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शिक्षक दिवस पर सीएम विष्णु देव साय का आत्मीय पत्र: ‘परिस्थितियाँ बच्चों के सपनों की सीमा तय न करें’ | Pradesh Khabar






शिक्षक दिवस 2026: मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने प्रदेश के शिक्षकों के नाम लिखा भावुक आत्मीय पत्र


शिक्षक दिवस पर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने गुरुजनों के नाम लिखा आत्मीय पत्र: अपने विद्यार्थी जीवन के संघर्षों को किया याद; कहा – ‘परिस्थितियाँ किसी बच्चे के सपनों की सीमा तय न करें’

रायपुर, 4 सितंबर 2026

मुख्य बिंदु (Key Highlights)

  • शिक्षक दिवस (5 सितंबर) के शुभ अवसर पर मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने छत्तीसगढ़ के समस्त गुरुजनों के नाम लिखा आत्मीय एवं भावुक पत्र।
  • जशपुर जिले के बगिया गांव से शुरू हुए अपने स्कूली सफर, पिता के असमय निधन और कुनकुरी में किए गए संघर्षों को किया साझा।
  • स्लेट, तख्ती और चॉक के दौर से निकलकर आज स्मार्ट क्लास तक पहुँची छत्तीसगढ़ की शिक्षा व्यवस्था की तुलनात्मक समीक्षा की।
  • तकनीक को ज्ञान का माध्यम माना, लेकिन संस्कार गढ़ने और आत्मविश्वास जगाने के लिए शिक्षक की भूमिका को बताया सर्वोपरि।
  • शिक्षकों से विशेष अपील: ‘अभाव, संकोच या किसी परिस्थिति के कारण पीछे छूट रहे बच्चों का हाथ अवश्य थामें।’
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के तहत मातृभाषा में शिक्षा, कौशल विकास और बस्तर के बंद पड़े स्कूलों को पुनः खोलने का प्रमुखता से उल्लेख।

शिक्षक दिवस (5 सितंबर) की पूर्व संध्या पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने प्रदेश के सभी गुरुजनों और शिक्षकों के नाम एक अत्यंत आत्मीय और भावपूर्ण पत्र लिखा है। इस पत्र में उन्होंने राज्य के शिक्षकों को सादर नमन करते हुए अपने बचपन के दिनों, पारिवारिक संघर्षों और शिक्षा प्राप्त करने के दौरान आई कठिन परिस्थितियों का खुलकर जिक्र किया है। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जीवन में व्यक्ति चाहे कितना भी ऊँचा पद प्राप्त कर ले, लेकिन अपने गुरुओं के प्रति आदर, श्रद्धा और कृतज्ञता का भाव कभी कम नहीं होता।

बगिया के छोटे से स्कूल से शुरू हुआ शिक्षा का सफर

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने अपने पत्र में अतीत के पन्नों को पलटते हुए लिखा कि उनका जन्म जशपुर जिले के दूरस्थ बगिया गाँव के एक बेहद साधारण किसान परिवार में हुआ था। उनकी प्राथमिक शिक्षा गाँव के ही छोटे से स्कूल से प्रारंभ हुई। लेकिन जीवन ने बहुत ही छोटी उम्र में उनकी कठिन परीक्षा ली। जब वे मात्र दस वर्ष के थे और चौथी कक्षा में अध्ययनरत थे, तभी उनके पिता का साया उनके सिर से उठ गया। इतनी कम उम्र में ही परिवार की देखरेख, खेती-किसानी और छोटे भाइयों की परवरिश की भारी चिंताएँ उनके कंधों पर आ गईं।

गाँव में पाँचवीं तक की पढ़ाई पूरी करने के पश्चात आगे की शिक्षा के लिए उन्हें कुनकुरी जाना पड़ा। वहाँ उन्होंने लोयोला उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में एक छोटे से कमरे में रहकर पढ़ाई की। आगे उच्च शिक्षा प्राप्त करने की उनकी तीव्र इच्छा थी, लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियों और विपरीत परिस्थितियों के कारण वे नियमित पढ़ाई जारी नहीं रख सके। इसके बाद उन्होंने खेती की बागडोर संभाली और अपने छोटे भाइयों की शिक्षा-दीक्षा को प्राथमिकता दी। उन्होंने पत्र में लिखा कि उस दौर में किसी ग्रामीण बच्चे के लिए स्कूल तक पहुँचना आज जितना आसान नहीं था; न तो पर्याप्त साधन थे और न ही आर्थिक संबल।

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स्लेट-तख्ती से स्मार्ट क्लास तक: शिक्षा का बदलता दौर

अपने विद्यार्थी जीवन और वर्तमान शैक्षणिक परिदृश्य की तुलना करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि आज पीछे मुड़कर देखने पर यह सुखद अनुभूति होती है कि शिक्षा का क्षेत्र कितना बदल चुका है। जिस दौर में उनकी पीढ़ी ने स्लेट, तख्ती और चॉक से लिखना सीखा था, आज उसी छत्तीसगढ़ के दूर-दराज़ के बच्चे स्मार्ट क्लासरूम में पढ़ाई कर रहे हैं। डिजिटल माध्यमों और आधुनिक तकनीक के माध्यम से आज दुनिया भर का ज्ञान प्रदेश के बच्चों की उंगलियों पर उपलब्ध है।

