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“सरकार पूंजीपतियों की गुलाम”: हसदेव बचाव आंदोलन में दीपक बैज और टी.एस. सिंहदेव ने खोला मोर्चा





हसदेव और रामगढ़ संरक्षण: जन आंदोलन का शंखनाद

रामगढ़ पर मंडराया संकट: क्या हसदेव के जंगल और जलस्रोत खत्म कर रही है सरकार? जानिए पूरा मामला

अम्बिकापुर/छत्तीसगढ़: छत्तीसगढ़ के नैसर्गिक सौंदर्य और प्राकृतिक संपदा के केंद्र, हसदेव और रामगढ़ क्षेत्र पर अब विनाश का साया गहरा गया है। ‘रामगढ़ संरक्षण एवं संवर्धन समिति’ द्वारा आयोजित एक विशाल परिचर्चा कार्यक्रम में पूर्व उपमुख्यमंत्री टी.एस. सिंहदेव ने प्रदेश में चल रही अनियंत्रित खनन गतिविधियों पर तीखा प्रहार करते हुए इसे “प्राकृतिक संसाधनों की लूट” करार दिया है।

लक्ष्मण रेखा मिटाने का आरोप

परिचर्चा को संबोधित करते हुए टी.एस. सिंहदेव ने पुरानी यादें ताजा कीं। उन्होंने बताया कि पूर्व में डॉ. रमन सिंह की सरकार के दौरान, कांग्रेस के दबाव और जनहित को देखते हुए एक ‘लक्ष्मण रेखा’ खींची गई थी, जिसके तहत उदयपुर और हसदेव क्षेत्र में केवल एक कोल खदान को ही अनुमति दी गई थी और भविष्य में नई खदानें न खोलने का वादा किया गया था।

सिंहदेव ने आरोप लगाया कि केंद्र में भाजपा की सरकार आने के बाद उस लक्ष्मण रेखा को पूरी तरह मिटा दिया गया है। आज स्थिति यह है कि एक के स्थान पर कई खदानें खुल चुकी हैं और लगभग 23 खदानें और चिन्हांकित की गई हैं। उन्होंने कहा, “केते एक्सटेंशन को मंजूरी के बाद अब हमारे ऐतिहासिक रामगढ़ का अस्तित्व भी संकट में है। इनकी भूख बढ़ती ही जा रही है।”

सरकार की ‘कुटिल चाल’ पर सवाल

रामगढ़ की दयनीय स्थिति पर चिंता जताते हुए सिंहदेव ने कहा कि सरकार खुद यह मान रही है कि वहां दरारें आ रही हैं, इसीलिए वे भव्य मंदिर बनाने का भूमिपूजन कर रहे हैं। उन्होंने तंज कसते हुए कहा, “ऐतिहासिक मंदिर के स्थान पर नई भव्य मंदिर बनवाना सरकार की कुटिल चाल है। पत्थरों पर सरकार ने खुद लिखवा रखा है कि चट्टानों में दरारें हैं, यह सीधा संकेत है कि वहां का भू-भाग सुरक्षित नहीं है।”

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पूरे छत्तीसगढ़ में एकजुट होने का आह्वान

टी.एस. सिंहदेव ने उपस्थित हजारों ग्रामीणों से आग्रह किया कि यह लड़ाई केवल प्रभावित क्षेत्रों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा, “हमें पूरे छत्तीसगढ़ में एकजुट होकर लड़ना होगा। जब तक हर जिले में संघर्ष की चिंगारी नहीं उठेगी, हम बड़े पूंजीपतियों और उनके तंत्र को नहीं हरा पाएंगे।” उन्होंने लेह-लद्दाख से लेकर दक्षिण भारत के आंदोलनों का उदाहरण देकर ग्रामीणों में जोश भरा।

दीपक बैज: “सरकार पूंजीपतियों की गुलाम”

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा कि यह सरकार अडानी, अंबानी और बड़े पूंजीपतियों की गुलाम बन गई है। उन्होंने आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए वीर नारायण सिंह और वीर गुंडाधूर के बलिदानों का स्मरण कराया। बैज ने कहा, “प्रदेश में आदिवासी मुख्यमंत्री होने के बावजूद सबसे बुरी स्थिति आदिवासियों की ही है। बस्तर से सरगुजा तक, हर संघर्ष में हमें एक-दूसरे का साथ देना होगा।”

आंदोलन की मुख्य बातें:

  • हवाई सर्वे पर आक्रोश: ग्रामीणों ने लगातार हो रहे हवाई सर्वे पर चिंता जताई और आशंका जताई कि इन सर्वे के जरिए नई खदानों का जाल बिछाया जा रहा है।
  • आर्थिक संकट: स्थानीय निवासियों ने सवाल किया कि उनकी जमीन और संसाधन छीने जा रहे हैं, लेकिन स्थानीय युवाओं को नौकरी के नाम पर कुछ नहीं मिल रहा।
  • पर्यावरण का विनाश: हसदेव बचाव मंच के आलोक शुक्ला ने चेतावनी दी कि केते एक्सटेंशन से 7 लाख पेड़ कटेंगे, जिससे आने वाले समय में भीषण जल संकट पैदा हो जाएगा।
  • व्यापक भागीदारी: कार्यक्रम में उदयपुर, लखनपुर, अम्बिकापुर, सीतापुर, मैनपाट, सूरजपुर सहित पूरे छत्तीसगढ़ से लगभग 5 से 6 हजार लोग शामिल हुए।

यह परिचर्चा महज एक बैठक नहीं, बल्कि एक बड़े जन आंदोलन की शुरुआत है। रामगढ़ संरक्षण एवं संवर्धन समिति के बैनर तले जुटे लोगों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए बंजर जमीन नहीं, बल्कि हरा-भरा छत्तीसगढ़ छोड़ना चाहते हैं। अब देखना यह है कि यह जन आंदोलन सरकार की नीतियों पर कितना प्रभाव डाल पाता है।


यह रिपोर्ट रामगढ़ संरक्षण एवं संवर्धन समिति द्वारा आयोजित परिचर्चा पर आधारित है।


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