दीपावली महापर्व विशेष अंक 2026
धनतेरस से भाई दूज तक: जानिए पांच दिवसीय महापर्व को मनाने की विधि, तिथि, शुभ मुहूर्त और सांस्कृतिक महत्व
प्रकाश और उल्लास का महापर्व दीपोत्सव 2026
भारतीय सनातन संस्कृति में पर्वों और त्योहारों की एक लंबी और समृद्ध श्रृंखला है, किंतु इनमें ‘दीपावली’ का पांच दिवसीय महापर्व अपने साथ अलौकिक आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक ऊर्जा लेकर आता है। शरद ऋतु के आगमन के साथ ही कार्तिक मास की अमावस्या और उसके आसपास के दिन संपूर्ण भारतवर्ष को रोशनी, उमंग और सकारात्मकता से सराबोर कर देते हैं। वर्ष 2026 में यह दीपोत्सव और भी विशेष बन जाता है, क्योंकि ग्रह-नक्षत्रों के अनूठे संयोग और पंचांगीय गणनाओं के अनुसार इस बार के सभी पांच पर्व अपने निर्धारित तिथियों पर पूर्ण विधि-विधान के साथ मनाए जा रहे हैं।
दीपावली केवल दीपों की पंक्ति जलाने का नाम नहीं है, बल्कि यह अंधकार से प्रकाश की ओर, असत्य से सत्य की ओर और अज्ञान से ज्ञान की ओर बढ़ने का शाश्वत संदेश है। यह वह समय है जब घर-आँगन की विशेष साफ-सफाई की जाती है, रंगोली सजाई जाती है, नए वस्त्र धारण किए जाते हैं और मिष्ठान्न बांटकर खुशियां साझा की जाती हैं। इस विस्तृत मार्गदर्शिका में हम वर्ष 2026 के पांचों प्रमुख दिनों—धनतेरस, छोटी दिवाली, महालक्ष्मी पूजन, गोवर्धन पूजा और भाई दूज—के हर एक पहलू, पूजा विधि, कथा, शुभ मुहूर्त और परंपराओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
धनतेरस 2026: तिथि, धन्वंतरि पूजन, खरीदारी के शुभ मुहूर्त और दीपदान
दीपोत्सव के पांच दिवसीय पर्व की आधिकारिक शुरुआत धनतेरस (धनत्रयोदशी) के पावन पर्व से होती है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व स्वास्थ्य, समृद्धि और आयु के देवता भगवान धन्वंतरि, धन के अधिपति कुबेर देव और माता लक्ष्मी को समर्पित है।
पौराणिक पृष्ठभूमि और महत्व
पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन ही भगवान धन्वंतरि अपने हाथों में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। चूंकि वे आयुर्वेद के प्रवर्तक हैं, इसलिए इस दिन आरोग्य की प्राप्ति के लिए उनकी विशेष पूजा की जाती है। इसके साथ ही, इस दिन नई वस्तुएं, बर्तन, सोने-चांदी के आभूषण या सिक्के खरीदने की परंपरा है, जिसके पीछे यह मान्यता है कि इस दिन खरीदी गई वस्तुएं में तेरह गुना वृद्धि होती है।
वर्ष 2026 की तिथियां और शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में धनतेरस का पर्व 6 नवंबर, शुक्रवार को मनाया गया। त्रयोदशी तिथि 6 नवंबर को सुबह 10:30 बजे से शुरू होकर 7 नवंबर को सुबह 11:47 बजे तक रही।
| विशेष गतिविधि / मुहूर्त | समय / अवधि (वर्ष 2026) |
|---|---|
| धनतेरस संध्या पूजा मुहूर्त | शाम 06:02 बजे से 07:57 बजे तक |
| प्रदोष काल | शाम 05:33 बजे से रात 08:09 बजे तक |
| सोना-चांदी एवं बर्तन खरीदारी का शुभ समय | 6 नवंबर सुबह 10:30 बजे से 7 नवंबर सुबह 06:37 बजे तक |
धनतेरस पूजा और यम दीपदान की विधि
