जंतर-मंतर से जलियांवाला तक, क्या सत्ता फिर सवालों से डरने लगी है?
इतिहास की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह कभी मरता नहीं। वह समय के किसी कोने में चुपचाप बैठा रहता है और जैसे ही वर्तमान कोई पुरानी गलती दोहराने लगता है, वह अचानक सामने आकर खड़ा हो जाता है। तब वह कोई भाषण नहीं देता, कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करता, कोई ट्वीट नहीं करता, केवल आईना दिखाता है। जंतर-मंतर की सड़कों से उठी तस्वीरों और वीडियो को देखकर इतिहास का वही आईना एक बार फिर सामने खड़ा दिखाई दिया। फर्क इतना है कि तब अंग्रेजी हुकूमत थी और आज लोकतांत्रिक भारत है। तब विदेशी शासक थे और आज जनता द्वारा चुनी गई सरकार है। लेकिन सवाल वही पुराना है—क्या सत्ता को जनता की आवाज़ से डर लगने लगा है?
1919 के जलियांवाला बाग में जनरल डायर को एकत्रित जनता से भय था। उसे लगा कि यदि लोग अपनी बात कहने लगे, यदि लोग सवाल पूछने लगे, यदि लोग अपने अधिकारों की मांग करने लगे तो साम्राज्य की नींव हिल जाएगी। इसलिए उसने संवाद नहीं चुना, दमन चुना। इतिहास ने उस निर्णय को कभी माफ नहीं किया। आज जब दिल्ली की सड़कों पर छात्र, युवा और अभिभावक अपनी मांगों को लेकर पहुंचे और उनके सामने पुलिस बल, बैरिकेड, आंसू गैस और लाठियां दिखाई दीं—विशेषकर परीक्षा घोटालों और नीट पेपर लीक जैसे गंभीर मुद्दों के खिलाफ—तब स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न पैदा हुआ कि क्या लोकतंत्र में भी जनता की आवाज़ को लेकर असहजता बढ़ती जा रही है?
इतिहास और वर्तमान का अंतर्विरोध
यह स्पष्ट है कि जलियांवाला बाग और आज की घटनाओं की प्रकृति, पैमाना और परिणाम एक जैसे नहीं हैं। किसी भी तरह की सीधी ऐतिहासिक समानता उचित नहीं होगी। लेकिन व्यंग्य का काम घटनाओं की गिनती करना नहीं, मानसिकता को पहचानना होता है। और मानसिकता वहीं दिखाई देती है जहां सत्ता सवाल सुनने की बजाय सवाल पूछने वालों को नियंत्रित करने में अधिक रुचि दिखाती है।
आज का भारत विश्वगुरु बनने की बात करता है। पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था की बात करता है। डिजिटल क्रांति की बात करता है। चंद्रयान, गगनयान और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बात करता है। लेकिन इस चमकदार तस्वीर के पीछे एक और भारत है जो रोजगार के लिए परेशान है, शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर चिंतित है, भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ियों से नाराज है और अपने भविष्य को लेकर असमंजस में है। यही भारत जब अपनी बात कहने के लिए सड़क पर उतरता है तो उसे अक्सर यह समझाया जाता है कि अभी समय उपयुक्त नहीं है, स्थान उचित नहीं है, तरीका सही नहीं है और यदि वह फिर भी नहीं मानता तो फिर प्रशासन सक्रिय हो जाता है।
सरकार और राष्ट्र के बीच धुंधली होती रेखा
आज की राजनीति में सबसे बड़ा परिवर्तन यह आया है कि सरकार और राष्ट्र के बीच की रेखा धुंधली कर दी गई है। सरकार की आलोचना को राष्ट्र की आलोचना की तरह प्रस्तुत किया जाने लगा है। यदि कोई नागरिक किसी नीति पर सवाल उठाता है तो उसे विकास विरोधी कहा जाता है। यदि कोई युवा रोजगार पर सवाल पूछता है तो उसे विपक्ष का एजेंट बता दिया जाता है। यदि कोई पत्रकार असुविधाजनक प्रश्न पूछता है तो उसकी निष्ठा पर सवाल खड़े कर दिए जाते हैं। यदि कोई छात्र आंदोलन करता है तो उसके पीछे किसी षड्यंत्र की तलाश शुरू हो जाती है। ऐसा लगता है जैसे लोकतंत्र में नागरिकों को अधिकार तो दिए गए हैं, लेकिन उनका उपयोग करने से पहले अनुमति लेना जरूरी हो गया है।
