
यज्ञ, कर्मकांड की विधि है जो परमात्मा द्वारा ही हृदय में सम्पन्न होती है
51 कुंडीय गायत्री महायज्ञ से पीतांबरीमय हुआ कोयलांचल बिश्रामपुर
गोपाल सिंह विद्रोही प्रदेश ख़बर प्रमुख छत्तीसगढ़ विश्रामपुर यज्ञ जीव के अपने सत्य परिचय जो परमात्मा का अभिन्न ज्ञान और अनुभव है, यज्ञ की पूर्णता है। यह प्राणीयो की शुद्ध होने की क्रिया है।
उक्त वैदिक ज्ञान हरिद्वार से पधारे पंडितो की टोली ने संगीतमय प्रवचन प्रवाह के माध्यम से 51 कुंडीय गायत्री महायज्ञ में यज्ञ पंडाल वेदी पर बैठे सैकड़ो धर्म प्रेमियों को श्रवण कराया।
प्रखंड विद्वानों ने यज्ञ की परिभाषीत करते हुए श्रीमद भगवत गीता में भगवान कृष्ण द्वारा उदृत श्लोक को सुनाते हुए कहा कि अधियज्ञो अहमेवात्र देहे देहभृताम वर ॥ 4/8 भगवत गीता अनाश्रितः कर्म फलम कार्यम कर्म करोति यः स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रिय: ॥ 1/6 जिसका भावार्थ है शरीर या देह सेवा को छोड़ देने का वरण या निश्चय करने वालों में, यज्ञ अर्थात जीव और आत्मा की क्रिया या जीव का आत्मा में विलय, परमात्मा का कार्य है।
यज्ञ का अर्थ कर्मकांड है किन्तु इसकी शिक्षा व्यवस्था में अग्नि और घी के प्रतीकात्मक प्रयोग में पारंपरिक रूचि का कारण अग्नि के भोजन बनाने में, या आयुर्वेद और औषधीय विज्ञान द्वारा वायु शोधन इस अग्नि से विसर्जित धुआं से होने वाले अनेको लाभ है।
विद्वानों ने आगे कहा कि पदार्थों एवं मूल्यवान् सुगंधित पौष्टिक द्रव्यों को अग्नि एवं वायु माध्यम से समस्त संसार के कल्याण के लिए यज्ञ द्वारा वितरित किया जाता है। वायु शोधन से सबको आरोग्यवर्धक साँस लेने का अवसर मिलता है। हवन हुए पदार्थ वायुभूत होकर प्राणिमात्र को प्राप्त होते हैं और उनके स्वास्थ्यवर्धन, रोग निवारण में सहायक होते हैं। यज्ञ काल में उच्चरित वेद मंत्रों की पुनीत शब्द ध्वनि आकाश में व्याप्त होकर लोगों के अंतःकरण को सात्विक एवं शुद्ध बनाती है। इस प्रकार थोड़े ही खर्च एवं प्रयतन से यज्ञकर्ताओं द्वारा संसार की बड़ी सेवा बन पड़ती है। वैयक्तिक उन्नति और सामाजिक प्रगति का सारा आधार सहकारिता, त्याग, परोपकार आदि प्रवृत्तियों पर निर्भर है। यदि माता अपने रक्त-मांस में से एक भाग नये शिशु का निर्माण करने के लिए न त्यागे, प्रसव की वेदना न सहे, अपना शरीर निचोड़कर उसे दूध न पिलाए, पालन-पोषण में कष्ट न उठाए और यह सब कुछ नितान्त निःस्वार्थ भाव से न करे, तो फिर मनुष्य का जीवन धारण कर सकना भी संभव न हो। इसलिए कहा जाता है कि मनुष्य का जन्म यज्ञ भावना के द्वारा या उसके कारण ही संभव होता है।पंडितो कि इस जोड़ी में राजकुमार , अशोक भाई पटेल ,सुबेन बनर्जी ,खुदीराम केसरिया, हुकुमचंद ,विनोद कुमार आदि शामिल है ।यज्ञ में प्रतिदिन सैकड़ों जोड़ा श्रद्धालु सहित धर्म प्रेमी पहुंच रहे हैं ।कलश यात्रा ऐतिहासिक रहा जिसमें सभी उम्र के धर्म प्रेमी पितांबरी अंग वस्त्र में शामिल हुए । यज्ञआगामी 4 अप्रैल तक निर्बाध गति से चलता रहेगा ।आयोजन को सफल बनाने सुभाष गोयल, श्री राम पटेल सरोज सिंह ,बिंदु गुप्ता, श्रीकांत मिश्रा, शेष नारायण क्षत्रीय धर्मपाल साहू ,जयप्रकाश यादव ,श्यामा पांडे, गिरधर तिवारी, गौरी शंकर तिवारी, राजमणि पटेल शामिल है।