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सुरता// लइकई के खेल


जिनगी के संझौती बेरा म पाछू डहर झांक के देखथौं, त सबले जादा सुरता अपन लइकई के आथे. कतका गुरतुर अउ निक रहिसे. न कुछु काम-बुता के चिंता न कुछु अउ के फिकर. बस खावव, पियव अउ नंगत ले खेलव. नदी- पहाड़, घाम- छांव, रेस- टीप, पिट्ठूल, बांटी, भौंरा, डंडा- पचरंगा, केऊं- मेऊं, गिल्ली- डंडा, भटकउल अउ आनी-बानी के खेल. अपन लइकई के छापा ल आज के लइका मन म खोजे के मन करथे, त कभू नइ जनावय, के वइसन दिन फेर कभू देखे म आ पाही? तब ए डांड़ अंतस ले निकल परिस-


तैं कहाँ गंवा गेस मोर लइकई के हांसी
सुरता कर देथे मोला अब तोर रोवासी…

कन्हैया कस महूं ह फुदुर-फुदुर रेंगव
मंद पिये कस कभू भदरस ले गिरंव
महतारी ह धरा-रपटा उठावय
ठउका कूदे हस कहिके हंसावय
फेर पलथिया के झड़कंव मैं बासी…

थोरके बाढ़ते फेर फुतकी म खेलन
पावडर कस देंह भर उही ल चुपरन
घर-घुंदिया कभू ते सगा-पहुना खेलन
गुठलू ल फोर के चिरौंजी ल रांधन
घानीमुंदी किंजरत फेर आवय मतासी…

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पीपर छइहां म इब्भा हम खेलन
कभू-कभू बांटी अउ भौंरा रट्ठोवन
डंडा-पचरंगा ते कभू खेलन खुडवा
कभू-कभू गम्मत कस बनन हम बुढ़वा
ये सब उछाह ल आज लगगे फांसी…
सिरतोन आय, वो उछाह न आज हमर मन म दिखय, न आज के लइका मन म. समय के संग जम्मो परंपरा अउ जिनगी जीए के साधन अउ तरीका घलो बदलत जावत हे. अब के लइका मन वैज्ञानिक आविष्कार के मोहजाल म अभरगे हें. सूत के उठे ले सोवा के परत ले. एकरे सेती आज के लइका मन म पहिली कस तंदुरुस्ती घलो देखे म नइ आवय.
पहिली लइकई ले लेके सियानी तक किसम-किसम के खेल. तिहार-बार म खेल, अलग- अलग मौसम म अलग- अलग खेल. गीत गावत जीवन दर्शन के खेल. आज ए सबला गुनबे त अपन परंपरा ऊपर गरब होथे. हमन तो वइसे घलो चारों मुड़ा के लोक परंपरा के संरक्षण संवर्धन म लगे रहिथन. फेर मोला लागथे लोक खेल के दिशा म ए ह अउ जादा जरूरी हे. अभी ए बुता म हमर साहित्यकार संगी चंद्रशेखर चकोर ह बनेच भीड़े हे. तीस बछर असन होगे वोला ए उदिम म.
चकोर के ए रद्दा उदिम नवा लइका मन बर प्रेरणा दे के लाइक हे. जब ए 21 बछर के रहिस तब एकर मन म गिल्ली डंडा ल प्रतियोगिता के रूप म आयोजित करे के चेत आइस. नवा सुम्मत नांव के एक समिति बनाइस अउ गाँव के लइका मनला जोर सकेल के एकर तैयारी म भीड़गे.
छेरछेरा हमर छत्तीसगढ़ के ‘दानी’ परब आय. तब ए परब ह 11.1.1990 के अभरे रिहिसे, जे हा एक ऐतिहासिक तिथि के रूप म चिन्हारी बनगे हे. चकोर ह अपन गृहग्राम कांदुल के लइका मन के तब 8 टोली बना के एमा भागीदारी कराए रिहिसे. सबले मजेदार बात ए आय, के ए ‘लोक खेल’ के पहला आयोजन के मुख्यअतिथि मोला बनाए गे रिहिसे. तब मैं छत्तीसगढ़ी मासिक पत्रिका ‘मयारु माटी’ के प्रकाशन-संपादन करत रेहेंव. आज ए आयोजन के पूरा प्रदेश भर म बढ़वार के संगे-संग शासकीय स्तर म घलो एला प्रोत्साहित करत देख के गरब होथे, के जेन नान्हे पौधा के बीजारोपण म एको खोंची पानी रितोए के जस मोरो हाथ ले होगे रिहिसे, तेन आज कतका विशाल छायादार रूख के रूप धर लिए हे.
चंद्रशेखर ह गिल्ली डंडा के संगे-संग अउ अबड़ अकन खेल मनला अपन ए आयोजन संग जोड़त चले लागिस, तेकर सेती आज ए एक पूरा लोक खेल महोत्सव के रूप धर लिए हे.
लोक खेल के आयोजन के संगे-संग वो ह एला साहित्यिक रूप घल़ो देके उदिम करीस. “छत्तीसगढ़ के पारंपरिक लोक खेल” के नांव ले एक शोधपूर्ण ग्रंथ के सिरजन करीस. जेमा हमर इहाँ के जम्मो किसम के खेल मनके बारे म विद्वता पूर्ण ढंग ले बताए के बुता करीस. उंकर वेबसाइट www.ritualgames.in म एला विस्तार ले पढ़े जा सकथे.
-सुशील भोले
संजय नगर, रायपुर
मो/व्हा. 9826992811

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