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बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय जयंती: ‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष और राष्ट्र-निर्माण का संकल्प






बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय जयंती और वंदे मातरम के 150 वर्ष: विशेष रिपोर्ट


विशेष राष्ट्रीय कवरेज | नई दिल्ली

साहित्य सम्राट बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय जयंती: ‘वंदे मातरम’ के 150 गौरवशाली वर्ष और राष्ट्र-निर्माण का संकल्प

एक कालजयी रचना जिसने भारत की सोई हुई आत्मा को जगाया और स्वतंत्रता संग्राम का मूल मंत्र बनी

नई दिल्ली: भारत आज अपने इतिहास के एक अत्यंत महत्वपूर्ण और गौरवशाली पड़ाव पर खड़ा है। यह अवसर एक महान संयोग लेकर आया है—एक तरफ जहाँ हम आधुनिक भारतीय राष्ट्रवाद के अग्रदूत और ‘साहित्य सम्राट’ बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की पावन जयंती मना रहे हैं, वहीं दूसरी ओर यह समय भारत के अमर राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ की रचना के 150वें वर्ष (150th Anniversary) के उत्सव का साक्षी बन रहा है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय एक ऐसे युगद्रष्टा थे, जिनकी लेखनी ने केवल पन्नों पर शब्दों को नहीं उकेरा, बल्कि गुलामी की जंजीरों में जकड़ी एक पूरी सभ्यता के भीतर सांस्कृतिक गौरव, राष्ट्रीय अस्मिता और स्वतंत्रता की तीव्र लौ प्रज्वलित की।

आज देश भर में विभिन्न सांस्कृतिक, शैक्षणिक और राजकीय स्तरों पर उन्हें याद करते हुए श्रद्धासुमन अर्पित किए जा रहे हैं। प्रधानमंत्री से लेकर समाज के अंतिम पायदान पर खड़े नागरिक तक, हर कोई बंकिम बाबू के उस अमूल्य योगदान को नमन कर रहा है जिसने भारत को अपनी सामूहिक शक्ति और सांस्कृतिक चेतना से परिचित कराया। ‘वंदे मातरम’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि वह दिव्य महामंत्र है जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी थी और आज भी यह राष्ट्र-निर्माण के हमारे संकल्प को नई ऊर्जा प्रदान कर रहा है।

“वंदे मातरम! सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्, शस्यश्यामलां मातरम्। वंदे मातरम!”
— ऋषि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय (१८७५)

१. बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय: एक अद्वितीय साहित्यिक और राष्ट्रीय व्यक्तित्व

२६ जून १८३८ को बंगाल के २४ परगना जिले के नैहाटी (कांठलपाड़ा) में जन्मे बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे उस दौर के भारतीय समाज की उपज थे जब पश्चिमी शिक्षा और औपनिवेशिक मानसिकता देश की युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से दूर कर रही थी। बंकिम बाबू कलकत्ता विश्वविद्यालय के पहले दो स्नातकों (Graduates) में से एक थे। उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के तहत एक लंबे समय तक ‘डेप्यूटी मजिस्ट्रेट’ और ‘डेप्यूटी कलेक्टर’ के रूप में प्रशासनिक सेवाएं दीं, लेकिन उनकी आत्मा सदैव मां भारती की सेवा और साहित्य साधना में रमी रही।

एक सरकारी अधिकारी होने के नाते उन पर कई तरह के प्रतिबंध थे। वे सीधे तौर पर ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों में भाग नहीं ले सकते थे, परंतु उन्होंने अपनी असाधारण बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए ‘साहित्य को प्रतिरोध का हथियार’ बनाया। उन्होंने बंगाली गद्य (Prose) को एक आधुनिक और सशक्त रूप दिया, जिसके कारण उन्हें ‘साहित्य सम्राट’ की उपाधि मिली। उनके उपन्यास केवल प्रेम या पारिवारिक कहानियों तक सीमित नहीं थे; उनमें इतिहास, दर्शन, धर्म और सबसे बढ़कर राष्ट्रवाद का एक अनूठा संगम था।

२. ‘पालकी कांड’ और राष्ट्रीय चेतना का उदय

इतिहासकारों के अनुसार, बंकिम चंद्र के जीवन में राष्ट्रवाद की भावना को और अधिक तीव्र करने में १८७३ की एक वास्तविक घटना ने बड़ी भूमिका निभाई थी, जिसे अक्सर ‘पालकी कांड’ कहा जाता है। उस समय बंकिम बाबू बहरामपुर में एक ऊंचे प्रशासनिक पद पर तैनात थे। एक दिन जब वे अपनी पालकी में सवार होकर घर लौट रहे थे, तो उनकी पालकी एक ऐसे मैदान के पास से गुजरी जहाँ बहरामपुर छावनी के ब्रिटिश कमांडर कर्नल डफिन क्रिकेट खेल रहे थे।

