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पुलिकट झील: रामसर स्थल, प्रवासी पक्षियों का स्वर्ग और भारत की दूसरी सबसे बड़ी खारे पानी की झील

पुलिकट झील आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु की सीमा पर स्थित भारत की दूसरी सबसे बड़ी खारे पानी की झील है। यह रामसर स्थल फ्लेमिंगो महोत्सव, प्रवासी पक्षियों, जैव-विविधता और जल संरक्षण के लिए प्रसिद्ध है।

पुलिकट झील: रामसर स्थल, प्रवासी पक्षियों का स्वर्ग और भारत की जल–विरासत का अनमोल रत्न

भारत विविध भौगोलिक संरचनाओं और प्राकृतिक संपदाओं का देश है। यहां पहाड़, नदियां, जंगल और झीलें न केवल प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, बल्कि पर्यटन, आजीविका और सांस्कृतिक पहचान का भी आधार हैं। इन्हीं प्राकृतिक धरोहरों में एक अनमोल नाम है पुलिकट झील, जिसे स्थानीय रूप से पझावेरकाडु झील भी कहा जाता है। यह झील आंध्र प्रदेश के नेल्लोर और तमिलनाडु के तिरुवल्लूर जिले की सीमा पर स्थित है और अपनी जैव-विविधता, ऐतिहासिक विरासत और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध है।

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पुलिकट झील लगभग 159 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैली हुई है और यह भारत की दूसरी सबसे बड़ी खारे पानी की झील मानी जाती है। समुद्र से जुड़े होने के कारण इस झील का पानी खारा है, जो इसे मीठे पानी की झीलों से अलग पहचान देता है। यही खारापन यहां की जैविक संरचना को विशिष्ट बनाता है और अनेक दुर्लभ प्रजातियों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करता है।

अपने इसी विशिष्ट पारिस्थितिक तंत्र के कारण पुलिकट झील को रामसर कन्वेंशन के तहत अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि के रूप में मान्यता दी गई है। रामसर स्थल का दर्जा मिलना इस बात का प्रमाण है कि यह झील केवल स्थानीय या क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर पर्यावरण संतुलन के लिए अहम है।

पुलिकट झील को सबसे अधिक प्रसिद्धि मिली है यहां आने वाले प्रवासी पक्षियों के कारण। हर साल सर्दियों के मौसम में हजारों किलोमीटर दूर से पक्षी इस झील का रुख करते हैं। इनमें प्रमुख रूप से:

  • फ्लेमिंगो
  • सारस
  • किंगफिशर
  • पेलिकन
  • स्टॉर्क
    जैसी कई दुर्लभ और सुंदर प्रजातियां शामिल हैं।

फ्लेमिंगो झुंडों में झील के उथले पानी में भोजन करते दिखाई देते हैं, जो न केवल पर्यटकों को आकर्षित करता है बल्कि यह संकेत भी देता है कि झील का पारिस्थितिक संतुलन अभी जीवित है। विशेषज्ञों के अनुसार, किसी भी आर्द्रभूमि में प्रवासी पक्षियों की संख्या वहां के पर्यावरण की सेहत का सीधा संकेत होती है।

पुलिकट झील की पहचान को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत करने में फ्लेमिंगो महोत्सव की बड़ी भूमिका है। हर वर्ष फरवरी माह में आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा आयोजित यह महोत्सव:

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  • पर्यटकों को आकर्षित करता है
  • स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा करता है
  • आर्द्रभूमि संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाता है

इस दौरान बोट सफारी, पक्षी अवलोकन (Bird Watching), लोक संस्कृति और स्थानीय खानपान को बढ़ावा दिया जाता है। यह महोत्सव यह भी दर्शाता है कि पर्यावरण संरक्षण और पर्यटन एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं।

पुलिकट झील केवल प्राकृतिक सौंदर्य तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका एक समृद्ध ऐतिहासिक पक्ष भी है। डच शासनकाल में पुलिकट एक महत्वपूर्ण व्यापारिक बंदरगाह हुआ करता था। आज भी झील के आसपास:

  • डच काल की औपनिवेशिक इमारतें
  • पुराने किले और चर्च
    मौजूद हैं, जो इस क्षेत्र को हेरिटेज टूरिज्म डेस्टिनेशन के रूप में स्थापित करते हैं।

यह इतिहास बताता है कि पुलिकट झील सदियों से व्यापार, संस्कृति और मानवीय गतिविधियों का केंद्र रही है।

पुलिकट झील हजारों मछुआरा परिवारों की आजीविका का मुख्य स्रोत है। खारे पानी में पाई जाने वाली मछलियां, झींगे और केकड़े स्थानीय अर्थव्यवस्था को सहारा देते हैं। पीढ़ियों से यह समुदाय झील पर निर्भर रहा है और इसके संरक्षण में उनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है।

हालांकि, बदलते पर्यावरण और मानवीय हस्तक्षेप ने मछुआरों की चुनौतियां बढ़ा दी हैं, जिससे उनकी आजीविका पर भी असर पड़ा है।

अपनी तमाम खूबियों के बावजूद पुलिकट झील कई गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है:

  • अतिक्रमण
  • औद्योगिक और घरेलू प्रदूषण
  • झील में समुद्री जल के प्रवाह में कमी
  • प्लास्टिक कचरा

विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह झील भी देश की अन्य आर्द्रभूमियों की तरह सिमट सकती है।

भारत सरकार का जल शक्ति मंत्रालय पुलिकट झील को:

  • जल संरक्षण
  • आर्द्रभूमि प्रबंधन
  • सतत जल संसाधन विकास
    का एक महत्वपूर्ण उदाहरण मानता है।

केंद्र और राज्य सरकारों के साथ-साथ स्थानीय समुदायों की सहभागिता से ही इस झील का दीर्घकालीन संरक्षण संभव है।

पुलिकट झील केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि यह भारत की जल–विरासत, जैव-विविधता और सांस्कृतिक इतिहास का जीवंत प्रतीक है। यह झील हमें सिखाती है कि प्रकृति और मानव सहअस्तित्व कैसे संभव है।

आज आवश्यकता है कि:

  • संरक्षण को प्राथमिकता दी जाए
  • विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बने
  • आने वाली पीढ़ियों के लिए इस धरोहर को सुरक्षित रखा जाए

यदि पुलिकट झील सुरक्षित रही, तो यह न केवल प्रवासी पक्षियों का स्वर्ग बनी रहेगी, बल्कि भारत के जल संरक्षण प्रयासों की एक प्रेरक कहानी भी बनेगी।

Ashish Sinha

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