उन्होंने कहा कि जिन दूरस्थ और वनांचल क्षेत्रों में कभी स्कूल तक पहुँच पाना बच्चों के लिए एक चुनौती होता था, आज वहाँ अत्याधुनिक शैक्षणिक संसाधन, आधुनिक भवन और नई तकनीक पहुँच चुकी है। परंतु उन्होंने जोर देकर कहा कि तकनीक और संसाधनों में चाहे जितना भी परिवर्तन आ जाए, शिक्षा का सबसे मूल और मजबूत आधार हमेशा ‘शिक्षक’ ही रहता है।

तकनीक जानकारी दे सकती है, पर संस्कार शिक्षक ही गढ़ते हैं:
मुख्यमंत्री साय ने रेखांकित किया कि तकनीक बच्चों को तथ्य और जानकारी उपलब्ध करा सकती है, पुस्तकें उन्हें ज्ञान दे सकती हैं और डिजिटल उपकरण सीखने की राह आसान बना सकते हैं। लेकिन किसी बच्चे के भीतर आत्मविश्वास का संचार करना, उसकी सुप्त प्रतिभा को पहचानना, उसमें अच्छे संस्कार रोपना और उसे एक संवेदनशील व श्रेष्ठ नागरिक बनाना केवल एक शिक्षक के ही बस की बात है।

अभाव या संकोच में पीछे छूट रहे बच्चे का हाथ थामिए

शिक्षकों से अत्यंत भावुक और आत्मीय आग्रह करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि कक्षा में बैठा हर बच्चा अपने आप में असीम संभावनाओं का केंद्र होता है। उसमें से कोई भविष्य का महान वैज्ञानिक, खिलाड़ी, डॉक्टर, किसान, शिक्षक, कलाकार या जनसेवक बन सकता है। कई बार बच्चों को स्वयं अपनी क्षमता का भान नहीं होता, लेकिन एक शिक्षक की पारखी दृष्टि उसे पहचान लेती है।

उन्होंने शिक्षकों से विशेष अपील की: “अभाव, संकोच या किसी अन्य परिस्थिति के कारण जो बच्चा पीछे छूट रहा है, उसका हाथ अवश्य थामिए। आपका थोड़ा-सा विश्वास और प्रोत्साहन का एक वाक्य उस बच्चे के पूरे जीवन की दिशा बदल सकता है।” उन्होंने कहा कि शिक्षा का लक्ष्य केवल पाठ्यक्रम या सिलेबस पूरा कराना नहीं है, बल्कि बच्चे के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और बस्तर में लौटती खुशहाली

राज्य सरकार की प्राथमिकताओं का उल्लेख करते हुए मुख्यमंत्री ने बताया कि छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के अनुरूप शिक्षा को अधिक सहज, व्यावहारिक और आधुनिक बनाया जा रहा है। बच्चों को उनकी मातृभाषा और स्थानीय बोलियों में सीखने के अवसर प्रदान किए जा रहे हैं। कौशल विकास (Skill Development) को स्कूली शिक्षा से जोड़ा जा रहा है।

उन्होंने बस्तर का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य सरकार के निरंतर प्रयासों से बस्तर के उन सुदूर क्षेत्रों में भी स्कूलों की घंटियाँ फिर से गूंजने लगी हैं, जहाँ विपरीत परिस्थितियों के कारण वर्षों से ताले लटके हुए थे। सरकार का संकल्प है कि छत्तीसगढ़ का कोई भी बच्चा केवल इसलिए पीछे न रह जाए क्योंकि उसका जन्म किसी छोटे गाँव या वनांचल में हुआ है।

“हम एक ऐसा समृद्ध और सशक्त छत्तीसगढ़ बनाना चाहते हैं, जहाँ किसी भी बच्चे की परिस्थितियाँ उसके सपनों की सीमा तय न कर सकें। हर स्कूल सपनों का द्वार बने और हर कक्षा संभावनाओं का संसार बने।”

— विष्णु देव साय, मुख्यमंत्री (छत्तीसगढ़)

पत्र के अंत में मुख्यमंत्री ने स्वयं को एक मुख्यमंत्री के साथ-साथ बगिया गाँव के उसी प्राथमिक स्कूल के छात्र के रूप में प्रस्तुत किया, जिसने अपने गुरुजनों से मिली सीख और संस्कारों को अपने जीवन की सबसे बड़ी पूँजी माना है। उन्होंने प्रदेश के सभी गुरुजनों के सुखी, स्वस्थ और दीर्घायु जीवन की कामना करते हुए शिक्षक दिवस की हार्दिक बधाई व शुभकामनाएँ प्रेषित कीं।


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