धनतेरस की संध्या पर प्रदोष काल में घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और कुबेर जी की प्रतिमा स्थापित करें। उन्हें रोली, अक्षत, पीले व लाल पुष्प, गंध और नैवेद्य अर्पित करें। भगवान धन्वंतरि को पीली मिठाइयां और बेसन के लड्डू प्रिय हैं। इस दिन शाम के वक्त घर के मुख्य द्वार पर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके यमराज के निमित्त ‘यम दीप’ जलाया जाता है, जिसे ‘यम दीपदान’ कहते हैं। मान्यता है कि इससे आकल मृत्यु का भय समाप्त होता है और परिवार पर अकाल संकट नहीं आते।
नरक चतुर्दशी / छोटी दिवाली 2026: यमराज की आराधना और अभ्यंग स्नान
धनतेरस के अगले क्रम में कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को नरक चतुर्दशी अथवा रूप चौदस / छोटी दिवाली के रूप में मनाया जाता है। वर्ष 2026 में पंचांगीय गणना के अनुसार नरक चतुर्दशी और अभ्यंग स्नान से जुड़े अनुष्ठान 8 नवंबर को संपन्न हुए (चूंकि चतुर्दशी तिथि का व्याप्त काल इस प्रकार रहा कि उदयातिथि और स्नान का मुख्य समय 8 नवंबर की सुबह प्राप्त हुआ)।
ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व
इस पर्व से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध पौराणिक कथा भगवान श्रीकृष्ण, सत्यभामा और नरकासुर वध की है। प्राग्ज्योतिषपुर के अत्याचारी असुर राजा नरकासुर ने अपनी क्रूरता से त्राहि-त्राहि मचा रखी थी और 16,000 राजकन्याओं को बंधक बना लिया था। तब भगवान श्रीकृष्ण ने सत्यभामा की सहायता से उसका वध किया और उन कन्याओं को मुक्त कराया। इसी विजय के उल्लास में नरक चतुर्दशी का पर्व मनाया जाता है। इसके अलावा, इस दिन यमराज की विशेष पूजा का भी विधान है ताकि नरक यातनाओं से मुक्ति मिल सके।
अभ्यंग स्नान की परंपरा
नरक चतुर्दशी के दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर ‘अभ्यंग स्नान’ करने का अत्यधिक महत्व है। इस दिन शरीर पर तिल के तेल या उबटन की मालिश करके स्नान किया जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से सौंदर्य और आरोग्य की प्राप्ति होती है तथा पापों का नाश होता है। स्नान के पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण कर दक्षिण दिशा की ओर यमराज का पूजन कर दीपक प्रज्वलित किया जाता है। रात के समय घरों में दीप जलाए जाते हैं, जिसे छोटी दिवाली कहा जाता है।
दीपावली / लक्ष्मी-गणेश पूजन 2026: विधि, मंत्र और महासंयोग
दीपावली का पांच दिवसीय उत्सव अपने चरम पर कार्तिक मास की अमावस्या को पहुंचता है, जिसे हम मुख्य दीपावली या महालक्ष्मी पूजन के रूप में मनाते हैं। वर्ष 2026 में दीपावली का यह महा पर्व 8 नवंबर, रविवार को मनाया गया। इस दिन अमावस्या तिथि और प्रदोष काल का सुंदर संयोग प्राप्त हुआ।
दिनांक: 8 नवंबर 2026 (रविवार)
संध्या पूजन मुहूर्त: शाम 05:54 बजे से रात 07:50 बजे तक (अवधि: 1 घंटा 56 मिनट)
प्रदोष काल: शाम 05:31 बजे से रात 08:09 बजे तक
दीपावली का आध्यात्मिक और ऐतिहासिक आधार
