कला-साधना को नमन : संस्कार भारती ने किया कला-गुरु पंडित विवेक मिश्र का सम्मान
बच्चों को शास्त्रीय गायन का प्रशिक्षण देकर भारतीय संगीत परंपरा को आगे बढ़ाने में दे रहे अभूतपूर्व योगदान
मुख्य बिंदु (Highlights)
- स्थान एवं अवसर: नमना कला, अम्बिकापुर स्थित स्वरांजलि संगीत महाविद्यालय एवं पंचदेव मंदिर परिसर के समीप गरिमामयी वातावरण में आयोजन।
- सम्मानित व्यक्तित्व: विगत 20 वर्षों से निरंतर संगीत साधना में लीन शास्त्रीय गायन के साधक पंडित विवेक मिश्र।
- उपलब्धि: लगभग 2000 से अधिक बच्चों एवं युवाओं को शास्त्रीय संगीत, ध्रुपद, ख्याल और सुगम संगीत का निःस्वार्थ व निष्ठापूर्वक प्रशिक्षण।
- सम्मान स्वरूप: संस्कार भारती जिला सरगुजा इकाई द्वारा शाल, श्रीफल एवं प्रशस्ति पत्र प्रदान कर ‘कला-गुरु सम्मान’ से अलंकृत किया गया।
- विशिष्ट उपस्थिति: संस्कार भारती के अध्यक्ष रंजीत सारथी, कार्यकारी अध्यक्ष आनंद सिंह यादव, पूर्व महामंत्री डॉ. अर्चना पाठक, वर्तमान महामंत्री डॉ. माधुरी जायसवाल सहित जिले के मूर्धन्य साहित्यकार, कला-साधक और प्रबुद्ध नागरिक उपस्थित रहे।
अम्बिकापुर में गूंजी शास्त्रीय सुरों की तान, संस्कार भारती ने माना कला-साधना का लोहा
अम्बिकापुर। भारतीय कला, साहित्य और संस्कृति के संरक्षण, संवर्धन एवं पुनरुत्थान के लिए संकल्पित राष्ट्रीय संस्था संस्कार भारती (जिला सरगुजा इकाई) द्वारा सरगुजा संभाग के सुप्रसिद्ध शास्त्रीय संगीत साधक पंडित विवेक मिश्र के सम्मान में एक विशेष एवं गरिमामयी ‘कला-गुरु सम्मान समारोह’ का सफल आयोजन किया गया।
यह भव्य कार्यक्रम स्वरांजलि संगीत महाविद्यालय (पंडित विवेक मिश्र के निवास, पंचदेव मंदिर के पीछे, नमना कला, अम्बिकापुर) में आयोजित किया गया। समारोह का मुख्य उद्देश्य उन कला-साधकों के योगदान को सार्वजनिक रूप से रेखांकित करना और उन्हें नमन करना है, जो बिना किसी प्रचार-प्रसार की लालसा के भारतीय शास्त्रीय संगीत की अत्यंत क्लिष्ट एवं समृद्ध परंपरा को नई पीढ़ी में सिंचित कर रहे हैं।
20 वर्षों की अखंड तपस्या और 2000 शिष्यों का निर्माण
पंडित विवेक मिश्र विगत दो दशकों (20 वर्षों) से सरगुजा अंचल में शास्त्रीय संगीत और गायन की निरंतर साधना कर रहे हैं। आधुनिकता और पाश्चात्य संगीत के बढ़ते प्रभाव के बीच उन्होंने भारतीय शास्त्रीय गायन की प्रामाणिकता और उसकी पवित्रता को अक्षुण्ण रखा है। उनके मार्गदर्शन में स्वरांजलि संगीत महाविद्यालय ने अम्बिकापुर ही नहीं, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ राज्य में शास्त्रीय संगीत के एक सशक्त केंद्र के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है।
अपने दो दशकों के संगीत सफर में पंडित विवेक मिश्र ने लगभग दो हजार (2,000) से अधिक बालकों, युवाओं और संगीत अनुरागियों को शास्त्रीय गायन, राग-रागिनियों की बारीकियों, ताल ज्ञान और स्वर साधना का गहन प्रशिक्षण दिया है। उनके द्वारा तराशे गए कई शिष्य आज विभिन्न प्रांतीय एवं राष्ट्रीय मंचों पर अपनी गायकी का परचम लहरा रहे हैं।
“कला केवल व्यक्तिगत अभिव्यक्ति या मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह संस्कार, चरित्र-निर्माण और संस्कृति की अविरल संवाहक है। जब कोई कला-साधक अपनी वर्षों की साधना को निःस्वार्थ भाव से नई पीढ़ी के सुपुर्द करता है, तब उसकी कला व्यक्तिगत उपलब्धि की सीमाओं को लांघकर संपूर्ण समाज की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर बन जाती है।”
सम्मान समारोह का विस्तृत ब्योरा एवं गरिमामय क्षण