जंतर-मंतर की घटना ने इस मानसिकता को फिर उजागर कर दिया। देश के युवाओं को वर्षों से बताया जा रहा है कि वे भारत की सबसे बड़ी ताकत हैं। चुनावों में युवाओं का उल्लेख होता है। योजनाओं में युवाओं का उल्लेख होता है। भाषणों में युवाओं का उल्लेख होता है। लेकिन जब वही युवा अपनी मांगों को लेकर सामने आते हैं तो पूरा सरकारी तंत्र अचानक उन्हें व्यवस्था के लिए खतरे के रूप में देखने लगता है। यह विरोधाभास केवल राजनीति का नहीं, पूरे शासन तंत्र का संकट है।
संवादहीनता और सत्ता का अहंकार
किसी भी लोकतंत्र की असली ताकत यह नहीं होती कि उसके पास कितनी पुलिस है। उसकी ताकत यह होती है कि वह आलोचना को कितनी सहजता से स्वीकार कर सकता है। जो सरकार आलोचना सुनने की क्षमता खो देती है, वह धीरे-धीरे वास्तविकता से भी कटने लगती है। उसके आसपास केवल प्रशंसा का एक घेरा बन जाता है। फिर उसे हर जगह विकास दिखाई देता है, हर जगह सफलता दिखाई देती है, हर जगह उपलब्धियां दिखाई देती हैं। लेकिन जनता की परेशानियां दिखाई देना बंद हो जाती हैं।
यही कारण है कि आज देश में बड़ी-बड़ी परियोजनाओं के उद्घाटन होते हैं, लेकिन बेरोजगार युवाओं की भीड़ भी दिखाई देती है। निवेश सम्मेलनों की खबरें आती हैं, लेकिन नौकरी की तलाश में भटकते युवाओं की कहानियां भी सामने आती हैं। नई शिक्षा नीतियों की चर्चा होती है, लेकिन स्कूलों और कॉलेजों की समस्याएं भी बनी रहती हैं। प्रचार और वास्तविकता के बीच का यह अंतर जितना बढ़ता जाता है, असंतोष भी उतना ही बढ़ता जाता है। और जब असंतोष बढ़ता है तो वह किसी न किसी दिन सड़क पर दिखाई देता है!
मीडिया और लोकतंत्र का चौथा स्तंभ
आज की मीडिया भी इस पूरे परिदृश्य का एक दिलचस्प हिस्सा बन चुकी है। कभी पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाती थी। आज उसका बड़ा हिस्सा विज्ञापन, सत्ता और टीआरपी के बीच संतुलन बनाने की कला में व्यस्त दिखाई देता है। जो मीडिया कभी जनता की आवाज़ हुआ करती थी, वह अब कई बार सत्ता की आवाज़ का विस्तार बनती दिखाई देती है। यही कारण है कि जब सड़क पर छात्रों पर बल प्रयोग होता है तो उससे अधिक समय स्टूडियो में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप को मिल जाता है। जब युवाओं के सवाल उठने चाहिए, तब बहस इस बात पर होने लगती है कि सवाल पूछने वालों की नीयत क्या थी।
पत्रकारिता का संकट केवल पत्रकारिता का संकट नहीं है। यह लोकतंत्र का संकट है। क्योंकि जब मीडिया सवाल पूछना छोड़ देती है तो सत्ता को लगता है कि सब कुछ ठीक है। और जब सत्ता को लगता है कि सब कुछ ठीक है, तब समस्याएं और गंभीर हो जाती हैं।
निष्कर्ष: संवाद से ही सुरक्षित है लोकतंत्र
आज देश में करोड़ों युवा हैं। वे इंटरनेट की दुनिया में रहते हैं। वे दुनिया भर की जानकारी तक पहुंच रखते हैं। वे आंकड़े भी देखते हैं और दावे भी सुनते हैं। वे प्रचार और वास्तविकता के बीच अंतर भी समझते हैं। उन्हें केवल भाषणों से संतुष्ट नहीं किया जा सकता। उन्हें अवसर चाहिए। उन्हें पारदर्शिता चाहिए। उन्हें जवाब चाहिए। और यदि जवाब नहीं मिलेंगे तो वे सवाल पूछेंगे। यह उनका अधिकार भी है और लोकतंत्र की आवश्यकता भी।
सत्ता को शायद यह समझना होगा कि लोकतंत्र में नागरिक दुश्मन नहीं होते। असहमति अपराध नहीं होती। विरोध राष्ट्रविरोध नहीं होता। सवाल साजिश नहीं होते। बल्कि यही सब लोकतंत्र को जीवित रखते हैं। जिस दिन नागरिक सवाल पूछना छोड़ देंगे, उस दिन लोकतंत्र केवल एक औपचारिक व्यवस्था बनकर रह जाएगा।
लाठी से भीड़ हटाई जा सकती है, लेकिन विचार नहीं हटाए जा सकते। आंसू गैस से आंखों में जलन पैदा की जा सकती है, लेकिन सवालों को समाप्त नहीं किया जा सकता। बैरिकेड सड़कों को रोक सकते हैं, लेकिन इतिहास की दिशा को नहीं रोक सकते। और इतिहास हमेशा यह दर्ज करता है कि जब जनता बोल रही थी तब सत्ता क्या कर रही थी। क्योंकि अंततः किसी भी राष्ट्र की पहचान उसकी इमारतों, सड़कों और घोषणाओं से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वह अपने नागरिकों की आवाज़ के साथ कैसा व्यवहार करता है।









