महापौर मंजूषा भगत के गंगाजल बयान पर विवाद, धार्मिक भेदभाव और अस्पृश्यता का आरोप

महापौर मंजूषा भगत के गंगाजल बयान पर विवाद, धार्मिक भेदभाव और अस्पृश्यता का आरोप

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अंबिकापुर। नगर निगम अंबिकापुर की नवनिर्वाचित महापौर श्रीमती मंजूषा भगत के एक बयान ने विवाद खड़ा कर दिया है। 28 फरवरी 2025 को मीडिया के माध्यम से सार्वजनिक हुए इस बयान में उन्होंने नगर निगम की सफाई को लेकर टिप्पणी करते हुए कहा कि वे गंगाजल से नगर निगम में व्याप्त अशुद्धियों को दूर करेंगी। उन्होंने कांग्रेस के दस वर्षों के शासनकाल को भ्रष्ट और अशुद्ध बताया और कहा कि वे निगम में प्रवेश करने के बाद गंगाजल का छिड़काव करेंगी।

महापौर ने यह भी कहा कि वे इस नगर निगम की पहली हिंदू महापौर हैं और इसलिए वे अपने पूर्ववर्ती महापौर, जो कि अल्पसंख्यक समुदाय से थे, के उपयोग की गई कुर्सी और टेबल का इस्तेमाल नहीं करेंगी। उन्होंने नगर निगम आयुक्त को निर्देश दिया है कि उनके लिए नई कुर्सी-टेबल की व्यवस्था की जाए।

महापौर के इस बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इसे धार्मिक भेदभाव और अस्पृश्यता को बढ़ावा देने वाला बयान बताया है। जिला कांग्रेस कमेटी (डीसीसी) के अध्यक्ष राकेश गुप्ता ने इसे नफरती बयान करार दिया और महापौर के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की है।

डीसीसी अध्यक्ष ने कोतवाली थाना, अंबिकापुर में एक आवेदन देकर भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 196, 197, 298, 302, 356(3) और (4) के तहत महापौर के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की है। उन्होंने इसे संविधान के अनुच्छेद 17 का उल्लंघन बताते हुए कहा कि यह बयान समाज में नफरत फैलाने वाला है। उन्होंने यह भी कहा कि महापौर के इस बयान से स्पष्ट है कि वे धार्मिक भेदभाव को बढ़ावा दे रही हैं और पूर्ववर्ती महापौरों के खिलाफ अनावश्यक वैमनस्य उत्पन्न कर रही हैं।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता को समाप्त करता है और इसे दंडनीय अपराध घोषित करता है। इसके अलावा, भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत किसी समुदाय विशेष के खिलाफ नफरत फैलाना, धार्मिक आधार पर भेदभाव करना और संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ कार्य करना दंडनीय अपराध माना जाता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि महापौर का यह बयान सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने की मंशा से प्रेरित हो सकता है और इससे सांप्रदायिक तनाव उत्पन्न होने की संभावना है। न्यायिक विशेषज्ञों के अनुसार, यदि इस मामले में उचित कानूनी कार्रवाई नहीं की गई, तो यह भविष्य में सामाजिक विभाजन को और अधिक गहरा कर सकता है।

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महापौर के बयान के खिलाफ स्थानीय सामाजिक संगठनों ने भी कड़ी आपत्ति जताई है। कुछ संगठनों ने इसे संविधान और लोकतंत्र के मूल्यों के खिलाफ बताया है। अंबिकापुर के विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों ने इसे एक खतरनाक प्रवृत्ति करार देते हुए प्रशासन से इस पर संज्ञान लेने की अपील की है।

वहीं, भाजपा और महापौर समर्थकों ने इस विवाद को विपक्ष की साजिश करार दिया है। उनका कहना है कि महापौर ने सिर्फ नगर निगम में व्याप्त भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को समाप्त करने के लिए यह बयान दिया है। उन्होंने इसे हिंदू धर्म के प्रति आस्था का प्रतीक बताया और विपक्ष पर अनावश्यक राजनीति करने का आरोप लगाया।

नगर निगम के कर्मचारियों और अधिकारियों में भी इस बयान को लेकर मतभेद हैं। कुछ कर्मचारियों का कहना है कि महापौर का बयान उनके काम और ईमानदारी पर सीधा हमला है, जबकि कुछ लोगों का मानना है कि वे निगम में नए बदलाव लाने के उद्देश्य से यह कह रही थीं। हालाँकि, एक बड़ा वर्ग इस बयान को आपत्तिजनक मान रहा है और इसे धार्मिक आधार पर कर्मचारियों को बांटने वाला करार दे रहा है।

कोतवाली थाना प्रभारी ने बताया कि उन्हें इस संबंध में शिकायत प्राप्त हुई है और मामले की जांच की जा रही है। पुलिस का कहना है कि वे बयान की इलेक्ट्रॉनिक प्रति का विश्लेषण कर रहे हैं और कानूनी राय लेने के बाद उचित कार्रवाई की जाएगी।

वहीं, राज्य सरकार ने भी इस मामले को गंभीरता से लिया है। राज्य के गृहमंत्री ने कहा कि किसी भी प्रकार के भेदभाव या नफरत फैलाने वाले बयानों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और यदि महापौर के बयान में कोई आपत्तिजनक तत्व पाए जाते हैं, तो उन पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।

इस विवाद के राजनीतिक प्रभाव दूरगामी हो सकते हैं। कांग्रेस इस मुद्दे को लेकर राज्य भर में विरोध प्रदर्शन करने की योजना बना रही है, जबकि भाजपा इसे महापौर के खिलाफ एक राजनीतिक साजिश बता रही है। आने वाले दिनों में इस विवाद के और गहराने की संभावना है, क्योंकि दोनों पक्ष अपने-अपने दावों को मजबूती से रखने की कोशिश कर रहे हैं।

महापौर मंजूषा भगत के गंगाजल छिड़काव और कुर्सी-टेबल बदलने के बयान ने एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक विवाद को जन्म दिया है। विपक्ष इसे संविधान और न्याय संहिता के खिलाफ मानते हुए कार्रवाई की मांग कर रहा है, जबकि भाजपा इसे धार्मिक आस्था से जोड़कर देख रही है। प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रिया के तहत इस मामले की जांच की जा रही है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आगे इस मामले में क्या कदम उठाए जाते हैं और यह विवाद किस दिशा में जाता है।