यह दिन केवल आर्थिक समृद्धि का प्रतीक नहीं, बल्कि असत्य पर सत्य की शाश्वत विजय का प्रतीक है। त्रेतायुग में भगवान श्री राम चौदह वर्षों का वनवास पूरा कर, रावण का वध करके जब अपनी पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे थे, तो अयोध्यावासियों ने उनके स्वागत में घी के दीये जलाए थे। इसके अलावा, समुद्र मंथन के समय इसी दिन माता लक्ष्मी क्षीरसागर से प्रकट हुई थीं, इसलिए इस दिन मां लक्ष्मी और विघ्नहर्ता गणेश जी की संयुक्त पूजा का विधान है।
पूजन की चरणबद्ध विधि
दीपावली की पूजा की तैयारी दोपहर से ही शुरू हो जाती है:
- शुद्धिकरण: पूरे घर की साफ-सफाई कर गंगाजल छिड़ककर पवित्र किया जाता है। मुख्य द्वार पर आम और अशोक के पत्तों की बंधनवार लगाई जाती है तथा चावल, आटे और फूलों से सुंदर रंगोली बनाई जाती है।
- चौकी स्थापना: पूजा स्थल पर एक साफ चौकी बिछाकर उस पर लाल या पीला वस्त्र बिछाया जाता है। उस पर मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र स्थापित किए जाते हैं।
- षोडशोपचार पूजन: देवी-देवताओं को जल, पंचामृत, रोली, अक्षत, कलावा, धूप, दीप और गंध अर्पित किए जाते हैं। उन्हें कमल या गेंदे के ताजे फूल, खील-बताशे, फल और मोदक/लड्डू का भोग लगाया जाता है।
- मंत्र जाप और आरती: मां लक्ष्मी के मंत्र “ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः” तथा गणेश जी के मंत्र का जाप किया जाता है। अंत में श्रद्धापूर्वक आरती करके समस्त घर में दीप प्रज्वलित किए जाते हैं।
गोवर्धन पूजा / अन्नकूट 2026: प्रकृति और गोवंश के प्रति कृतज्ञता
दीपावली के अगले दिन यानी कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को गोवर्धन पूजा (जिसे अन्नकूट महोत्सव भी कहा जाता है) मनाई जाती है। वर्ष 2026 में पंचांग की गणना के अनुसार गोवर्धन पूजा 10 नवंबर, मंगलवार को मनाई गई।
ऐतिहासिक कथा: इंद्र के अहंकार का मर्दन
पौराणिक कथा के अनुसार, ब्रजवासी देवराज इंद्र की पूजा किया करते थे। एक बार बालकृष्ण ने ब्रजवासियों से कहा कि आपको वर्षा करने वाले इंद्र से अधिक अपने जीवन का पालन-पोषण करने वाले गोवर्धन पर्वत और गौमाता की पूजा करनी चाहिए, जो हमें फल, सब्जियां, चारा और शुद्ध दूध प्रदान करते हैं। ब्रजवासियों ने गोवर्धन पर्वत की पूजा शुरू की, जिससे क्रोधित होकर इंद्र ने प्रलयकारी मूसलाधार वर्षा कर दी। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी कनिष्ठ अंगुली पर गोवर्धन पर्वत को उठाकर संपूर्ण ब्रजवासियों और पशुओं की रक्षा की थी। तभी से अन्नकूट और गोवर्धन पूजा की परंपरा आरंभ हुई।
पूजा विधि और अन्नकूट का महत्व
गोवर्धन पूजा के दिन सुबह उठकर गाय के गोबर से घर के आंगन में गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाई जाती है। इसे फूलों, पत्तियों और रंगों से सजाया जाता है। इसके बाद भगवान कृष्ण और गोवर्धन पर्वत की पूजा कर उन्हें विभिन्न प्रकार के अनाजों, मिठाइयों और छप्पन भोग (अन्नकूट) का प्रसाद चढ़ाया जाता है। इस दिन गौमाता (गाय) को स्नान कराकर उन्हें तिलक लगाया जाता है और हरा चारा व गुड़ खिलाकर उनकी परिक्रमा की जाती है। यह पर्व पर्यावरण संरक्षण, प्रकृति के प्रति आभार और पशुधन के महत्व को रेखांकित करता है।
