ‘पर्सनैलिटी राइट्स’ (व्यक्तित्व अधिकार) की सुरक्षा और पूरी सामग्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने से इनकार कर दिया है।

अदालत का मुख्य अवलोकन: “अदालत ने कहा कि लोकतंत्र में राजनीतिक फैसलों की आलोचना करना अभिव्यक्ति की आजादी का हिस्सा है, लेकिन आलोचना की आड़ में किसी पर दुर्भावनापूर्ण और मानहानिकारक आरोप लगाना स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने उन पांच विशिष्ट सामग्रियों को हटाने का निर्देश दिया है जो सीमा लांघती हैं।”

जस्टिस सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ ने सुनाया फैसला

मामले की सुनवाई करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय के एकल न्यायाधीश न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने खुले न्यायालय में यह आदेश सुनाया। राघव चड्ढा ने अदालत में एक दीवानी मुकदमा (सिविल सूट) दायर किया था, जिसमें उनके नाम, छवि, आवाज और पहचान के अनधिकृत उपयोग तथा सोशल मीडिया पर एआई-जेनरेटेड डीपफेक, मॉर्फ्ड वीडियो और भ्रामक भाषणों के जरिए उन्हें बदनाम करने का आरोप लगाया गया था।

न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने अपने आदेश में स्पष्ट किया, “इस मामले में कोई पर्सनैलिटी राइट्स (व्यक्तित्व अधिकार) का उल्लंघन शामिल नहीं है। राजनीतिक क्षेत्र में लिए गए निर्णयों की आलोचना की जा सकती है। हालांकि, मैंने रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों में से केवल पांच विशिष्ट सामग्रियों को हटाने का आदेश दिया है, जो स्पष्ट रूप से मानहानिकारक हैं। शेष सामग्री प्रथम दृष्टया मानहानि के दायरे में नहीं आती।”

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क्या है पूरा विवाद और राघव चड्ढा की आपत्ति?

यह पूरा कानूनी विवाद राघव चड्ढा के हालिया राजनीतिक घटनाक्रम से जुड़ा हुआ है। गौरतलब है कि आम आदमी पार्टी (आप) के टिकट पर राज्यसभा पहुंचे राघव चड्ढा ने अप्रैल 2026 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का दामन थाम लिया था। उनके इस राजनीतिक दल-बदल के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे एक्स (ट्विटर), यूट्यूब और फेसबुक पर उनके खिलाफ तीखी प्रतिक्रियाएं और ट्रोलिंग शुरू हो गई थी।

राघव चड्ढा की ओर से अदालत में पेश वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव नायर ने दलील दी कि सोशल मीडिया पर चल रही सामग्री सामान्य राजनीतिक आलोचना से काफी आगे निकल चुकी है। उन्होंने अदालत को बताया कि कुछ पोस्ट और वीडियो में आपत्तिजनक और अपमानजनक तरीके से यह दिखाया गया है कि सांसद ने “पैसों के लिए खुद को बेच दिया”। इसके अलावा, कुछ विजुअल्स में उन्हें साड़ी पहने हुए और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उन पर पैसे बरसाते हुए दिखाया गया है, जो बेहद आपत्तिजनक, अश्लील और उनके सम्मान को ठेस पहुंचाने वाला है।

अधिवक्ता ने तर्क दिया कि एआई और डीपफेक तकनीक का दुरुपयोग करके झूठी आवाजें (वॉइस क्लोनिंग) और मनगढ़ंत भाषण तैयार किए जा रहे हैं, जिससे जनता में यह संदेश जा रहा है कि चड्ढा ने वित्तीय लाभ के लिए अपनी राजनीतिक निष्ठा बदली। उन्होंने कहा कि यह पूरी तरह से चरित्र हनन का मामला है, जिसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अनुमति नहीं दी जा सकती।