एक भारतीय अधिकारी को ठाठ से पालकी में जाते देख और खेल में मामूली बाधा आने से कर्नल डफिन आगबबूला हो गया। उसने बंकिम चंद्र के साथ दुर्व्यवहार किया और उन पर हाथ उठाने की कोशिश की। बंकिम बाबू इस नस्लीय अपमान को चुपचाप सहने वाले व्यक्ति नहीं थे। एक सरकारी नौकर होने के बावजूद उन्होंने कानून का सहारा लिया और ब्रिटिश अधिकारी कर्नल डफिन को अदालत में खींच लिया। कानूनी लड़ाई के बाद १८७४ में अदालत ने फैसला सुनाया और कर्नल डफिन को बंकिम चंद्र से सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी पड़ी।

यद्यपि यह बंकिम बाबू की एक व्यक्तिगत और कानूनी जीत थी, लेकिन इस घटना ने उनके भीतर औपनिवेशिक व्यवस्था के खिलाफ गहरे असंतोष और अपनी मातृभूमि के प्रति अगाध प्रेम को और मुखर कर दिया। इस घटना के बाद उनकी लेखनी ने सीधे तौर पर भारतीय जनमानस को जगाने का कार्य शुरू कर दिया, जिसका चरमोत्कर्ष ‘वंदे मातरम’ के रूप में सामने आया।

३. ‘वंदे मातरम’ की रचना के १५० वर्ष: इतिहास और विकास

वर्तमान समय भारत के राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ की रचना की १५०वीं वर्षगांठ का ऐतिहासिक गवाह है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने इस कालजयी गीत की रचना ७ नवंबर १८७५ को स्वतंत्र रूप से की थी। बाद में उन्होंने १८८२ में प्रकाशित अपने सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यास ‘आनंदमठ’ में इसे शामिल किया।

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इस गीत की भाषा बेहद अनूठी है—यह आधी संस्कृत और आधी बंगाली (संस्कृतनिष्ठ बांग्ला) में रची गई है। इसमें मातृभूमि भारत को केवल मिट्टी का एक टुकड़ा या भौगोलिक नक्शा नहीं माना गया है, बल्कि उसे धन-धान्य से पूर्ण, ज्ञानदायिनी, शक्तिदायिनी और ममतामयी साक्षात ‘दुर्गा’ और ‘लक्ष्मी’ के रूप में प्रतिस्थापित किया गया है। बंकिम बाबू ने राष्ट्र को ‘माता’ का दर्जा देकर हर भारतीय के दिल में राष्ट्रभक्ति को एक आध्यात्मिक और पवित्र कर्तव्य बना दिया।

महत्वपूर्ण पड़ाव ऐतिहासिक तथ्य और विवरण
मूल रचना (१८७५) ७ नवंबर १८७५ को बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा स्वतंत्र कविता के रूप में रचित।
‘आनंदमठ’ में समावेश (१८८२) उपन्यास ‘आनंदमठ’ में संन्यासी विद्रोह की पृष्ठभूमि में इस गीत को क्रांतिकारियों का गान बनाया गया।
प्रथम सार्वजनिक गान (१८९६) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे स्वरबद्ध कर पहली बार गाया।
स्वदेशी आंदोलन का नारा (१९०५) बंगाल विभाजन के विरोध में ७ अगस्त १९०५ को यह गीत ब्रिटिश विरोधी आंदोलन का सबसे बड़ा प्रतीक और राजनीतिक नारा बना।
राष्ट्रीय गीत का दर्जा (१९५०) २४ जनवरी १९५० को भारत की संविधान सभा द्वारा इसे आधिकारिक रूप से भारत का ‘राष्ट्रीय गीत’ (National Song) घोषित किया गया।

४. स्वतंत्रता संग्राम की ‘रणभेरी’ बना वंदे मातरम

जब १९०५ में लॉर्ड कर्जन ने बंगाल के विभाजन की घोषणा की, तो पूरा देश आक्रोश से उबल उठा। उस समय ‘वंदे मातरम’ केवल एक गीत नहीं रहा, बल्कि वह ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ एक शक्तिशाली ‘रणभेरी’ और क्रांति का पर्याय बन गया। कोलकाता की सड़कों पर हजारों छात्र, युवा और स्वतंत्रता सेनानी लाठियां और गोलियां खाते हुए भी गगनभेदी आवाज में ‘वंदे मातरम’ का उद्घोष करते थे।

इस एक मंत्र ने जाति, धर्म, वर्ग और क्षेत्र की सभी दीवारों को ढहा दिया। पंजाब में लाला लाजपत राय, महाराष्ट्र में बाल गंगाधर तिलक, और अरविंदो घोष जैसे महान क्रांतिकारियों ने इस नारे को देश के कोने-कोने में पहुंचाया। ब्रिटिश सरकार इस शब्द से इतनी भयभीत हो गई थी कि सार्वजनिक स्थानों पर ‘वंदे मातरम’ बोलने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया था। ऐसा करने वालों को जेल में डाल दिया जाता था या कोड़े मारे जाते थे। परंतु, अंग्रेजों का यह दमन चक्र इस मंत्र की शक्ति को कम नहीं कर सका। फांसी के फंदे पर झूलते समय भी देश के मतवाले ‘वंदे मातरम’ का ही जयघोष करते थे।

