
नरवा उपचार से कुकुरबोधा नाला को मिला नया जीवन
10 हेक्टेयर क्षेत्र में बढ़ी सिंचाई की सुविधा, खेतों तक पहुंची पानी तो लहलहाने लगे फसल
नरवा उपचार से कुकुरबोधा नाला को मिला नया जीवन
P.S.YADAV/ब्यूरो चीफ/सरगुजा// राज्य शासन की महत्वकांक्षी योजना नरवा, गरवा, घुरवा और बाड़ी बॉडी के तहत नरवा घटक के अंतर्गत किये जा रहे उपचार से जिले के नालों को नया जीवन मिल रहा है। बतौली विकासखण्ड के ग्राम तिरंग से होकर बहने वाला कुकुरबोधा नाला को भी मनरेगा के माध्यम से नरवा उपचार किया गया जिससे नया जीवन मिला । उपचार के बाद सितम्बर तक ही बहने वाले इस नाले में अब बरसात के बाद 5 महीने तक पानी भरा रहता है।
कुकुर बोधा नाला के उपचार से 30 किसानों को खरीफ के साथ ही रबी फसलों के लिए पानी मिल रही है। अब करीब 10 हेक्टेयर क्षेत्र में खेती के लिए सिंचाई सुविधा का विस्तार हुआ है जिससे नाला के आस पास के खेतों में फसल लहलहा रहा है। कलेक्टर संजीव कुमार झा के मार्गदर्शन एवं जिला पंचायत के सीईओ विनय कुमार के नेतृत्व में जिले के विकासखण्ड के ग्रामो से होकर बहने वाले नालों का उपचार किया जा रहा है।
कुकुरबोधा नाला के कायापलट में नरवा उपचार के तहत नाला के अंदर और सतह क्षेत्र जल संरक्षण एवं जल संवर्धन हेतु बोल्डर चेकडैम, गेबियन आदि के काम किए गए हैं। 82 संरचनाओं के माध्यम से किया गया नरवा ड्रेनेज ट्रीटमेंट- पिछले साल जनवरी-फरवरी में कुकुरबोधा नाले में ड्रेनेज लाईन ट्रीटमेंट और नरवा के बाहरी हिस्से में कैचमेंट एरिया ट्रीटमेंट के लिए मनरेगा से जल संरक्षण एवं जल संचय के लिए संरचनाओं का निर्माण शुरू किया गया। ड्रेनेज लाईन ट्रीटमेंट के अंतर्गत गेबियन के 2, लूज बोल्डर चेकडेम की 30, अर्दन गली प्लग की 40, कच्ची नाली 01 तथा स्ट्रगर ट्रैंच 01 संरचनाओं का निर्माण किया गया।
इससे जहां जल स्तर में सुधार देखने को मिल रहा है, वहीं नरवा से बनी भूमि में नमी की मात्रा बनी रहने लगी है। इससे आसपास के किसान लाभान्वित हो रहे है। इसके साथ ही करीब 500 मीटर कच्ची नाली का निर्माण भी किया गया है जिससे वर्तमान में 08 किसान सब्जी की खेती कर आमदनी अर्जित कर रहे हैं। कैचमेंट एरिया ट्रीटमेंट के लिए बनाई गई डबरियाँ- कुकुरबोथा नरवा के कैचमेंट एरिया के करीब क्षेत्र में गिरने वाले वर्षा जल को संरक्षित कर भू-जल का स्तर बढ़ाने के लिए 03 डबरी बनायी गयी है एवं लगभग 30 रिचार्ज पिट प्रस्तावित है। डबरियों का उपयोग किसान अल्प वर्षा या खेतों के सूखने की स्थिति में अपनी फसलों की बचाने में कर रहे हैं।