राजनीतिक आलोचना और मानहानि के बीच बारीक रेखा

सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर लंबा विचार-विमर्श किया कि एक सार्वजनिक जीवन जीने वाले व्यक्ति के लिए वैध आलोचना और मानहानि के बीच क्या अंतर होना चाहिए। अदालत ने इस बात को रेखांकित किया कि भारत में स्वतंत्रता के बाद से ही राजनीतिक फैसलों पर कार्टूनों, व्यंग्य और तीखी टिप्पणियों के जरिए प्रहार करने की एक समृद्ध परंपरा रही है।

न्यायालय ने पूर्व की सुनवाइयों में मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा था, “हम सभी आर.के. लक्ष्मण के कार्टूनों को देखते हुए बड़े हुए हैं। राजनीतिक क्षेत्र में लिए गए फैसलों की आलोचना हमेशा से होती आई है। अंतर केवल इतना है कि उस समय सोशल मीडिया का दायरा इतना व्यापक नहीं था, जबकि आज यह बहुत बड़े स्तर पर फैल चुका है।”

अदालत ने अपने अंतिम निष्कर्ष में संतुलन बनाने की कोशिश की है। एक तरफ जहां कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत नागरिकों को मिलने वाले अभिव्यक्ति के अधिकार और राजनीतिक आलोचना की स्वतंत्रता को बरकरार रखा, वहीं दूसरी तरफ अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्ति के सम्मान और प्रतिष्ठा के अधिकार की भी रक्षा की। कोर्ट ने माना कि यह आरोप लगाना कि एक निर्वाचित प्रतिनिधि ने “खुद को पैसों के लिए बेच दिया”, बिना किसी ठोस सबूत के सीधे तौर पर मानहानि है।

‘पर्सनैलिटी राइट्स’ पर अदालत का रुख

राघव चड्ढा की याचिका में बॉलीवुड अभिनेताओं और अन्य प्रसिद्ध हस्तियों की तरह अपने ‘पर्सनैलिटी और पब्लिसिटी राइट्स’ की सुरक्षा की मांग की गई थी। हाल के दिनों में दिल्ली उच्च न्यायालय ने कई फिल्मी सितारों और सार्वजनिक हस्तियों के पक्ष में ऐसे आदेश दिए हैं, जो उनकी सहमति के बिना उनके नाम, चेहरे या आवाज का व्यावसायिक या भ्रामक उपयोग करने पर रोक लगाते हैं।

लेकिन राघव चड्ढा के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि एक राजनेता का मामला व्यावसायिक हस्तियों से अलग होता है। अदालत के अनुसार, राजनीतिक दल-बदल या नीतिगत फैसलों के बाद जनता या विरोधियों द्वारा की जाने वाली टिप्पणियां व्यावसायिक शोषण के दायरे में नहीं आतीं, बल्कि वे राजनीतिक विमर्श का हिस्सा हैं। इसलिए, इस मामले में कोई ब्लैंकेट (पूर्ण) निषेधाज्ञा आदेश जारी नहीं किया जा सकता।

आदेश का क्रियान्वयन और आगे की राह

दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्देशों के बाद, अब संबंधित सोशल मीडिया कंपनियों और इलेक्ट्रॉनिक्स व सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) को उन पांच चिन्हित आपत्तिजनक कड़ियों (लिंक्स) और दस्तावेजों को अपने प्लेटफॉर्म से हटाना होगा। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला सोशल मीडिया पर राजनीतिक चर्चाओं की सीमा तय करने में एक नजीर साबित होगा।

इस मामले में विस्तृत और हस्ताक्षरित आदेश जल्द ही अदालत की आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड होने की उम्मीद है, जिसमें उन पांचों सामग्रियों का विवरण और कोर्ट की विस्तृत कानूनी व्याख्या शामिल होगी। फिलहाल, कोर्ट के इस आदेश को राघव चड्ढा के लिए एक आंशिक लेकिन बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है, जिसने उनके खिलाफ चल रहे कथित दुष्प्रचार अभियान पर कानूनी अंकुश लगा दिया है।