आयुर्वेद दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का देशवासियों को संदेश: बोले- ‘आयुर्वेद केवल उपचार नहीं, संतुलित जीवनशैली का सशक्त माध्यम है’
नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आयुर्वेद दिवस के पावन अवसर पर समस्त देशवासियों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं दी हैं। भारतीय पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली की महत्ता को रेखांकित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि आयुर्वेद को केवल बीमारियों के इलाज तक सीमित नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह एक संपूर्ण, स्वस्थ और संतुलित जीवनशैली जीने का एक अत्यंत सशक्त माध्यम है। उन्होंने नागरिकों से आग्रह किया कि वे भारत की इस प्राचीन एवं वैज्ञानिक धरोहर को दैनिक जीवन में अपनाने के अपने संकल्प को और अधिक मजबूत करें।
इस विशेष अवसर पर प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर एक प्रेरणादायक संदेश साझा किया। अपने संदेश में उन्होंने आयुर्वेद की दार्शनिक और व्यावहारिक गहराई को दर्शाते हुए महर्षि चरक द्वारा रचित चरक संहिता का एक प्रसिद्ध संस्कृत सुभाषितम (श्लोक) भी उद्धृत किया।
प्रधानमंत्री का एक्स (X) पोस्ट
“आयुर्वेद दिवस की सभी देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं! आयुर्वेद केवल उपचार की पद्धति नहीं, बल्कि स्वस्थ और संतुलित जीवन शैली का एक सशक्त माध्यम है। आइए, अपनी इस समृद्ध विरासत को अपनाने का संकल्प और मजबूत करें।”
“हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्।
मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते।।”
संस्कृत श्लोक का गूढ़ अर्थ और आयुर्वेद की वैज्ञानिकता
प्रधानमंत्री द्वारा साझा किया गया श्लोक ‘हिताहितं सुखं दुःखम्…’ आयुर्वेद की मूल परिभाषा और उसके प्राथमिक सिद्धांतों को स्पष्ट करता है। इस श्लोक का अर्थ अत्यंत व्यापक और जीवन दर्शन से परिपूर्ण है:
आयुर्वेद वह महान शास्त्र और विज्ञान है जिसमें मनुष्य के लिए किस प्रकार का आहार, विचार और व्यवहार लाभकारी (हित) है और किस प्रकार का हानिकारक (अहित) है, इसका विस्तार से वर्णन किया गया है। यह विज्ञान स्पष्ट करता है कि जीवन को क्या सुखी बनाता है और क्या दुखी। एक स्वस्थ जीवन और रोगग्रस्त जीवन के बीच क्या अंतर होता है, तथा दीर्घायु और पूर्ण आरोग्य प्राप्त करने के लिए किन आदतों को अपनाना चाहिए और किन वर्जनों का पालन करना चाहिए, इसका समग्र मार्गदर्शन आयुर्वेद प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त, इस शास्त्र में मनुष्य के जीवनकाल (आयु) की प्रकृति, गुणवत्ता और माप पर भी वैज्ञानिक दृष्टि से विचार किया गया है।
उपचार से आगे: संपूर्ण स्वास्थ्य प्रबंधन का दर्शन
आधुनिक चिकित्सा पद्धतियां जहां मुख्य रूप से रोगों के लक्षणों के निवारण (Symptomatic Treatment) पर ध्यान केंद्रित करती हैं, वहीं आयुर्वेद का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन को बनाए रखना है। आयुर्वेद का मूल सिद्धांत है— ‘स्वास्थ्यस्य स्वास्थ्य रक्षणं, आतुरस्य विकार शमनं च’, अर्थात् स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना और रोगी के रोगों को दूर करना।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार वैश्विक मंचों पर भारत की पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों और योग की प्रासंगिकता को बढ़ावा देते रहे हैं। उनका मानना है कि वर्तमान दौर में, जब असंक्रामक रोग (Non-Communicable Diseases) और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां (जैसे मधुमेह, उच्च रक्तचाप, तनाव और हृदय रोग) तेजी से बढ़ रही हैं, तब आयुर्वेद का दिनचर्या, ऋतुचर्या और आहार-विहार का ज्ञान मानवता के लिए एक रक्षा कवच सिद्ध हो सकता है।
वैश्विक स्तर पर आयुर्वेद की बढ़ती स्वीकार्यता
भारत सरकार के आयुष मंत्रालय द्वारा वैश्विक स्तर पर आयुर्वेद को वैज्ञानिक आधार देने और साक्ष्य-आधारित अनुसंधान (Evidence-based research) को बढ़ावा देने के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा भारत में ‘ग्लोबल सेंटर फॉर ट्रेडिशनल मेडिसिन’ की स्थापना इस बात का प्रमाण है कि दुनिया अब भारत के पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़कर देख रही है।
आज विश्व भर में आयुर्वेद की मांग में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। जड़ी-बूटियों पर आधारित उत्पाद, प्राकृतिक जीवनशैली, और पंचकर्म जैसी शोधन थेरेपी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य प्रेमियों के आकर्षण का केंद्र बन चुकी हैं।
आयुर्वेद को जीवन में कैसे उतारें?
आयुर्वेद दिवस के इस अवसर पर विशेषज्ञों ने भी कुछ मूलभूत सिद्धांतों को अपनाने की सलाह दी है:
- ऋतुचर्या और दिनचर्या का पालन: मौसम और समय के अनुसार अपने सोने, जागने और भोजन करने का समय निर्धारित करना।
- सात्विक और ताज़ा आहार: अपनी प्रकृति (वात, पित्त, कफ) के अनुसार शुद्ध और सुपाच्य भोजन ग्रहण करना।
- प्राकृतिक वेगों को न रोकना: भूख, प्यास, नींद और अन्य प्राकृतिक शारीरिक आवश्यकताओं की अनदेखी न करना।
- मानसिक स्वच्छता: प्राणायाम, ध्यान और सकारात्मक चिंतन के माध्यम से मानसिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ बनाना।
प्रधानमंत्री का संदेश देशवासियों को केवल शुभकामनाएं देना नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक और वैज्ञानिक जड़ों की ओर लौटने का एक आह्वान भी है। आयुर्वेद को अपनी दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बनाकर न केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य को बेहतर बनाया जा सकता है, बल्कि ‘समग्र स्वास्थ्य’ (Holistic Health) के वैश्विक लक्ष्य को भी हासिल किया जा सकता है।