कार्यक्रम का शुभारंभ माँ सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण, दीप प्रज्वलन तथा संस्कार भारती के पारंपरिक ध्येय गीत और सरस्वती वंदना के साथ हुआ। तत्पश्चात संस्कार भारती जिला सरगुजा इकाई के प्रमुख पदाधिकारियों ने पंडित विवेक मिश्र को पारंपरिक ढंग से शाल, श्रीफल (नारियल) और अलंकृत प्रशस्ति पत्र भेंट कर ‘कला-गुरु सम्मान’ से विभूषित किया।
सम्मान ग्रहण करते हुए पंडित विवेक मिश्र भावुक हो उठे। उन्होंने कहा कि संगीत उनके लिए केवल एक विद्या या व्यवसाय नहीं, बल्कि ईश्वर प्राप्ति और आत्मा के शोधन का मार्ग है। संस्कार भारती द्वारा मिला यह सम्मान उनके दायित्व को और अधिक बढ़ा देता है तथा वे जीवन के अंतिम क्षण तक बच्चों में भारतीय संगीत के संस्कार बीज बोते रहेंगे।
संस्कार भारती सरगुजा इकाई के पदाधिकारियों की गरिमामयी उपस्थिति
इस गरिमामयी ‘कला-गुरु सम्मान समारोह’ में संस्कार भारती सरगुजा इकाई के शीर्ष पदाधिकारियों, विधा प्रमुखों, सांस्कृतिक कर्मियों तथा स्वरांजलि संगीत महाविद्यालय के उत्सुक छात्र-छात्राओं की बहुसंख्या में उपस्थिति रही। कार्यक्रम में उपस्थित प्रमुख व्यक्तित्व निम्नलिखित हैं:
| पदनाम / दायित्व | पदाधिकारी / सदस्य का नाम |
|---|---|
| अध्यक्ष (जिला सरगुजा) | रंजीत सारथी |
| कार्यकारी अध्यक्ष | आनंद सिंह यादव |
| भूतपूर्व महामंत्री | डॉ. अर्चना पाठक |
| वर्तमान महामंत्री | डॉ. माधुरी जायसवाल |
| साहित्य विधा प्रमुख | आशा उमेश पांडेय |
| प्रचार-प्रसार प्रमुख | डॉ. पूनम दुबे ‘वीणा’ |
| पुरातत्व विभाग प्रमुख | पंकज गुप्ता |
| दृश्य विधा प्रमुख | आनंद गुप्ता |
| कोषाध्यक्ष | रामजनम यादव |
| संस्कार मित्र एवं विशिष्ट सदस्य | राजेश सोनी, रानू साहू |
गुरु-शिष्य परंपरा का पुनरुद्धार और संस्कार भारती का संकल्प
समारोह को संबोधित करते हुए संस्कार भारती के पदाधिकारियों एवं वक्ताओं ने भारतीय कला व गुरु-शिष्य परंपरा के महत्व पर प्रकाश डाला। संस्कार भारती जिला सरगुजा इकाई के अध्यक्ष रंजीत सारथी ने कहा कि आज के डिजिटल युग में जहाँ युवाओं का रुझान सुगम और त्वरित संगीत की ओर बढ़ रहा है, ऐसे समय में शास्त्रीय संगीत की कठिन साधना की ओर बच्चों को मोड़ना एक दुष्कर कार्य है। पंडित विवेक मिश्र इस चुनौती को बेहद आत्मीयता और धैर्य के साथ निभा रहे हैं।
संस्था की महामंत्री डॉ. माधुरी जायसवाल एवं पूर्व महामंत्री डॉ. अर्चना पाठक ने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि संस्कार भारती का सदैव यह प्रयास रहता है कि वह समाज के उन नेपथ्य के नायकों को सामने लाए, जो भारतीय कला, साहित्य, नृत्य, नाट्य, लोक परंपराओं और संगीत को जीवित रखने के लिए अपना जीवन खपा रहे हैं। कला-साधकों का सम्मान करना वस्तुतः हमारी सांस्कृतिक विरासत का सम्मान करना है।
संस्कृति का संदेश: साधना से सिद्धी की ओर
कार्यक्रम के समापन अवसर पर स्वरांजलि संगीत महाविद्यालय के नन्हें एवं युवा साधकों ने अपने गुरु पंडित विवेक मिश्र के प्रति आदर व्यक्त करते हुए शास्त्रीय एवं उप-शास्त्रीय रचनाओं की सुमधुर प्रस्तुतियां दीं। पूरा वातावरण शास्त्रीय स्वरों और तालों की गूंज से भक्तिमय व संगीतमय हो उठा।
यह आयोजन न केवल एक व्यक्तिगत सम्मान समारोह था, बल्कि इसने सम्पूर्ण सरगुजा क्षेत्र में यह संदेश भी संप्रेषित किया कि भारतीय शास्त्रीय संगीत की जड़े बेहद गहरी हैं और जब तक पंडित विवेक मिश्र जैसे निष्ठावान गुरु मौजूद हैं, हमारी सांस्कृतिक धरोहर अक्षुण्ण और सुरक्षित रहेगी।
“कला जहाँ साधना बन जाती है,
वहीं गुरु-परंपरा संस्कृति बनकर पीढ़ियों तक जीवित रहती है।”










