छत्तीसगढ़ की माटी ने खोया अपना महान कलाकार: प्रख्यात बाँस वादक विक्रम यादव का निधन, पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने व्यक्त किया अपूरणीय शोक
रायपुर: छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकसंस्कृति और पारंपरिक संगीत जगत के लिए एक अत्यंत दुखद समाचार सामने आया है। राज्य की पारंपरिक लोककला को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पहचान दिलाने वाले, राजनांदगांव जिले के ग्राम खैरा (रवेली) निवासी प्रख्यात बाँस वादक श्री विक्रम यादव जी का निधन हो गया है। उनके निधन की खबर से प्रदेश के सांस्कृतिक गलियारों, कलाकारों और कला-प्रेमियों में शोक की लहर दौड़ गई है।
छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल (X) के माध्यम से इस दुखद समाचार पर गहरा शोक प्रकट करते हुए स्व. विक्रम यादव जी के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित की है।
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का संदेश:
“छत्तीसगढ़ की लोककला को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलाने वाले राजनांदगांव जिले के ग्राम खैरा (रवेली) निवासी प्रख्यात बाँस वादक श्री विक्रम यादव जी के निधन का समाचार अत्यंत दुःखद है। उनका निधन प्रदेश की लोककला एवं सांस्कृतिक जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। ईश्वर दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें तथा शोकाकुल परिजनों को यह दुःख सहन करने की शक्ति दें।”
1. कौन थे प्रख्यात बाँस वादक स्व. विक्रम यादव?
विक्रम यादव जी छत्तीसगढ़ी लोकसंगीत की उस विधा के स्तंभ थे, जिसे ‘बाँस गीत’ (Bans Geet) या बाँस वादन कहा जाता है। राजनांदगांव जिले के छोटे से गाँव खैरा (रवेली) से निकलकर उन्होंने अपनी अद्भुत कला प्रतिभा के दम पर न केवल छत्तीसगढ़, बल्कि देश-विदेश के बड़े-बड़े सांस्कृतिक मंचों पर राज्य का गौरव बढ़ाया।
बाँस गीत छत्तीसगढ़ के राउत समाज और लोक-संस्कृति की एक विशेष पहचान है। इसमें एक विशाल बांस की नली से निकलने वाली सुरीली और गूंजती ध्वनियों के माध्यम से पौराणिक गाथाएं (जैसे मोरध्वज, राजा भरथरी, या राउत गाथा) गाई जाती हैं। इस कला में विक्रम यादव जी को महारत हासिल थी। उनकी फूँक और उंगलियों का जादू जब बांस पर चलता था, तो सुनने वाले मंत्रमुग्ध हो जाते थे।
2. राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर छत्तीसगढ़ का मान
छत्तीसगढ़िया लोककलाकारों में विक्रम यादव जी का नाम बड़े आदर के साथ लिया जाता है। उन्होंने अपनी निष्ठा और अनवरत साधना से इस पारंपरिक कला को विलुप्त होने से बचाया और इसे अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलाई:
- सांस्कृतिक राजदूत: उन्होंने भारत महोत्सव (Festival of India) और अन्य अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक सम्मेलनों में भाग लेकर विदेशी दर्शकों को छत्तीसगढ़ी लोकधूनों पर झूमने के लिए मजबूर किया।
- विरासत का संरक्षण: नई पीढ़ी जब आधुनिक वाद्ययंत्रों की ओर आकर्षित हो रही थी, तब विक्रम यादव जी ने अपनी इस पैतृक और पारंपरिक कला को जीवंत रखा तथा अनेक युवाओं को इसका प्रशिक्षण दिया।
- राष्ट्रीय पुरस्कार एवं सम्मान: कला के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित राज्य एवं राष्ट्रीय मंचों पर सम्मानित किया गया।
3. लोककला जगत के लिए अपूरणीय क्षति
पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने अपने संदेश में ठीक ही कहा कि “उनका निधन प्रदेश की लोककला एवं सांस्कृतिक जगत के लिए अपूरणीय क्षति है।” छत्तीसगढ़ी संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन में ऐसे कलाकारों का योगदान अतुलनीय होता है। बाँस वादन जैसी कठिन और दुर्लभ कला के शीर्ष साधक का जाना एक ऐसा शून्य उत्पन्न करता है, जिसे भरना निकट भविष्य में कठिन होगा।
छत्तीसगढ़ में जब-जब लोककला, राउत नाचा और बाँस गीत की बात होगी, तब-तब स्व. विक्रम यादव जी का नाम पूरे सम्मान के साथ याद किया जाएगा। उनके जाने से राजनांदगांव क्षेत्र और विशेषकर ग्राम खैरा (रवेली) में शोक का माहौल है।
4. कला जगत एवं जनप्रतिनिधियों ने दी श्रद्धांजलि
विक्रम यादव जी के निधन पर केवल राजनीतिक गलियारों ही नहीं, बल्कि प्रदेश के वरिष्ठ साहित्यकारों, रंगकर्मियों और लोककलाकारों ने भी गहरा दुख व्यक्त किया है।
अनेक लोककलाकारों का कहना है कि विक्रम यादव जी सरल, सौम्य और अपनी माटी से जुड़े हुए इंसान थे। उन्होंने प्रसिद्धि के शिखरों को छूने के बाद भी अपने गाँव खैरा और छत्तीसगढ़ की सादगी को कभी नहीं छोड़ा। वे हमेशा युवा कलाकारों को अपनी संस्कृति से जुड़ने और लोककलाओं को सहेजने के लिए प्रेरित करते रहते थे।
5. ईश्वर से प्रार्थना
छत्तीसगढ़ का समस्त कला जगत ईश्वर से प्रार्थना करता है कि दिवंगत पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें तथा इस कठिन और वज्रपात समान दुःख की घड़ी में उनके शोकाकुल परिवार एवं प्रशंसकों को यह असीम पीड़ा सहन करने की शक्ति प्रदान करें।
॥ ॐ शांति ॥