भाई दूज (यम द्वितीया) 2026: भाई-बहन के पवित्र प्रेम का उत्सव
दीपावली के पांच दिवसीय महापर्व का समापन भाई-बहन के अटूट स्नेह और विश्वास के प्रतीक पर्व भाई दूज (जिसे यम द्वितीया भी कहते हैं) के साथ होता है। वर्ष 2026 में भाई दूज का यह पावन पर्व 11 नवंबर, बुधवार को मनाया गया।
दिनांक: 11 नवंबर 2026 (बुधवार)
अपराह्न मुहूर्त (तिलक का समय): दोपहर 01:10 बजे से दोपहर 03:20 बजे तक
पौराणिक कथा: यमराज और यमुना का प्रसंग
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सूर्यपुत्र यमराज की बहन यमुना थीं, जो अपने भाई से अत्यधिक स्नेह करती थीं और बार-बार उन्हें अपने घर भोजन के लिए आमंत्रित करती थीं। एक दिन कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमराज अपनी बहन यमुना के घर पहुंचे। यमुना ने उनका भव्य सत्कार किया, उनके माथे पर तिलक लगाया और उन्हें स्वादिष्ट भोजन कराया। इससे प्रसन्न होकर यमराज ने वरदान मांगने को कहा। तब यमुना ने वचन मांगा कि जो भी बहन इस दिन अपने भाई का सत्कार कर तिलक करेगी, उसे आपके (यमराज के) भय से मुक्ति मिलेगी और भाई-बहन का संबंध दीर्घायु होगा। तभी से यह पर्व ‘यम द्वितीया’ या ‘भ्रातृ द्वितीया’ के रूप में मनाया जाने लगा。
मनाने की रीति
इस दिन बहनें अपने भाइयों को अपने घर आमंत्रित करती हैं या उनके घर जाती हैं। भाई को चौकी पर बिठाकर कुमकुम, अक्षत और चंदन का तिलक लगाया जाता है, उनकी आरती उतारी जाती है और उनके दाहिने हाथ पर कलावा बांधा जाता है। इसके पश्चात भाई की लंबी उम्र और आरोग्यता की कामना करते हुए उन्हें मिठाई खिलाई जाती है। भाई भी अपनी बहन को सामर्थ्यनुसार उपहार और आशीर्वाद देते हैं। यह पर्व भाई-बहन के बीच के मनमुटाव को मिटाकर प्रेम और सुरक्षा के संकल्प को मजबूत करता है।
धनतेरस से शुरू होकर भाई दूज पर संपन्न होने वाला यह पांच दिवसीय दीपोत्सव 2026 केवल धार्मिक कर्मकांडों का समुच्चय नहीं है, बल्कि यह हमारी प्राचीन संस्कृति, मानवीय मूल्यों और सामाजिक जुड़ाव का एक जीवंत दस्तावेज है। धनतेरस हमें हमारे स्वास्थ्य और आर्थिक संतुलन की सीख देता है, छोटी दिवाली हमें नकारात्मकता और आंतरिक बुराइयों को त्यागने का मार्ग दिखाती है, दीपावली हमें ज्ञान और सद्भाव का प्रकाश फैलाना सिखाती है, गोवर्धन पूजा हमें पर्यावरण और जीव-जंतुओं के संरक्षण का पाठ पढ़ाती है, और भाई दूज पारिवारिक रिश्तों में मिठास व सुरक्षा का भाव प्रगाढ़ करता है।
इस वर्ष 2026 के दीपोत्सव ने एक बार फिर से हमारे जीवन में नई उम्मीदों, सकारात्मक ऊर्जा और सामूहिक उल्लास का संचार किया है। आवश्यकता इस बात की है कि हम इन पर्वों के केवल बाहरी अनुष्ठानों तक सीमित न रहें, बल्कि इनके मर्म को समझकर अपने जीवन को सार्थक बनाएं तथा समाज में प्रेम, भाईचारा और प्रकाश का संदेश प्रसारित करें।
