५. ‘आनंदमठ’ और संन्यासी विद्रोह की अमर गाथा

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का उपन्यास ‘आनंदमठ’ भारतीय साहित्य की एक ऐसी कृति है जिसे ‘क्रांति की बाइबिल’ कहा जा सकता है। यह उपन्यास १७७० के दशक में बंगाल में आए विनाशकारी अकाल और उसके बाद ईस्ट इंडिया कंपनी के अत्याचारों के खिलाफ उठ खड़े हुए ‘संन्यासी विद्रोह’ पर आधारित है।

कहानी एक समृद्ध जमींदार महेंद्र के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अकाल के कारण अपना घर-बार खो देता है और अंततः जंगल में संन्यासी विद्रोहियों के एक गुप्त संगठन ‘संतान दल’ से जुड़ता है। इस संगठन के संन्यासी संन्यास धर्म का पालन करते हुए भी अस्त्र-शस्त्र उठाते हैं और मातृभूमि को विदेशी लुटेरों से मुक्त कराने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं। उपन्यास का सबसे भावुक और प्रेरणादायक क्षण वह है जब ये संन्यासी ‘भवानंद’ के नेतृत्व में मां भारती की पूजा करते हैं और सामूहिक रूप से ‘वंदे मातरम’ गाते हैं। यह उपन्यास सिखाता है कि जब राष्ट्र संकट में हो, तो आध्यात्मिक साधना का अर्थ है—देश की रक्षा के लिए युद्ध के मैदान में उतर जाना।

६. १५० वर्षों की यात्रा: समकालीन भारत में प्रासंगिकता और राष्ट्र-निर्माण

आज जब हम ‘वंदे मातरम’ की १५०वीं वर्षगांठ मना रहे हैं, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आज के आधुनिक और डिजिटल भारत में इस गीत और बंकिम बाबू के विचारों की क्या प्रासंगिकता है? इसका उत्तर बहुत स्पष्ट है—कल जो मंत्र ‘स्वराज’ (स्वतंत्रता) का जरिया था, आज वही मंत्र ‘सुराज’ (अच्छा शासन) और आत्मनिर्भरता का मार्गदर्शक है।

सांस्कृतिक पुनरुत्थान और गौरव

बंकिम चंद्र का मानना था कि कोई भी राष्ट्र अपनी सांस्कृतिक जड़ों को भूले बिना आगे नहीं बढ़ सकता। आज का भारत अपनी विरासत पर गर्व करने के साथ-साथ आधुनिकता को अपना रहा है। ‘वंदे मातरम’ हमें हमारी समृद्ध नदियों, उपजाऊ भूमि और गौरवशाली इतिहास की याद दिलाता है।

एक भारत – श्रेष्ठ भारत की भावना

१५० वर्ष पहले इस गीत ने पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक पूरे भारत को एक सूत्र में बांधा था। आज भी, जब देश आंतरिक और बाह्य चुनौतियों का सामना करता है, तो यह गीत प्रत्येक नागरिक के भीतर सामूहिक जिम्मेदारी और राष्ट्र-प्रथम (Nation First) की भावना को सुदृढ़ करता है।

आत्मनिर्भरता और नव-संकल्प

‘वंदे मातरम’ में वर्णित ‘सुजलां सुफलां’ का स्वप्न तभी पूरी तरह साकार होगा जब भारत आर्थिक, तकनीकी और सामाजिक रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर बनेगा। हमारी युवा पीढ़ी, जो स्टार्टअप्स, विज्ञान, कला और खेल जगत में नए कीर्तिमान स्थापित कर रही है, वह वास्तव में बंकिम बाबू के ‘राष्ट्र-निर्माण’ के सपने को ही आगे बढ़ा रही है।

बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय केवल एक लेखक या कवि नहीं थे; वे एक ‘ऋषि’ थे जिन्होंने राष्ट्र को एक जीवित देवी के रूप में देखा और पूजा। उनकी जयंती और ‘वंदे मातरम’ के १५० वर्ष पूरे होने का यह पावन अवसर केवल अतीत के गौरवगान का समय नहीं है, बल्कि यह भविष्य के आत्मनिरीक्षण का क्षण है।

ऋषि बंकिम चंद्र को हमारी सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके द्वारा दिखाए गए सांस्कृतिक स्वाभिमान के मार्ग पर चलें, देश की एकता और अखंडता को अक्षुण्ण रखें, और अपने दैनिक जीवन के कार्यों से राष्ट्र-निर्माण में गिलहरी योगदान दें। आइए, इस ऐतिहासिक अवसर पर हम सब मिलकर एक बार फिर उस अमर मंत्र को अपने भीतर आत्मसात करें और पूरे गर्व से कहें—वंदे मातरम!

© २०२६ राष्ट्रीय समाचार ब्यूरो। सभी अधिकार सुरक्षित। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय जयंती और वंदे मातरम १५०वीं वर्षगांठ पर विशेष प्रस्तुति।


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