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बकरी पालन से बदली किस्मत: मुंगेली के रामलाल लकड़ा की सफलता की कहानी





बकरी पालन से बदली रामलाल लकड़ा की तकदीर


ग्रामीण आजीविका का नया आधार: बकरी पालन से आर्थिक समृद्धि की ओर

रायपुर, 12 जून 2026

मुंगेली: ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालन को केवल एक पारंपरिक कार्य नहीं, बल्कि एक सशक्त व्यावसायिक मॉडल के रूप में देखा जा रहा है। मुंगेली जिले के ग्राम सुरही के निवासी श्री रामलाल लकड़ा की सफलता की कहानी इसका जीवंत उदाहरण है। पिछले 10 वर्षों से बकरी पालन से जुड़े रामलाल ने अपनी मेहनत और सही प्रबंधन के बल पर न केवल अपनी आर्थिक स्थिति सुधारी है, बल्कि अन्य ग्रामीणों के लिए प्रेरणा के स्रोत भी बन गए हैं।

संघर्ष से सफलता तक का सफर

श्री रामलाल लकड़ा ने बताया कि उनके इस सफर की शुरुआत बहुत ही साधारण तरीके से, कुछ गिनी-चुनी बकरियों के साथ हुई थी। आज उनके पास लगभग 185 बकरियां हैं। यह उपलब्धि एक दिन में नहीं मिली, बल्कि इसके पीछे एक दशक की निरंतर मेहनत, सही खान-पान और बकरियों के स्वास्थ्य प्रबंधन का बड़ा हाथ है।

“बकरी पालन कम लागत में अधिक लाभ देने वाला व्यवसाय है। यदि ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध संसाधनों का सही उपयोग किया जाए, तो पशुपालन आर्थिक समृद्धि की नई राह खोल सकता है।” – रामलाल लकड़ा

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बकरी पालन के लाभ और अर्थशास्त्र

रामलाल के अनुसार, बकरी पालन से उन्हें प्रतिवर्ष लगभग एक लाख रुपये की आय प्राप्त हो रही है। यह आय उन्हें उनके परिवार की दैनिक जरूरतों को पूरा करने और भविष्य को सुरक्षित करने में मदद करती है। इस व्यवसाय की प्रमुख विशेषताएं नीचे तालिका में दी गई हैं:

विशेषता विवरण
कम निवेश डेयरी फार्मिंग की तुलना में बहुत कम प्रारंभिक पूंजी की आवश्यकता।
नियमित आय बकरियों के मांस, दूध और खाद के माध्यम से वर्ष भर आय।
अनुकूलनशीलता बकरियां प्रतिकूल मौसम और कम चारे में भी जीवित रहने में सक्षम।
जैविक खाद बकरी की बीट का उपयोग जैविक खेती में खाद के रूप में किया जा सकता है।

आत्मनिर्भरता की ओर कदम

रामलाल का संदेश स्पष्ट है—आज के युवाओं को कृषि के साथ-साथ पशुपालन जैसे सहायक व्यवसायों को अपनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि बकरी पालन ने न केवल उनके परिवार को आर्थिक स्थिरता दी है, बल्कि उनके आत्मविश्वास को भी कई गुना बढ़ाया है। सही देखभाल और टीकाकरण (Vaccination) के माध्यम से बीमारियों पर नियंत्रण पाकर इस व्यवसाय को एक बड़े पैमाने पर ले जाया जा सकता है।

छत्तीसगढ़ सरकार की विभिन्न योजनाएं भी ऐसे छोटे पशुपालकों को प्रोत्साहित कर रही हैं ताकि ग्रामीण क्षेत्रों में प्रवास कम हो और लोग अपने ही गांव में स्वरोजगार अपनाकर स्वावलंबी बनें। रामलाल लकड़ा की यह कहानी उन सभी के लिए एक मशाल है जो कम संसाधनों में भी बड़ा बदलाव लाने का जज्बा रखते हैं।


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